Author: News Editor

futuredधर्म-अध्यात्म

गुरूपूर्णिमा पर राष्ट्र के प्रति समर्पण ही है सच्ची दक्षिणा

छत्रपति शिवाजी ने समर्थ गुरू रामदास के चरणों में सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य को आततायी मुगलों से मुक्त करवाकर अर्पित कर दिया। गुरू चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य के माध्यम से नवभारत की स्थापना का संकल्प सिद्ध किया। ऐसे अनेक उदाहरण भारतीय इतिहास में प्रत्यक्ष हैं । विविध धर्म, संप्रदाय, वर्ग, विचार से जुड़े श्रद्धालु अपने – अपने सिद्ध गुरूओं के प्रति आदरभाव अभिव्यक्त करते हुए उनका पूजन और दक्षिणा अर्पण करते हैं।

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futuredधर्म-अध्यात्म

जो आत्मवोध कराये वह गुरु है : गुरु पूर्णिमा विशेष

“जो आत्मवोध कराये वह गुरु है,  मनुष्य या प्राणी का जीवन तो सीमित होता है। समय और आयु अवस्था उनकी क्षमता और ऊर्जा को प्रभावित करती है, अतएव गुरु चिरजीवी होना चाहिए”।

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futuredधर्म-अध्यात्महमारे नायक

भागो मत, सामना करो स्वामी विवेकानंद

“यह सबके जीवन के लिए एक सबक है कि संकट का सामना करो, वीरता से सामना करो। बंदरो की तरह जीवन की कठिनाईयां भी पीछे हट जाएंगी, यदि हम उनसे दूर भागने की वजाय निडर होकर सामने खड़े हो जाएं । कायर कभी भी विजय हासिल नहीं कर सकता। हमें डर और कष्टों का सामना करना होगा, उनके स्वतः दूर चले जाने की आशा छोड़कर ।

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futuredविविधस्वास्थ्य

ॠतुओं के अनुसार भोजन करें और स्वस्थ रहें

हमारे पूर्वज स्वस्थ रहा करते थे एवं प्रसन्नता से अपनी पूरी उम्र जी कर जाते थे। आज व्याधियों के कारण अकाल मृत्यू का प्रतिशत बढ गया है। हम तीस चालिस बरस पीछे का हमारा जीवन देखें तो हम हमेशा ॠतु में होने वाली उपज का ही सेवन करते थे। भारत में वर्षा, शीत एवं ग्रीष्म तीन प्रमुख ॠतुएं होती हैं। वर्षाकाल में हरी सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता था। ग्रीष्म ॠतु में ही वर्षाकाल के भोजन की तैयारी कर ली जाती थी।

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futuredछत्तीसगढ

‘दायरा’ का नया एल्बम ‘जादू बस्तर’: एक संगीत यात्रा

दायरा ने बस्तर के स्थानीय संगीतकारों के साथ मिलकर गोंडी, भतरी और हल्बी भाषाओं में पाँच लोक गीतों को हिंदी में अनुवादित किया है, जिससे लोक और आधुनिक संगीत का सुंदर मिश्रण प्रस्तुत किया गया है। एल्बम में पाँच ट्रैक शामिल हैं,

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futuredमनकही

लेखक का लेखन कब मरता है ?

जब कलम किराये पर चढ़ जाती है, तो लेखन कमजोर पड़ जाता है। लेखक की कलम को जब और कहीं से मार्गदर्शन मिलता है, तो वे धीरे-धीरे लेखक मरने लगता हैं। उनकी आत्मा की प्रखरता और तेजस्विता समाप्त हो जाती है। शब्दों की शक्ति कमजोर हो जाती है, और विचारों में गहराई नहीं रह जाती।

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