मानव जीवन यात्रा में भाग्य और कर्म की भूमिका : मनकही

भाग्य और कर्म  के विषय सदैव यही कहा जाता है कि भाग्य के लेख को मिटाया नही जा सकता। जो होना है वह होकर रहेगा। होनी कभी टाली नहीं जा सकती। वहीं गीता में कहा गया है कर्म करो फल की इच्छा मत करो। जैसे कर्म होंगें वैसा परिणाम होगा। जीवन में सब कुछ निर्धारित है। किसी का जीवन संघर्षों से भरा होता है सदैव दुःख, कष्ट, पीड़ा से घिरा होता होता है।

सुख की छाया क्षणिक होती है जो स्वप्न की भांति होता है, जिसे नियति कहते हैं। वहीं कुछ लोगों का जीवन सुखी दिखाई देता है। मानव शरीर है तो व्याधियां और कष्ट होगा ही, परन्तु उसे दुःखी नहीं कह सकते। शारीरिक मानसिक जैसी जन्मजात विकृतियों से अनेक इंसान प्रभावित हो सकते हैं। एकमात्र ईश्वर ही पूर्ण है, शेष सभी अपूर्ण हैं।

फिर मनुष्य दोषी कैसे हो सकता है? किसी भी कार्य के लिए। ये बात समझ से परे है। क्योंकि इंसान स्वयं ही भ्रमित है भाग्य और कर्म के संबंध से, किसी के साथ कोई दुर्घटना या कुछ अनहोनी होने पर दोषी उसे ठहराया जाता है। दूसरी ओर मान्यता है ईश्वर ने भाग्य लिखा है। तो जब भाग्य में लिखा है तभी तो इंसान कर्म भी वैसा करता है अर्थात मनुष्य दोषी नहीं क्योंकि वह भाग्य में लिखे के अनुसार ही कर्म करता है।

प्रत्येक मनुष्य का जन्म-मरण निश्चित है। मनुष्य ऐन केन प्रकारेण उस नियत स्थान और समय पर पहुंच जाता है जहां किसी कार्य का होना है। किसकी सहयोग से कौन सा काम कब होगा? यह भी नियत है।

ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, तो मनुष्य को इतना संघर्ष और दुःख क्यों झेलना पड़ता है। दुःखी और संघर्षशील मनुष्य जीवित है बस, जी नहीं रहा क्योकि जीता तब है जब उसे सुख, शान्ति मिलती है। परंतु जब क्षण- क्षण प्रतिदिन बस कष्ट व असफलता ही मिले तो जीवन से रस समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में खुशियां जीवन से कोसों दूर चली जाती हैं। इच्छा शक्ति कमजोर पड़ने लगती है। केवल साँसों के चलने को जीवन नहीं माना जा सकता।

सभी इच्छाओं की पूर्ति असंभव है, इसे मनुष्य भी अच्छे से जानता है परन्तु कुछ तो खुशियां प्राप्त करने का अधिकार तो उसे भी है जिसे केवल दुःख-पीड़ा ही मिली। ऐसे असंतुलन से मन में असन्तोष की भावना बलवती होकर पीड़ा को बढ़ाती ही है। दुःखी अपने को और दुःखी महसूस करने लगता है। वह सोचने में मजबूर हो जाता है कि यदि वह कर्मफलों को भोग रहा तो यदि पूर्व जन्म में उसने एक भी सत्कर्म नहीं किया तो दुर्लभ मानव योनि किस प्रकार प्राप्त हुई और क्यों? जब उसके कर्म ही सही नहीं थे।

अर्थात वास्तविकता यह है कि भाग्य और कर्म दोनों ही मनुष्य को परिश्रम की ओर अग्रसर करते हैं। क्योंकि दोनों से मनुष्य अपरिचित है। भाग्य को पढ़ नहीं सकता और कर्म का प्रतिफल या परिणाम भी नहीं जानता। कब, कैसे, किस प्रकार का कर्म करे कि उसे सफलता ही मिले। जीवन में उसके समक्ष निर्णय लेने के समय सदैव कई मार्ग आते हैं जिनमें से सही मार्ग का चयन ही उसे लक्ष्य प्राप्ति की ओर ले जाएगा।

इन्हीं दुविधाओं में मनुष्य स्वविवेक से मार्ग चयन कर सुपरिणाम की कामना कर्म पथ पर चल पड़ता है यदि सफलता मिली तो परिश्रम सही दिशा एवं ढंग से किया गया जो मनुष्य को आत्मसंतुष्टि प्रदान कर परिश्रम के लिए पुनः प्रेरित करता है। किन्तु असफलता मिली तो मनुष्य एक बार फिर भाग्य का लेख मानकर संतोष करते हुए पुनः कर्म की ओर अग्रसर होता है।

यह तय है कि भाग्य या कर्म की जानकारी मनुष्य को नहीं होती, परन्तु दोनों ही आत्मसंतुष्टि अवश्य प्रदान करती है। इसलिए मानव जीवन को केवल एक यात्रा मानकर इस यात्रा की अनेक बाधाओं एवं समस्याओं के साथ संघर्ष करते हुए इस भवसागर को पार करना ही यथार्थ और श्रेयस्कर है क्योंकि प्रकृति में साथ ले जाने की कोई व्यवस्था नहीं है।

जो हमने प्रकृति से प्राप्त कर उपभोग किया, उसका मूल्य चुकाना पड़ता है। मुनष्य को सांसे भी गिनकर मिली हैं और इस ऋण को भी चुकाने का एकमात्र उपाय संघर्ष और परिश्रम ही है। अतः भाग्य और कर्म दोनों की प्रासंगिकता यही है कि मनुष्य परिस्थितियों से सामंजस्य कर सक्रियता से अपनी भूमिका निभाते हुए जीवन चक्र को पूर्ण करे।

 

आलेख

श्रीमती रेखा पाण्डेय (लिपि)
व्याख्याता हिन्दी
अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़

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