उत्तराखंड की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में मदरसा शिक्षा व्यवस्था में सुधार पर विचार क्यों आवश्यक है

शिक्षा किसी भी समाज के सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक विकास की आधारशिला होती है। भारतीय संविधान में शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में गुणवत्तापूर्ण, समावेशी और आधुनिक शिक्षा पर बल दिया गया है। इसी संदर्भ में मदरसा शिक्षा व्यवस्था का आधुनिकीकरण एक महत्वपूर्ण विषय बनकर उभरा है। उत्तराखंड राज्य ने मदरसा शिक्षा में सुधार की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी इस व्यवस्था में सुधार पर विचार करना न केवल आवश्यक है बल्कि समय की मांग भी है।
उत्तराखंड सरकार ने मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने के लिए अनेक सुधार किए हैं। राज्य में मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को राष्ट्रीय शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम के अंतर्गत लाया गया है। इसमें विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान, हिंदी और अंग्रेजी जैसे विषयों को अनिवार्य रूप से शामिल किया गया है। साथ ही धार्मिक शिक्षा को एक अलग विषय के रूप में जारी रखा गया है। इस प्रकार बच्चों को आधुनिक ज्ञान के साथ साथ अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी बनाए रखने का अवसर मिलता है।
उत्तराखंड मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें बच्चों के भविष्य को केंद्र में रखा गया है। मदरसों में पढ़ने वाले छात्र अब उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकते हैं। शिक्षा मंत्रालय और मानव संसाधन विकास विभाग के आंकड़े बताते हैं कि जहां आधुनिक पाठ्यक्रम लागू किया गया है, वहां छात्रों के प्रदर्शन और आत्मविश्वास में सुधार देखा गया है। यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय बन सकता है।
छत्तीसगढ़ में भी मदरसा शिक्षा की व्यवस्था मौजूद है। राज्य में अनेक मदरसे धार्मिक शिक्षा प्रदान करते हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश में आधुनिक पाठ्यक्रम का समावेश सीमित है। परिणामस्वरूप इन संस्थाओं में पढ़ने वाले बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा और रोजगार के अवसरों से वंचित रहना पड़ता है। यह स्थिति उनके सर्वांगीण विकास के लिए बाधक है। संविधान की धारा 21A प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार प्रदान करती है। इस दृष्टि से मदरसों में भी राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का समावेश आवश्यक हो जाता है।
छत्तीसगढ़ में मदरसा शिक्षा व्यवस्था में सुधार का एक कारण शैक्षिक समानता है। सभी बच्चों को समान गुणवत्ता की शिक्षा मिलनी चाहिए, चाहे वे किसी भी प्रकार के संस्थान में पढ़ते हों। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इस बात पर बल देती है कि शिक्षा समावेशी और न्यायसंगत हो। यदि मदरसों में केवल धार्मिक शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जाता है और विज्ञान, गणित, भाषा जैसे विषयों की उपेक्षा होती है, तो यह बच्चों के साथ न्याय नहीं है। वे आधुनिक प्रतिस्पर्धी समाज में पिछड़ सकते हैं।
आज के समय में तकनीकी ज्ञान, भाषा कौशल और वैज्ञानिक समझ रोजगार के लिए अनिवार्य हैं। यदि मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को ये कौशल नहीं मिलते तो वे नौकरी के बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। इससे उनका और उनके परिवारों का आर्थिक विकास बाधित होता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं बल्कि व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाना भी है।
जब सभी बच्चे समान पाठ्यक्रम से शिक्षा प्राप्त करते हैं तो उनमें साझा समझ और राष्ट्रीय चेतना का विकास होता है। वे एक दूसरे की संस्कृति, विचारधारा और मूल्यों को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं। यह सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है। संविधान का प्रस्तावना बंधुत्व और एकता की बात करता है। शिक्षा इसका सशक्त माध्यम है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में अनेक सुधार किए हैं। राज्य में स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों की स्थापना की गई है जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। जनजातीय और पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा के विस्तार पर बल दिया गया है। किंतु मदरसा शिक्षा के आधुनिकीकरण पर अभी भी ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि राज्य सरकार इस दिशा में पहल करे तो यह समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
सुधार की प्रक्रिया में संवेदनशीलता आवश्यक है। किसी भी समुदाय की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए शैक्षिक सुधार लागू किए जाने चाहिए। उत्तराखंड मॉडल में यही किया गया है। धार्मिक शिक्षा को बनाए रखते हुए आधुनिक विषयों को जोड़ा गया। यह दृष्टिकोण स्वीकार्य और प्रभावी है। छत्तीसगढ़ में भी इसी प्रकार का मॉडल अपनाया जा सकता है।
शिक्षकों का प्रशिक्षण भी महत्वपूर्ण है। मदरसों में शिक्षण करने वाले अध्यापकों को आधुनिक शिक्षण विधियों और पाठ्यक्रम में प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। राज्य सरकार शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर सकती है। इससे गुणवत्ता में सुधार होगा और छात्रों को बेहतर शिक्षा मिलेगी।
बुनियादी सुविधाओं का विकास भी आवश्यक है। कई मदरसों में पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल मैदान जैसी सुविधाएं नहीं होतीं। राज्य सरकार वित्तीय सहायता और मार्गदर्शन प्रदान कर इन संस्थाओं को मजबूत बना सकती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी बुनियादी सुविधाओं के विकास पर जोर दिया गया है।
समीक्षा और मूल्यांकन की व्यवस्था भी होनी चाहिए। मदरसों में शिक्षा की गुणवत्ता को मापने के लिए नियमित निरीक्षण और परीक्षा प्रणाली लागू की जानी चाहिए। यह सुनिश्चित करेगा कि पाठ्यक्रम प्रभावी रूप से लागू हो रहा है और बच्चों को लाभ मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ में विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि है। राज्य में विभिन्न समुदायों का सहअस्तित्व है। शिक्षा के क्षेत्र में समावेशी दृष्टिकोण इस विविधता को शक्ति बना सकता है। जब सभी बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करते हैं तो राज्य का समग्र विकास संभव होता है।
उत्तराखंड की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में मदरसा शिक्षा व्यवस्था में सुधार एक दूरदर्शी कदम होगा। यह न केवल मुस्लिम समुदाय के बच्चों के हित में है बल्कि संपूर्ण राज्य के विकास के लिए भी आवश्यक है। शिक्षा किसी भी समाज को सशक्त बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम है। जब हम अपने बच्चों को आधुनिक ज्ञान, कौशल और मूल्यों से लैस करते हैं तो हम एक समृद्ध और प्रगतिशील समाज का निर्माण करते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को इस दिशा में पहल करनी चाहिए और समुदाय के साथ मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जो सभी के लिए लाभकारी हो।
इस आशय का छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के चेयरमेन सलीम राज द्वारा मदरसा बोर्ड खत्म करने के आग्रह का लिखा गया मुख्यमंत्री को पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।


