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नारी शक्ति की सशक्त प्रतीक देवी अहिल्या बाई

रेखा पाण्डेय (लिपि)

भारतीय संस्कृति में नारी महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय संस्कृति की स्त्री आदर्श, धैर्य, साहस, प्रेम, त्याग उदारता की प्रतीक अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के चौंडी नामक ग्राम में हुआ था। पिता मंकोजी शिंदे एक सामान्य किसान एवं गांव के पाटिल थे एवं माता सुशीला बाई की इकलौती सन्तान थीं। उस समय बालिकाओं को शिक्षा नहीं दी जाती थी,परन्तु पिता ने अहिल्याबाई को पढ़ने-लिखने लायक बनाया। स्वभाव से सीधी,सरल एवं ईश्वर पर विश्वास रखने वाली कन्या थीं।

साधारण शिक्षित अहिल्याबाई 10 वर्ष की अल्पायु में ही मालवा में इतिहासकार ई. मार्सडेन के अनुसार होल्करवंशीय राज्य के संस्थापक मल्हारराव होल्कर के पुत्र खण्डेराव के साथ परिणय सूत्र में बंध गई थीं।1745 में अहिल्याबाई को एक पुत्र हुआ जिसका नाम मालेराव और तीन वर्ष पश्चात एक पुत्री जिसका नाम मुक्ताबाई रखा।

उन्होंने बड़ी कुशलता से अपने पति के गौरव को बढ़ाया। कुछ ही दिनों में अपने महान पिता के मार्गदर्शन में खण्डेराव एक अच्छे सिपाही बन गए, मल्हारराव को भी देखकर संतोष होने लगा। पुत्र-वधू अहिल्याबाई को भी वह राज काज की शिक्षा देते रहते थे। उनकी बुद्धि और चतुराई से वह बहुत प्रसन्न होते थे।

मल्हारराव होल्कर के जीवनकाल में ही खांडेराव होलकर 1754 के कुम्भेर युद्ध में शहीद हुए थे। होल्कर वंश के संस्थापक मल्हार राव होल्कर का शासन मालवा से लेकर पंजाब तक था। 1766 में इनकी मृत्यु हुई। मालवा इलाके के वे पहले मराठा सूबेदार हुए। इसके एक साल बाद उन्होंने मालवा राज्य का शासन भार संभाला।

अहिल्याबाई होल्कर किसी बड़े राज्य की रानी नहीं थी परंतु उन्होंने जो कुछ किया वह निश्चित ही आश्चर्यजनक था। वह वीर योद्धा एवं कुशल तीरंदाज थीं। उन्होंने कई युद्धों में अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए हाथी पर सवार होकर युद्ध भी लड़े। अपने साम्राज्य को मुस्लिम आक्रमणकारियों से बचाने का प्रयास करती रहीं।

अहिल्याबाई ने जब शासन को संभाला तब राज्य में बड़ी अशांति थी। जनता चोर-डाकुओं के आतंक से परेशान थी। ऐसे में उन्होंने सोचा राजा का पहला कर्त्तव्य अपनी प्रजा को शांति और सुरक्षा प्रदान करना होता है। इस उपद्रव में भीलों का विशेष हाथ था। तब उन्होंने ने दरबार बुला कर घोषणा की -’जो वीर पुरूष इन उपद्रवियों को काबू में ले आएगा उसके साथ मैं अपनी पुत्री मुक्ताबाई का विवाह कर दूंगी।’

इस घोषणा को सुनकर यशवंतराव फणसे ने बड़ी विनम्रता से इस चुनौती को स्वीकार करते हुए कम समय मे ही राज्य में शांति की स्थापना कर दी। रानी अत्यधिक प्रसन्न हुई और अपनी पुत्री मुक्ताबाई का विवाह यशवंतराव फणसे से कर दिया। इसके बाद वे शासन के आंतरिक कार्यों में बड़ी गम्भीरता से ध्यान देने लगीं।

राज्य में शांति सुरक्षा की स्थापना होते ही व्यापार-व्यवसाय एवं कला-कौशलों में वृद्धि होने लगी। लोगों को ज्ञान उपासना का अवसर भी मिलने लगा। मल्हारराव के भाई बन्धवों में तुकोजीराव होल्कर एक विश्वासपात्र युवक थे मल्हारराव ने उन्हें सदा अपने साथ रखा और राजकाज के लिए तैयार कल लिया था।

सनातन के मानबिंदूओं को पुनर्प्रतिष्ठित करने वाली महारानी देवी अहिल्याबाई

अहिल्याबाई होल्कर ने तुकोजीराव होल्कर को अपना सेनापति नियुक्त किया और चौथ वसूलने का कार्य सौंपा। तुकोजीराव अहिल्याबाई से बड़े थे किंतु उन्हें अपनी माता समान ही मानते थे। राज्य कार्य को सच्ची लगन से करते थे। अहिल्याबाई का उन पर प्रेम और विश्वास था। उन्हें पुत्रवत मानती थीं। राजकीय कार्यों में जहां कहीं उनका उल्लेख आता है वहां तथा मुहरों पर ‘खण्डोजी सुत तुकोजी होल्कर’ लिखा गया है।

तीक्ष्ण बुद्धि, स्वस्फूर्त शासक के रूप में अहिल्याबाई ने अपने साम्राज्य को समृद्ध बनाने हेतु अनेक कार्य किए। अपने कालखंड 1767 -1795 तक में अनेक किलों का निर्माण, विश्रामगृह, कुएं, बावड़ियां एवं मार्गों का निर्माण करवाया। भूखों के लिए अन्न क्षेत्र तथा प्यासों के लिए प्याऊ बनवाए। मन्दिरो में विद्वानों की नियुक्ति की ताकि शास्त्रों का मनन-चिंतन और प्रवचन होता रहे। भारत के प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में मन्दिर, घाट बनवाए।

उन्होंने लोगों के रहने के लिए बहुत सी धर्मशालाएं भी बनवाईं। ये सभी धर्मशालाएं उन्होंने मुख्य तीर्थस्थान जैसे गुजरात के द्वारका, काशी विश्वनाथ, वाराणसी का गंगा घाट, उज्जैन, नाशिक, विष्णुपद मंदिर और बैजनाथ के आस-पास ही बनवाईं।

मुस्लिम आक्रमणकारियों के द्वारा तोड़े गए मन्दिरों को देखकर ही उन्होंने सोमनाथ में शिवजी का मंदिर बनवाया। जो आज भी हिंदुओं द्वारा पूजित है। कलकत्ता से बनारस तक कि सड़कें, बनारस में अन्नपूर्णा का मन्दिर, गया में विष्णु मन्दिर, काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्री नारायण,रामेश्वर, जगन्नाथपुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों पर मन्दिर, धर्मशालाएं बनवाईं।

इंदौर को एक गांव से सुंदर शहर बनाया, मालवा में कई किमी सडकों का निर्माण करवाया। सत्ता संभालने के बाद रानी अहिल्याबाई ने अपनी राजधानी महेश्वर ले गईं। वहां 18वीं सदी का अनुपम अहिल्या महल का निर्माण किया। पवित्र नर्मदा के तट पर बने इस महल के आसपास राजधानी की पहचान बनी टेक्सटाइल इंड्रस्ट्री।

उस समय महेश्वर साहित्य, मूर्तिकला, संगीत, और कला के क्षेत्र में एक गढ़ के रूप मे स्थापित हो चुका था। मराठी कवि मोरोपंत, शाहिर अंनत फंडी और संस्कृत विद्वान खुलासीराम उनके कालखण्ड के महान व्यक्तित्व थे। अहिल्याबाई का मानना था कि धन व प्रजा ईश्वर ने धरोहर स्वरूप प्रदान की हैं। जिसकी वे मात्र संरक्षक हैं। प्रजाहित उनका प्रथम कर्तव्य है। वे सभी त्यौहार प्रजा के साथ मनाती व हिंदु मंदिरों में दान देती थीं।

उत्तराधिकारी न होने की स्थिति में अहिल्याबाई ने प्रजा को दत्तक लेने का अधिकार प्रदान किया ताकि उनकी प्रजा को स्वाभिमान के साथ जीवन जीने का अधिकार मिल सके। प्रजा के सुख- दुःख का विशेष ध्यान रखते हुए प्रजा के साथ मिलकर न्यायपूर्ण निर्णय लेती थीं। जातिभेद का इनके राज्य में कोई स्थान नहीं था। समस्त प्रजा को समान रूप से आदर सम्मान प्राप्त था।

अहिल्याबाई नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थीं। उन्होंने नारी शक्ति का भरपूर उपयोग किया। उनकी विशेष सेविका नारी ही थी। अपने शासन काल में उन्होंने नदियों में जो घाट स्नान आदि के लिए बनवाये थे उनमें महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था हुआ करती थी। स्त्रियों के मान -सम्मान का विशेष ध्यान रखा जाता था। लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने का जो घरों में थोड़ा बहुत चलन था उसे विस्तार प्रदान किया। आत्मप्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग करके सदैव न्याय करने का पक्षधर रहीं।

अहिल्या बाई होल्कर उसी परंपरा में थीं जिसमे समकालीन पूना के न्यायाधीश रामशास्त्री थे और उनके पीछे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई हुई। इनके विशाल व्यक्तित्व के कारण जनता इन्हें देवी तुल्य मानने लगी थी। शासन व्यवस्था के नाम पर हो रहे अत्याचारों से जब सामान्य जनता, किसान, मजदूर अत्यंत दीन-हीन अवस्था में कष्ट भोग रहे थे। उनका एकमात्र सहारा धर्म अंध-विश्वासों और रूढ़ियों में कसा जा रहा था। न्याय में न शक्ति थी और न ही विश्वास ऐसे संकटकाल में अहिल्या बाई ने जो किया वह चिरस्मरणीय रहेगा।

राज्य को विस्तार के लिए उन्होंने तहसीलों और जिलों में बांट दिया। प्रजा एवं शासन की सुविधा का ध्यान रखते हुए। तहसीलों और जिलों के केंद्र बनाए। आवश्यकता के अनुसार न्यायालयों की स्थापना की। राज्य की सारी पंचायतों को व्यवस्थित किया एवं न्याय पाने की सीढ़ियां बना दी। आख़िर अपील मंत्री सुनते थे। परन्तु उनके फैसले से किसी को सन्तोष नहीं होता तो महारानी स्वयं अपील सुनती थीं।

रानी का जीवन वैराग्य, कर्तव्य पालन और परमार्थ का था। वे शिव भक्त थीं उन्होंने अपना सारा राज्य शंकर को अर्पित कर रखा था। स्वयं उनकी सेविका बन कर शासन करती थीं। ‘संपति सब रघुपति के आहि’ सारी संपत्ति भगवान की है। इसलिए राजाज्ञाओं पर हस्ताक्षर करते समय नीचे केवल शंकर लिखती थीं। उनके रुपयों पर शिवलिंग और बिल्वपत्र चित्र अंकित है और पैसों पर नन्दी का। तब से लेकर भारतीय स्वराज्य की प्राप्ति तक इंदौर के सिंहासन पर जितने भी नरेश हुए सभी के शासक काल में राजाज्ञाएं श्री शंकर की आज्ञा बिना अमल नही होती थी।

अहिल्याबाई होल्कर एक दार्शनिक शासिका के रूप में जानी जाती हैं। मल्हारराव होल्कर के पुत्र खंडेराव की मृत्यु पश्चात अहिल्याबाई होल्कर ने राजधानी की शासिका के रूप में स्वयं को तथा सैनिक कार्यवाहियों के लिए तुकोजी राव होल्कर को मुख्याधिकारी के रूप में नियुक्त किया। शेष पर अहिल्याबाई कठोर नियंत्रण रखती थीं। तुकोजी राव इनके कार्यवाहक अधिकारी के रूप में इनकी इच्छाओं और आदेशों का पालन करते हुए विभिन्न अभियानों एवं अन्य कार्यों का संचालन करते थे। इसप्रकार द्वैध शासन की भी स्थापना हुई।

इस महान शासिका ने कालांतर में पुत्र मालेराव, दोहित्र नत्थू, दामाद फणसे, पुत्री मुक्ता की भी मृत्यु होने पर पूरी तरह हताश होने के बाद भी स्वयं को संभालते हुए प्रजा हित में अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों का निर्वहन बड़ी कुशलता एवं निष्ठा से किया। राज्य की चिंता एवं प्रियजनों का विछोह का शोकभार रानी अहिल्याबाई अधिक सहन नहीं कर सकीं 13 अगस्त 1795 को इनकी जीवन लीला समाप्त हो गई।

इनके बाद तुकोजी ने इंदौर के राज्य संभाला। इस महान शासिका के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप इंदौर घरेलू हवाई अड्डे का नाम देवी अहिल्याबाई होल्कर हवाई अड्डा रखा गया है एवं इंदौर विश्वविद्यालय का नाम देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय नाम दिया गया है। महाराष्ट्र सरकार ने अहमदनगर नाम बदलकर अहिल्या नगर कर दिया है। उत्तरप्रदेश शासन द्वारा अहिल्याबाई भेंड़ बकरी विकास योजना चलाई जा रही है। साथ ही अनेक जन कल्याणकारी योजनाएँ भी बनाई हैं।

स्वतंत्र भारत में अहिल्याबाई होल्कर का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। एक ऐसी महारानी जिन्होंने मानवता की भलाई के लिए कार्य किया इनका जीवन परिचय अलग अलग राज्यों की पाठ्यपुस्तकों में प्राप्त होता है। भारत सरकार तथा राज्य सरकारों ने इनकी प्रतिमाएं बनवाईं हैं। इस तरह देवी अहिल्याबाई की ख्याति उनके द्वारा किये गये जनकल्याण के कार्यों कारण जनमानस में अमर रहेगी।

 

लेखिका हिन्दी साहित्यकार एवं व्याख्याता हैं।

One thought on “नारी शक्ति की सशक्त प्रतीक देवी अहिल्या बाई

  • May 31, 2024 at 06:17
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    आपका लेख तथ्य एवम शोधपरक है।आपको धन्यवाद एवम साधुवाद!
    🙏🙏
    मेरी जानकारी के अनुसार, काशी में असली मंदिर को मुगलों द्वारा मस्जिद में परिवर्तित कर देने के कारण, काशी का वर्तमान विश्वनाथ शिवालय इन्होंने ही बनवाया था।
    गंगोत्री का मंदिर भी इन्होंने ही बनवाया था, बाद में भूकंप में नष्ट हो जाने के कारण, गोरखों ने बनवाया। उत्तराखंड के बद्रीनाथ, आदि कई मंदिरों का जीर्णोंद्धार भी करवाया।
    क्या मेरी जानकारी दुरुस्त है ?

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