futuredमेरा गाँव मेरा बचपन

मेरे आंगन की गौरैया अब दिखती नहीं

आचार्य ललित मुनि

कभी सुबह की पहली किरण के साथ जो मधुर चहचहाहट हमारे आंगन को जीवंत बना देती थी, आज वह ध्वनि जैसे स्मृतियों में सिमट कर रह गई है। मिट्टी के आंगन में बिखरे चावल के दाने, तुलसी चौरा के पास रखा पानी का छोटा पात्र, और खपरैल की छतों पर फुदकती नन्ही-सी गौरैया, ये दृश्य केवल अतीत की तस्वीरें बनकर रह गए हैं। आज जब हम अपने घरों के बाहर नजर डालते हैं, तो एक अजीब-सी खामोशी महसूस होती है, मानो प्रकृति का कोई आत्मीय स्वर हमसे दूर चला गया हो।

गौरैया कभी हमारे जीवन का सहज और अभिन्न हिस्सा थी। वह केवल एक पक्षी नहीं थी, बल्कि हमारे घरेलू परिवेश की सजीवता का प्रतीक थी। उसकी उपस्थिति में अपनापन था, विश्वास था। वह बिना किसी भय के हमारे घरों के कोनों में घोंसला बनाती थी, रोशनदानों में, बैठक में लगे चित्रों की फ़्रेम के पीछे घोसला बनाकर अंडे देती, बच्चों के आसपास चहकती थी, और मानो हर दिन हमें यह अहसास दिलाती थी कि प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता कितना गहरा और सहज हो सकता है। बरसात के आगमन की सूचना देने के लिए धूलि स्नान करती, जब वह अपने नन्हे बच्चों को चोंच में दाना लेकर खिलाती थी, तो वह दृश्य केवल एक पक्षी का व्यवहार नहीं, बल्कि मातृत्व और जीवन के संघर्ष की एक सुंदर झलक होता था।

यह भी पढ़ें  अजमेर का ‘लाल्या-काल्या मेला’ : नृसिंह जयंती पर जीवंत होती आस्था और परंपरा

समय बदला और उसके साथ बदल गया हमारा रहन-सहन, हमारा परिवेश और हमारी प्राथमिकताएं। कंक्रीट के ऊँचे-ऊँचे भवनों ने मिट्टी के आंगनों की जगह ले ली। खपरैल और लकड़ी के छज्जों की जगह अब चिकनी दीवारें और बंद खिड़कियां हैं, जहां गौरैया के लिए कोई कोना नहीं बचा। पहले घरों में रोशनदान होते थे, दीवारों में छोटे-छोटे छेद होते थे, जहां वह अपना घोंसला बना सकती थी, लेकिन आधुनिक निर्माण शैली ने उन सभी संभावनाओं को समाप्त कर दिया है।

इसके साथ ही पर्यावरणीय बदलावों ने भी गौरैया के अस्तित्व को गहराई से प्रभावित किया है। खेती में बढ़ते रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग ने उन छोटे-छोटे कीटों को समाप्त कर दिया है, जो गौरैया का मुख्य आहार होते थे। जब भोजन ही कम हो गया, तो उनका जीवन संकट में पड़ना स्वाभाविक था। शहरों में बढ़ता प्रदूषण, शोर और भागदौड़ भी उनके लिए अनुकूल नहीं रही।

एक और महत्वपूर्ण कारण आधुनिक संचार तकनीक है। मोबाइल टावरों से निकलने वाली विद्युत-चुंबकीय तरंगों को लेकर कई शोध यह संकेत देते हैं कि ये तरंगें पक्षियों की दिशा पहचानने की क्षमता और प्रजनन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। यद्यपि इस विषय पर वैज्ञानिकों के बीच मतभेद भी हैं, फिर भी यह चिंता का विषय बना हुआ है कि तकनीकी विकास कहीं न कहीं प्रकृति के नाजुक संतुलन को प्रभावित कर रहा है।

यह भी पढ़ें  छत्तीसगढ़ में श्रमिकों के लिए 800 करोड़ DBT सहायता: योजनाओं से मिल रहा सशक्तिकरण को नया आयाम

सबसे अधिक पीड़ा देने वाली बात यह है कि इस बदलाव में हमारी अपनी भूमिका भी कम नहीं है। हमने अपने घरों में पक्षियों के लिए स्थान रखना बंद कर दिया। पहले हर घर में दाना-पानी रखना एक सामान्य परंपरा थी, जो अब धीरे-धीरे समाप्त हो गई है। हमारी जीवनशैली इतनी व्यस्त और आत्मकेंद्रित हो गई है कि हम अपने आसपास के छोटे-छोटे जीवों की उपस्थिति और जरूरतों को नजरअंदाज करने लगे हैं। यह केवल गौरैया की कमी नहीं है, यह हमारी संवेदनाओं के क्षीण होने का संकेत भी है।

फिर भी आशा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। यदि हम चाहें, तो इस छोटी-सी चिड़िया को फिर से अपने जीवन में लौटा सकते हैं। इसके लिए किसी बड़े प्रयास की आवश्यकता नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कदम ही पर्याप्त हैं। अपने घरों की बालकनी या आंगन में मिट्टी या लकड़ी के घोंसले लगाना, रोजाना थोड़ा-सा दाना और पानी रखना, और रासायनिक पदार्थों का कम उपयोग करना जैसे प्रयास गौरैया के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सकते हैं।

देश के कई हिस्सों में लोग इस दिशा में जागरूक हो रहे हैं। “सेव स्पैरो” जैसे अभियानों के माध्यम से लोगों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे अपने घरों को फिर से गौरैया के लिए सुरक्षित बनाएं। स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी इस विषय पर जागरूकता फैलाने का कार्य किया जा रहा है, जिससे नई पीढ़ी प्रकृति के प्रति संवेदनशील बन सके।

यह भी पढ़ें  समता और सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत : गुरु अमरदास

गौरैया की वापसी केवल एक पक्षी की वापसी नहीं होगी। यह हमारे जीवन में उस खोई हुई सादगी, उस सहजता और उस आत्मीयता की वापसी होगी, जो कभी हमारे आंगन की पहचान हुआ करती थी। जब वह फिर से हमारे घर के किसी कोने में घोंसला बनाएगी, तो वह केवल अपने बच्चों का पालन-पोषण नहीं करेगी, बल्कि हमारे भीतर भी उस मानवीय संवेदना को जीवित करेगी, जो आज धीरे-धीरे मुरझाती जा रही है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर झांकें और यह समझें कि विकास का अर्थ केवल भौतिक उन्नति नहीं है। सच्चा विकास वही है, जिसमें प्रकृति और मनुष्य दोनों का संतुलन बना रहे। यदि हम अपने आंगन को फिर से गौरैया के लिए सुरक्षित बना सकें, तो यह न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि हमारी आत्मा के लिए भी एक बड़ा सुकून होगा।

शायद उस दिन, जब सुबह की पहली किरण के साथ फिर से गौरैया की चहचहाहट सुनाई देगी, हम यह महसूस कर पाएंगे कि हमने केवल एक पक्षी को नहीं, बल्कि अपने जीवन की एक खोई हुई धुन को वापस पा लिया है। इस आशा में मैं आज भी सकोरे में पानी रखता हूं और आंगन में दाने छिड़कता हूं, कि कभी लौटकर आएगी मेरी गौरेया।

आचार्य ललित मुनि