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रामगढ़ को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में लाने के लिए शोध एवं संकल्प की आवश्यकता

आचार्य ललित मुनि

भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल भव्य मंदिरों, दुर्गों और महलों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन स्थलों में भी निहित है जहाँ मानव सभ्यता की यात्रा, धार्मिक आस्था, साहित्यिक सृजन, कला, पुरातत्व और प्रकृति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित रामगढ़ ऐसा ही एक बहुआयामी सांस्कृतिक परिसर है, जो हजारों वर्षों की ऐतिहासिक परंपराओं को अपने भीतर समेटे हुए है। यह स्थल केवल एक पुरातात्विक अवशेष नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के विकास का जीवंत दस्तावेज है।

रामगढ़ में 29-30 जून को महोत्सव मनाया जा रहा है, इस महोत्सव में संकल्प लेना चाहिए कि रामगढ़ की इस बहुमूल्य धरोहर को संरक्षण, शोध और पर्यटन विकास के माध्यम से राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का प्रयास किया जाएगा। यह संस्कृति, पुरातत्व एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल का विधान सभा क्षेत्र हैं, इसलिए इस कार्य को गति मिलने की संभावना बन सकती है।

सभ्यता की अनेक परतों का अद्वितीय संगम
रामगढ़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ मानव सभ्यता के विभिन्न कालखंडों के साक्ष्य एक ही परिसर में प्राप्त होते हैं। आदिमानवों द्वारा उपयोग किए गए प्रस्तर उपकरणों से लेकर लौह युग के प्रमाण, महापाषाण संस्कृति के अवशेष, सती स्तंभ, प्राचीन गुफाएँ, मौर्यकालीन अभिलेख, कालिदास की साहित्यिक स्मृतियाँ और रामायण परंपरा से जुड़े स्थल, सभी एक ही भू-भाग में विद्यमान हैं। यह विविधता भारत के बहुत कम पुरातात्विक स्थलों में देखने को मिलती है।

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रामगढ़ का महत्व केवल इतिहास तक सीमित नहीं है। यहाँ पुरातत्व, साहित्य, धर्म, नाट्यकला, लोकसंस्कृति, प्राचीन उद्योग, पर्यावरण और पर्यटन जैसे अनेक विषय एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। यही कारण है कि यह स्थल बहुविषयक शोध (Multidisciplinary Research) के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जा सकता है।

विश्व की प्राचीनतम नाट्य परंपरा का साक्ष्य
सीताबेंगरा गुफा को अनेक विद्वान विश्व की सबसे प्राचीन नाट्यशालाओं में से एक मानते हैं। इसकी संरचना, दर्शक दीर्घा जैसी व्यवस्था तथा ध्वनि नियंत्रण की तकनीक प्राचीन भारतीय रंगमंच के विकास की ओर संकेत करती है। यदि इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुनः शोध कराया जाए तो भारतीय नाट्य परंपरा के इतिहास में यह स्थल और भी महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

इसी प्रकार सीताबेंगरा में प्राप्त अभिलेख को अनेक विद्वान प्राचीन कवि सम्मेलन का प्रमाण मानते हैं। यह तथ्य यदि व्यापक शोध और अकादमिक विमर्श के माध्यम से स्थापित होता है तो रामगढ़ विश्व साहित्यिक इतिहास में भी विशिष्ट स्थान प्राप्त कर सकता है। जोगीमाड़ा में सुतनुका देवदासी और रुपदक्ष देवीदीन का प्रसिद्ध उत्तर मौर्यकालीन अभिलेख है।

कालिदास, रामायण और बौद्ध परंपरा का संगम
रामगढ़ की पहचान केवल पुरातात्विक स्थल के रूप में नहीं है। इसे महाकवि कालिदास के मेघदूत में वर्णित रामगिरि से भी जोड़ा जाता है। यहाँ की प्राकृतिक छटा, पर्वतीय संरचना और सांस्कृतिक वातावरण कालिदास की काव्य-कल्पना को मूर्त रूप देता प्रतीत होता है।

दूसरी ओर यह क्षेत्र भगवान राम की वनगमन परंपरा से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। साथ ही विद्वानों द्वारा इसे दक्षिणापथ के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मार्ग का पड़ाव बताया गया है, जहाँ से होकर साधु, व्यापारी और यात्री दक्षिण भारत की ओर जाते थे। भगवान बुद्ध के सिरपुर आगमन के संभावित मार्ग के रूप में भी इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार रामगढ़ वैदिक, रामायण, बौद्ध, जैन और साहित्यिक परंपराओं का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।

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यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने की संभावना
रामगढ़ की बहुआयामी विशेषताएँ इसे भविष्य में यूनेस्को विश्व धरोहर (UNESCO World Heritage Site) के लिए संभावित दावेदार बना सकती हैं। यूनेस्को ऐसे स्थलों को विश्व धरोहर घोषित करता है जिनका सांस्कृतिक, ऐतिहासिक या प्राकृतिक महत्व सम्पूर्ण मानवता के लिए असाधारण हो।

रामगढ़ में निम्नलिखित विशेषताएँ विद्यमान हैं:

प्रागैतिहासिक मानव बसाहट के प्रमाण। प्राचीन लौह उद्योग के अवशेष। विश्व की प्राचीनतम नाट्यशालाओं में गिनी जाने वाली सीताबेंगरा गुफा। मौर्यकालीन अभिलेख और शैलचित्र। कालिदास और मेघदूत से जुड़ी साहित्यिक परंपरा। रामायण परंपरा से संबंध। दक्षिणापथ के ऐतिहासिक व्यापारिक एवं सांस्कृतिक मार्ग का प्रमुख पड़ाव। सती स्तंभों और मध्यकालीन सांस्कृतिक अवशेषों की बड़ी संख्या। प्राकृतिक जैव विविधता सांस्कृतिक और पुरातात्विक धरोहरों का एकीकृत स्वरूप।

इन सभी विशेषताओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यदि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राज्य पुरातत्व विभाग, विश्वविद्यालयों और अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों के सहयोग से रामगढ़ पर व्यापक एवं वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए, तो इसे यूनेस्को की संभावित विश्व धरोहर सूची (Tentative List) में सम्मिलित कराने का प्रयास किया जा सकता है।

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शोध और प्रलेखन की आवश्यकता
रामगढ़ के संदर्भ में अभी भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं। यहाँ प्राप्त शिलालेखों, शैलचित्रों, लौह उद्योग के अवशेषों, सती स्तंभों तथा दक्षिणापथ से जुड़े मार्गों पर गहन अनुसंधान की आवश्यकता है। आधुनिक तकनीकों जैसे 3D स्कैनिंग, जीआईएस मैपिंग, ड्रोन सर्वेक्षण और डिजिटल अभिलेखीकरण के माध्यम से सम्पूर्ण परिसर का वैज्ञानिक प्रलेखन किया जाना चाहिए।

यदि रामगढ़ की समग्र सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेजीकरण किया जाए तो यह न केवल शोधार्थियों के लिए अमूल्य सामग्री उपलब्ध कराएगा, बल्कि यूनेस्को जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के समक्ष इसकी विशिष्टता प्रमाणित करने में भी सहायक होगा।

पर्यटन विकास का नया केंद्र
पर्यटन सुविधाओं, व्याख्या केंद्रों, संग्रहालयों, शोध संस्थानों, सांस्कृतिक उत्सवों और स्थानीय हस्तशिल्प बाजारों की स्थापना से यह क्षेत्र आर्थिक रूप से भी समृद्ध हो सकता है। स्थानीय युवाओं को गाइड, शोध सहायक, पर्यटन उद्यमी और सांस्कृतिक दूत के रूप में रोजगार प्राप्त हो सकता है।

यदि समुचित संरक्षण, वैज्ञानिक शोध, प्रभावी प्रलेखन और दूरदर्शी पर्यटन नीति अपनाई जाए तो वह दिन दूर नहीं जब रामगढ़ का नाम यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की दिशा में गंभीर पहल हो और यह स्थल विश्व मानचित्र पर भारतीय संस्कृति के गौरवपूर्ण प्रतीक के रूप में स्थापित हो।

आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।