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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: मूक-बधिर पीड़िता की गवाही को माना विश्वसनीय, आरोपी की उम्रकैद बरकरार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए मूक-बधिर यौन उत्पीड़न पीड़िता की विशेष तरीके से दर्ज की गई गवाही को पूरी तरह विश्वसनीय माना है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई “आजीवन कारावास (मृत्यु तक)” की सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 16 मार्च को यह फैसला सुनाया। आरोपी ने मार्च 2023 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने निचली अदालत के निर्णय को सही ठहराया।

विशेष तरीके से दर्ज हुई गवाही

सुनवाई के दौरान सामने आया कि पीड़िता सुनने और बोलने में असमर्थ है, जिसके चलते उसकी गवाही दर्ज करने के लिए ट्रायल कोर्ट ने अनोखा तरीका अपनाया। कोर्ट ने एक प्लास्टिक डॉल (गुड़िया) और सांकेतिक भाषा के जानकार दुभाषिए की मदद से पीड़िता से घटना की जानकारी ली।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह तरीका न केवल उचित था, बल्कि इससे पीड़िता की बात स्पष्ट रूप से सामने आई और गवाही भरोसेमंद बनी।

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गवाही में रहा निरंतरता

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पीड़िता ने घटना के तुरंत बाद अपनी मां को इशारों के जरिए पूरी जानकारी दी थी और आरोपी का नाम भी बताया था। उसकी यह बात एफआईआर और जांच के दौरान दिए गए बयान से भी मेल खाती है, जिससे उसकी गवाही और मजबूत होती है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़िता की शारीरिक अक्षमता के बावजूद उसकी मानसिक स्थिति सामान्य है और वह घटना को समझने व व्यक्त करने में सक्षम है।

कानून का स्पष्ट सिद्धांत

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर किसी गवाह की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता कि वह मूक-बधिर है। यदि उसकी बात इशारों या संकेतों के माध्यम से और योग्य दुभाषिए की मदद से सामने आती है, तो वह पूरी तरह मान्य साक्ष्य मानी जाएगी।

अदालत ने यह भी दोहराया कि यौन अपराधों में पीड़िता की अकेली गवाही भी, यदि विश्वसनीय हो, तो सजा का आधार बन सकती है।

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आरोपी की दलील खारिज

आरोपी के वकील ने दलील दी थी कि ट्रायल कोर्ट का फैसला तथ्यों और साक्ष्यों के अनुरूप नहीं है और केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। हालांकि, राज्य की ओर से पेश अधिवक्ता ने इस तर्क का विरोध करते हुए कहा कि सभी साक्ष्य आरोपी के खिलाफ मजबूत हैं।

सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है और मामले में किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।