जेठ तपै तो सावन बरसे : लोक कथाओं और परंपराओं में नौतपा

भारत की धरती पर जब ज्येष्ठ मास आता है, तो उसके साथ आती है धूप की चिलचिलाहट, लू के थपेड़े और उस तीखी गर्मी की जो माटी को भट्टी बना देती है। लेकिन यह तपन केवल कष्ट नहीं, धरती की आवश्यकता भी है। सदियों से भारतीय यह जानते रहे हैं कि यदि जेठ में आकाश ठीक से दहके, तो सावन में मेघ अपना कर्ज़ उतारेंगे। यही वह जीवन-दर्शन है जो “जेठ तपै तो सावन बरसे” जैसी लोकोक्ति में सिमटा हुआ है और जिसके भीतर छुपी है नौतपा की अत्यंत महत्त्वपूर्ण परंपरा।
नौतपा क्या है?
नौतपा का शाब्दिक अर्थ है नौ दिनों का ताप। ज्योतिषशास्त्र और लोक परंपरा दोनों में यह माना जाता है कि जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब लगभग नौ दिन तक पृथ्वी पर असाधारण गर्मी पड़ती है। सामान्यतः यह समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आता है। मई के अंत से जून के आरंभ के बीच। इन नौ दिनों को किसान, ज्योतिषी और लोक-विद्वान सभी मिलकर मानसून की भविष्यवाणी का सबसे महत्त्वपूर्ण संकेत मानते आए हैं।
रोहिणी नक्षत्र का संबंध वृषभ राशि से है और इसे वर्षा का नक्षत्र भी कहते हैं। इसीलिए जब सूर्य इस नक्षत्र में रहते हुए पूरे ताप के साथ तपता है, तो यह माना जाता है कि उसने धरती की नमी को इस प्रकार खींचा है जिससे मानसून की बादल-यात्रा सुगम होगी। जहाँ विज्ञान वायुदाब, तापमान-प्रवणता और समुद्री हवाओं की भाषा बोलता है, वहीं लोक परंपरा इसे एक सहज काव्यात्मक सत्य में कह देती है।
सूर्य रोहिणी नक्षत्र में लगभग 13-15 दिन रहता है। इसमें से पहले नौ दिन “नौतपा” कहलाते हैं। भारतीय पंचांग में रोहिणी नक्षत्र का आरंभ प्रतिवर्ष 25 मई के आस-पास होता है। इन दिनों में सूर्य की किरणें सर्वाधिक लंबवत होती हैं और उत्तरी भारत का तापमान 45-48 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है।
लोक कथाओं में नौतपा की छवि
ग्रामीण भारत में नौतपा को लेकर अनेक लोककथाएँ प्रचलित हैं। राजस्थान के मारवाड़ अंचल में एक पुरानी कहानी सुनाई जाती है कि एक बार इंद्रदेव किसी कारण से रुष्ट हो गए और उन्होंने वर्षा न करने की ठान ली। तब सूर्यदेव ने धरती को इतनी तेज़ी से तपाया कि समुद्र का पानी भाप बनकर ऊपर उठने लगा और इंद्र को मजबूरन बादल भेजने पड़े। इस कथा में नौतपा की भूमिका एक दूत की तरह है सूर्य का संदेश लेकर इंद्र तक पहुँचनेवाला।
बुंदेलखंड की एक अन्य लोककथा में नौतपा को “सासू की कड़वी बोली” की उपमा दी गई है कि जितनी कठोर सास, उतनी ही मेहनती बहू, और उतनी ही समृद्ध घर की खेती। कहा जाता है, “जेठ की जलन सावन की फ़सल का बीज है।” यह रूपक अत्यंत गहरा है पीड़ा और फल का, श्रम और पुरस्कार का, प्रतीक्षा और सफलता का।
अवध क्षेत्र में नौतपा के दिनों में कुओं और तालाबों के किनारे बुज़ुर्ग एकत्र होते थे। वे आकाश देखते, हवा का रुख परखते और कहते “आज का ताप कल की बरखा का दाम है।” यह सामूहिक स्मृति, यह सामुदायिक मौसम-ज्ञान, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है।
कहावतों में समाया ज्ञान
भारतीय लोक-साहित्य में मौसम से जुड़ी कहावतों की एक पूरी दुनिया है। घाघ और भड्डरी नामक दो लोक-कवि इस परंपरा के सबसे प्रसिद्ध प्रतिनिधि हैं। संभवतः मध्यकालीन भारत में उत्तर प्रदेश-बिहार क्षेत्र में हुए घाघ की कहावतें आज भी खेतों में, चौपालों पर और बुजुर्गों की जुबान पर जीवित हैं।
कहे घाघ सुन घाघिनी, स्वान भात की बाधा।।”
— घाघ की कहावत, उत्तर भारतीय लोक-परंपरा
इस दोहे में घाघ कहते हैं कि यदि रोहिणी नक्षत्र में वर्षा हो जाए, मृगशिरा में गर्मी पड़े और आर्द्रा में थोड़ी बहुत तपन रहे, तो अनाज इतना होगा कि कुत्ते को भी भात मिलेगा। अर्थात् ऐसा मौसम अत्यंत शुभ है। इसके उलट, यदि नौतपा में ताप न पड़े, बादल छाए रहें और रोहिणी में वर्षा हो जाए तो यह अकाल का संकेत माना जाता था।
एक और प्रसिद्ध कहावत है “जो तपे नौतपा, सो पाए सुघड़ फ़सला।” यानी जिस वर्ष नौतपा ठीक से तपता है, उस वर्ष खेती-किसानी अच्छी होती है। इसके पीछे एक व्यावहारिक तर्क भी है। जब भूमि की सतह अत्यधिक गर्म हो जाती है, तो वायुदाब का अंतर बढ़ता है, जो मानसूनी हवाओं को तेज़ी से खींचता है।
नौतपा और कृषि-संस्कृति का अटूट बंधन
भारत में खेती और आकाश का रिश्ता हमेशा से प्रेम और निर्भरता दोनों का रहा है। नौतपा इस रिश्ते का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। किसान इन नौ दिनों में खेत की मिट्टी का रंग देखता था, हवा की दिशा का बोध करता था, पशुओं का व्यवहार परखता था ये सब मिलकर उसे यह अंदाज़ देते थे कि इस बार मानसून कैसा रहेगा।
पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह भी कहा जाता था कि नौतपा में यदि चींटियाँ अपने अंडे लेकर ऊपर जाने लगें, तो बारिश जल्दी आएगी। यदि मोर दोपहर को बोलने लगें, तो बादल दूर नहीं। यदि आँधी पश्चिम से आए और उसमें धूल अधिक हो तो अच्छी वर्षा का शकुन। ये सब लोक-विज्ञान के वे सूत्र थे जो किताबों में नहीं, बल्कि अनुभव की पाठशाला में पढ़े जाते थे।
जब नौतपा “न तपे” लोककथाओं में चेतावनी
लोककथाओं में एक बात और कही जाती है, जब नौतपा अपना काम ठीक से नहीं करता, तो क्या होता है। एक पुरानी कहानी में कहा गया है कि एक बार नौतपा के दिनों में बादल छा गए और सूर्य ढक गया। गाँव के लोग प्रसन्न हुए कि शीतलता मिली। लेकिन उस वर्ष सावन में बारिश नहीं हुई, खेत सूख गए और अकाल पड़ा। तब बुजुर्गों ने कहा “जेठ ने तपना छोड़ा तो सावन ने बरसना छोड़ दिया।” यह कहानी एक गहरा सन्देश देती है कि प्रकृति की हर प्रक्रिया का अपना समय और अपना अनुशासन है।
ऐसे वर्षों को “उलटा साल” कहते थे जब मौसम का क्रम बिगड़ जाए। और “उलटे साल” का दोष केवल प्रकृति को नहीं, मनुष्य की अनीति को भी दिया जाता था। कहते थे, “जब मनुष्य धर्म से विचलित होता है, तब सूरज भी रोहिणी में नहीं तपता।” यह मान्यता भले ही वैज्ञानिक न हो, पर इसमें एक नैतिक चेतावनी अवश्य थी।
आधुनिक समय में नौतपा की प्रासंगिकता
आज जब हम जलवायु परिवर्तन की बात करते हैं, तो नौतपा की परंपरा एक नई रोशनी में दिखती है। वर्तमान समय में वैज्ञानिक मानते हैं कि मानसून की गुणवत्ता और भूमि-सतह के तापमान के बीच एक सीधा संबंध है। उत्तर भारत और पाकिस्तान का तीव्र गर्म होना वास्तव में मानसूनी हवाओं को बंगाल की खाड़ी से खींचता है। इस अर्थ में “जेठ तपै तो सावन बरसे” की कहावत एक वैज्ञानिक अवलोकन भी है जो हज़ारों वर्षों के अनुभव ने सिखाया।
लेकिन आज जब ग्रीनहाउस गैसों ने तापमान को अनियमित कर दिया है, जब मई में ओले पड़ते हैं और जुलाई में सूखा रहता है तब ये पुरानी कहावतें एक विलाप की तरह लगती हैं। किसान कहते हैं, “पहले जेठ में तपता था तो मन को भरोसा रहता था। अब तो कोई भरोसा नहीं।” यह संकट केवल मौसम का नहीं, एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति के अप्रासंगिक होते जाने का भी है।
नौतपा एक रूपक जो जीवन सिखाता है
शायद नौतपा की सबसे बड़ी देन यह है कि इसने भारतीय मानस को एक दार्शनिक सत्य से परिचित कराया कि पीड़ा और आनंद एक ही सूत्र में बँधे हैं। जिस तरह बीज को ज़मीन की कठोरता में दबकर अंकुर बनना पड़ता है, जिस तरह सोने को आग में तपकर कुंदन बनना पड़ता है, उसी तरह जेठ का ताप सावन की वर्षा का पूर्वाभ्यास है।
भारत की लोक-संस्कृति ने कभी भी कठिनाई को शाप नहीं माना, उसे एक आवश्यक संधि माना। नौतपा इसी दर्शन का मूर्त रूप है। जब बच्चे गर्मी से बिलबिलाते थे, तो दादी कहती — “अरे, जेठ नहीं तपेगा तो सावन कहाँ से आएगा? इस तपन को झेलो, बारिश आएगी।” यह केवल मौसम की बात नहीं थी, यह जीवन जीने का तरीका था।
जब अगली बार मई के अंत में आकाश दहकने लगे, लू चलने लगे और लोग कहें “इस बार नौतपा बहुत तेज़ है” तो याद रखें, वे केवल शिकायत नहीं कर रहे। वे एक हज़ार साल पुरानी उम्मीद को दोहरा रहे हैं कि जेठ जितना तपेगा, सावन उतना ही बरसेगा। और जब नौतपा के बाद पहली बारिश की बूँद सूखी धरती पर पड़ती है, जब माटी की खुशबू उठती है तब समझ में आता है कि नौतपा का ताप व्यर्थ नहीं गया। जेठ ने अपना वादा निभाया, सावन ने अपना।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

