पितरों के माध्यम से प्रकृति की अनंत ऊर्जा से जुड़ने और आदर्श समाज निर्माण का संदेश
पितृमोक्ष अमावस्या शरद ऋतु के समापन और हेमन्त के आरंभ की तिथि है। ऋतुओं के इस मिलन से मौसम परिवर्तन
Read Moreपितृमोक्ष अमावस्या शरद ऋतु के समापन और हेमन्त के आरंभ की तिथि है। ऋतुओं के इस मिलन से मौसम परिवर्तन
Read Moreसृष्टि के निर्माता भगवान विश्वकर्मा किसी एक समाज के आराध्य देव नहीं हैं, वे सकल समाज के अराध्य हैं और उनकी पूजा सकल समाज को करनी चाहिए। प्राचीन काल में देवता सकल समाज के होते थे, वर्तमान में देवताओं को भी लोगों ने जातियों में बांट और बांध लिया। हम हिन्दू समाज में विघटन और संघर्ष का देख रहे हैं, उसका मुख्य कारण यही है।
Read Moreभगवान गणेश का वैश्विक संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी पूजा का स्वरूप और महत्त्व अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न हो सकता है, लेकिन उनका प्रतीकात्मक महत्व लगभग समान है—विघ्नहर्ता, बाधाओं को हरने वाले और ज्ञान, समृद्धि व सौभाग्य के दाता के रूप में।
Read Moreउपनिषद काल में भी गणपति की पूजा की परम्परा रही। गणपत्युपनिषद इसका प्रमाण है, जिसमें गणेश जी को कर्ता-धर्ता और प्रत्यक्ष तत्व कहा गया है। जिनके रूपों में साक्षात ब्रह्म व आत्मस्वरूप बताया गया है। स्मृति काल में भी गणेश पूजा का विधान रहा। नवग्रहों के पूजन के पूर्व गणेश की पूजा करने का निर्देश है। इनसे ही लक्ष्मी की प्राप्ति सम्भव होती है। पुराण युग में इस पूजा का उज्ज्वल रूप में उदय हुआ।
Read Moreआदिकाल से गणेश की स्तुति के अलग अलग प्रमाण मिले हैं। इनकी कथा भिन्न-भिन्न है। सतयुग में सिंहासन आरूढ़ विनायक के स्वरूप में पूजा गया जिनकी दस भुजा थी परन्तु मुख तो हाथी का ही था। त्रेतायुग में गणेश मयूरारूढ़, मयूरेश्वर के नाम से विख्यात थे जिनकी छह भुजा थी। द्वापर में इनका वाहन भूषकराज था तब इनकी चार भुजाएं थी। कलि के अंत में ये धुम्रकेत के नाम से अश्व में सवार होंगे इनका वर्ण भी धुम्र होगा।
Read Moreविघ्ननाशक और सिद्धि विनायक गणेश या गणपति की विनायक के रूप में पूजन की परंपरा प्राचीन है किंतु पार्वती अथवा गौरीनंदन गणेश का पूजन बाद में प्रारंभ हुआ। ब्राह्मण धर्म के पांच प्रमुख सम्प्रदायों में गणेश जी के उपासकों का एक स्वतंत्र गणपत्य सम्प्रदाय भी था जिसका विकास पांचवीं से आठवीं शताब्दी के बीच हुआ।
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