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भोग से योग की यात्रा का पर्व: योगिनी एकादशी

आचार्य ललित मुनि

कभी कभी जीवन की कोई सामान्य सी घटना मन में प्रश्न बनकर ठहर जाती है। मनुष्य जानता है कि कौन सा कार्य आवश्यक है, फिर भी आकर्षण उसे दूसरी ओर खींच ले जाता है। कर्तव्य सामने होता है, लेकिन मन अपनी पसंद के सुख में उलझा रहता है। मनुष्य के जीवन का बड़ा संघर्ष ही शायद यह है कि वह जानता कुछ है, चाहता कुछ है और करता कुछ और है।

इसी चिंतन के बीच योगिनी एकादशी की कथा सामने आती है। पहली दृष्टि में यह एक व्रत की धार्मिक कथा दिखाई देती है, लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो इसमें मनुष्य की आसक्ति, कर्तव्य से विचलन, उसके परिणाम, पश्चात्ताप और पुनर्निर्माण की पूरी यात्रा दिखाई देती है।

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। योगिनी एकादशी की कथा का आरंभ अलकापुरी से होता है। धन के अधिपति कुबेर भगवान शिव के उपासक थे। उनकी पूजा के लिए मानसरोवर से पुष्प लाने का दायित्व हेममाली नामक यक्ष पर था। हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी बताया गया है। एक दिन वह पुष्प लेकर लौटा, लेकिन पत्नी के प्रति आसक्ति के कारण अपने दायित्व को भूल गया।

समय बीतता गया और कुबेर की पूजा के लिए पुष्प नहीं पहुँचे। कारण ज्ञात होने पर कुबेर ने क्रोधित होकर हेममाली को शाप दिया। शाप के कारण वह अपने स्थान, सुख और पत्नी से वंचित होकर अत्यंत कष्टपूर्ण जीवन भोगने लगा। कथा परम्परा में उसके शरीर को रोगग्रस्त बताया गया है।

शापित हेममाली भटकते हुए अंततः हिमालय क्षेत्र में मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम तक पहुँचता है। ऋषि उसकी दशा देखकर कारण पूछते हैं। हेममाली अपने कर्म को छिपाता नहीं, बल्कि अपनी भूल स्वीकार करता है। तब मार्कण्डेय ऋषि उसे आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत करने का मार्ग बताते हैं। कथा के अनुसार व्रत के प्रभाव से वह अपने कष्ट और रोग से मुक्त होकर पूर्व स्थिति प्राप्त करता है।

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यहीं योगिनी एकादशी भोग से योग की यात्रा का पर्व बन जाती है। भोग अपने आप में जीवन का निषेध योग्य पक्ष नहीं है। भारतीय चिंतन जीवन को त्यागने की नहीं, उसे मर्यादित और संतुलित करने की शिक्षा देता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब भोग विवेक पर अधिकार कर लेता है और मनुष्य साधन तथा साध्य का अंतर भूल जाता है। हेममाली का अपराध पत्नी से प्रेम नहीं था, बल्कि आसक्ति के कारण कर्तव्य को भूल जाना था।

योग का अर्थ केवल शरीर की कुछ मुद्राओं तक सीमित नहीं है। अपने व्यापक अर्थ में योग बिखरी हुई चेतना को केंद्रित करने की प्रक्रिया है। मन जब विषयों के आकर्षण में निरंतर दौड़ता रहता है, तब मनुष्य स्वयं से दूर होता जाता है। संयम उसे अपने केंद्र की ओर लौटाता है। इस दृष्टि से एकादशी का उपवास भोजन का निषेध मात्र नहीं, बल्कि इच्छाओं पर अपने अधिकार की साधना है।

व्रत शब्द में भी संकल्प का भाव निहित है। केवल भोजन छोड़ देना व्रत की पूर्णता नहीं हो सकता। यदि पेट खाली हो, लेकिन मन क्रोध, छल, ईर्ष्या और विषय चिंतन से भरा रहे, तो उपवास का आध्यात्मिक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। भारतीय व्रत परम्परा में आहार संयम के साथ उपासना, जप, स्मरण, दान, सत्य और सदाचरण को महत्त्व दिया गया है। योगिनी एकादशी की प्रचलित धार्मिक परम्परा भी संयम और विष्णु उपासना पर बल देती है।

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योगिनी एकादशी की कथा में दंड से अधिक महत्त्वपूर्ण सुधार की संभावना है। कुबेर का शाप हेममाली को उसके कर्म के परिणाम तक ले जाता है, लेकिन कथा उसे वहीं छोड़ नहीं देती। मार्कण्डेय ऋषि का आगमन बताता है कि भारतीय जीवन दृष्टि में मनुष्य अपनी एक भूल का स्थायी बंदी नहीं है। उसके लिए लौटने का मार्ग खुला है। साधना, संयम और आत्मबोध के माध्यम से वह अपने जीवन का पुनर्निर्माण कर सकता है।

यह विचार आज के समय में विशेष महत्त्व रखता है। आधुनिक जीवन ने भोग के साधनों को असाधारण रूप से बढ़ा दिया है। बाजार मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने तक सीमित नहीं है, वह लगातार नई इच्छाएँ भी पैदा करता है। मोबाइल की स्क्रीन से लेकर उपभोग की वस्तुओं तक मनुष्य के ध्यान को खींचने के असंख्य साधन उपस्थित हैं। सुविधा बढ़ी है, लेकिन मन की स्थिरता उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। हमारे समय का हेममाली किसी अलकापुरी में नहीं, हमारे अपने भीतर बैठा हो सकता है, जो जानता है कि उसका कर्तव्य क्या है, लेकिन आकर्षणों के बीच उसे टालता रहता है।

एकादशी की परम्परा भारतीय कालबोध का भी महत्त्वपूर्ण पक्ष है। प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि पर आने वाली एकादशी जीवन में नियमित अंतराल पर संयम और आत्मनिरीक्षण का अवसर देती है। मनुष्य यदि निरंतर उपभोग में लगा रहे तो वह अपने भीतर की आवाज सुनने की क्षमता खो सकता है। व्रत दैनिक जीवन की गति में एक विराम है, जिसमें मनुष्य स्वयं से पूछ सकता है कि वह किस दिशा में जा रहा है।

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योगिनी एकादशी की कथा में मार्कण्डेय ऋषि की भूमिका भी विचारणीय है। हेममाली स्वयं अपने संकट से बाहर नहीं निकल पा रहा था। उसे ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो उसके दुःख का कारण समझे और मार्ग बताए। भारतीय परम्परा में गुरु, ऋषि और संत की आवश्यकता इसी बिंदु पर दिखाई देती है। वे मनुष्य के स्थान पर यात्रा नहीं करते, लेकिन दिशा अवश्य बताते हैं। व्रत हेममाली को ही करना था। ऋषि केवल मार्गदर्शक थे।

इस कथा का एक मानवीय पक्ष यह भी है कि व्यक्ति की एक भूल उसके पूरे जीवन की अंतिम परिभाषा नहीं बननी चाहिए। समाज में दंड की व्यवस्था आवश्यक हो सकती है, लेकिन सुधार की संभावना उससे अधिक महत्त्वपूर्ण है। जो व्यक्ति अपनी भूल पहचानता है, परिणाम स्वीकार करता है और परिवर्तन के लिए तैयार है, उसके लिए वापसी का मार्ग होना चाहिए। योगिनी एकादशी की कथा इसी आशा को जीवित रखती है।

भोग से योग की यात्रा का अर्थ सुखों से घृणा करना नहीं, बल्कि सुखों का स्वामी बनना है। जो मनुष्य अपनी इच्छाओं का दास है, वह साधनों से संपन्न होकर भी स्वतंत्र नहीं है। इसके विपरीत जो अपनी इच्छाओं को दिशा दे सकता है, वही भीतर से स्वतंत्र है। योगिनी एकादशी का संदेश इसी स्वतंत्रता की ओर संकेत करता है।