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प्रेम, विश्वास और बढ़ती क्रूरता का दौर में बदलते रिश्तों के बीच खड़ा एक बेचैन समाज

रूमा सेनगुप्ता
लेखिका पत्रकार हैं

बेहद चिंतनीय सवाल कि क्या हम ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहां रिश्तों की असहमति का अंत संवाद से नहीं, बल्कि साजिश और हत्या से होने लगा है? मेघालय की वादियों में हनीमून मनाने गए इंदौर के युवा राजा रघुवंशी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। प्रारंभ में यह एक सामान्य आपराधिक घटना प्रतीत हुई, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, संदेह की परतें रिश्तों की जटिलता तक पहुंचती गईं।

समाज इस घटना से उबर भी नहीं पाया था कि महाराष्ट्र के पुणे से एक और चौंकाने वाला मामला सामने आ गया, जहां एक युवती पर अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने होने वाले पति की हत्या कराने का आरोप लगा। जिस विवाह की तैयारियां चल रही थीं, जहां दोनों परिवार सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक संपन्नता के प्रतीक माने जाते थे, वहां एक युवा जीवन का अंत अनेक सवाल छोड़ गया।

ये घटनाएं केवल पुलिस की केस डायरी का हिस्सा नहीं हैं। ये हमारे समय की सामाजिक बेचैनी का दस्तावेज हैं। वे हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि आखिर हमारे रिश्तों, परिवारों और सामाजिक मूल्यों में ऐसा क्या बदल रहा है कि असहमति, असंतोष और व्यक्तिगत इच्छाओं का समाधान संवाद के बजाय अपराध में तलाशा जाने लगा है।

एक समय था जब प्रेम असफल होते थे, रिश्ते टूटते थे, विवाह टूटते थे, लेकिन जीवन के प्रति सम्मान और दूसरे व्यक्ति के अस्तित्व के प्रति संवेदनशीलता बनी रहती थी। आज चिंता इस बात की है कि कुछ मामलों में असहमति, असंतोष और वैकल्पिक संबंधों का अंत हत्या की साजिशों तक पहुंच रहा है। यह केवल कानून और अपराध का विषय नहीं है, बल्कि मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और नैतिक शिक्षा का भी गंभीर प्रश्न है।

प्रख्यात भारतीय मनोचिकित्सक डॉक्टर समीर पारिख लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि आधुनिक जीवन में भावनात्मक संवाद की कमी और मानसिक दबावों को साझा न कर पाने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। उनके अनुसार आज अनेक युवा अपनी भावनाओं, असफलताओं और संबंधों से जुड़ी उलझनों को स्वस्थ तरीके से व्यक्त नहीं कर पाते। वे संबंध तो बनाते हैं, लेकिन कठिन निर्णय लेने का साहस और भावनात्मक परिपक्वता विकसित नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप कई बार वे ऐसे रास्तों की ओर बढ़ जाते हैं जिनकी परिणति विनाशकारी होती है।

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भारतीय मनोवैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि आज की पीढ़ी उपलब्धियों और इच्छाओं को तो महत्व देती है, लेकिन जिम्मेदारी, धैर्य और परिणामों की समझ अपेक्षाकृत कमजोर होती जा रही है। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं को सर्वोपरि मानने लगता है और दूसरे व्यक्ति के जीवन, भावनाओं तथा अधिकारों को महत्व देना बंद कर देता है, तब संबंधों में संवेदनहीनता जन्म लेने लगती है।

यह भी सच है कि भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों की प्रतिष्ठा और सामाजिक मान-सम्मान का विषय माना जाता है। कई युवक और युवतियां परिवार, समाज और परंपराओं के दबाव में ऐसे निर्णयों के सामने खड़े हो जाते हैं जिन्हें वे स्वीकार नहीं करना चाहते। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि सामाजिक दबाव किसी भी प्रकार से अपराध का औचित्य नहीं बन सकता। यदि कोई रिश्ता स्वीकार्य नहीं है, तो उसे अस्वीकार करने का साहस होना चाहिए। एक कठिन बातचीत, कुछ समय की नाराजगी या सामाजिक आलोचना किसी निर्दोष व्यक्ति के जीवन से कहीं अधिक छोटी कीमत है।

इन घटनाओं के बाद अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या महिलाएं अपराध की ओर बढ़ रही हैं। लेकिन इस विषय पर संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। अपराध का कोई लिंग नहीं होता। पुरुष भी अपराध करते हैं और महिलाएं भी। किसी एक या दो घटनाओं के आधार पर संपूर्ण महिला समाज के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। वास्तविक प्रश्न यह है कि समाज के कुछ हिस्सों में नैतिक सीमाएं और मानवीय संवेदनाएं क्यों कमजोर हो रही हैं।

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सोशल मीडिया और डिजिटल संस्कृति ने भी संबंधों की प्रकृति को गहराई से प्रभावित किया है। आज की पीढ़ी त्वरित संतुष्टि और तात्कालिक निर्णयों की संस्कृति में जी रही है। धैर्य, त्याग, संवाद और जिम्मेदारी जैसे मूल्य कई बार पीछे छूटते दिखाई देते हैं। संबंधों को निभाने की जगह उन्हें बदल देने की मानसिकता विकसित हो रही है। यही कारण है कि असफल प्रेम, असहमति या पारिवारिक मतभेद कई बार असामान्य और हिंसक प्रतिक्रियाओं को जन्म देते हैं।

परिवारों को भी इस विषय पर गंभीर आत्ममंथन करना होगा। क्या हम अपने बच्चों के साथ पर्याप्त संवाद कर रहे हैं? क्या हम उनकी इच्छाओं, आशंकाओं और भावनाओं को सुन रहे हैं? क्या विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी वास्तविक सहमति सुनिश्चित की जा रही है? केवल सामाजिक प्रतिष्ठा और परंपराओं के आधार पर लिए गए निर्णय कई बार भीतर ही भीतर गंभीर तनाव पैदा कर देते हैं।

वहीं युवाओं को भी यह समझना होगा कि स्वतंत्रता का अर्थ उत्तरदायित्व से मुक्त होना नहीं है। प्रेम करना अधिकार है, लेकिन किसी अन्य व्यक्ति के जीवन के साथ छल करना या उसे समाप्त कर देना कभी भी स्वीकार्य नहीं हो सकता। यदि कोई रिश्ता नहीं निभाया जा सकता, तो उससे बाहर निकलने का साहस होना चाहिए। “न” कहना कठिन हो सकता है, लेकिन हत्या का रास्ता चुनना किसी भी परिस्थिति में मानवीय नहीं कहा जा सकता।

आज समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहां तकनीकी प्रगति तेज हुई है, लेकिन भावनात्मक और नैतिक विकास पीछे छूटता जा रहा है। शिक्षा बढ़ी है, लेकिन संवेदनशीलता कम होती दिखाई दे रही है। संसाधन बढ़े हैं, लेकिन रिश्तों में विश्वास कमजोर हुआ है। शायद इसी कारण छोटी-छोटी परिस्थितियां भी कई बार भयावह अपराधों का रूप ले लेती हैं।

इंदौर के राजा रघुवंशी और पुणे के केतन अग्रवाल जैसी घटनाओं को केवल सनसनीखेज खबरों की तरह देखकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। ये घटनाएं हमें चेतावनी देती हैं कि यदि परिवारों में संवाद कम होगा, यदि बच्चों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, यदि नैतिक शिक्षा और भावनात्मक परिपक्वता की उपेक्षा होगी, तो समाज के सामने ऐसी त्रासदियां बार-बार खड़ी होंगी।

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अंततः प्रश्न केवल यह नहीं है कि हत्या किसने की। बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसा सोचने की मानसिकता पैदा कैसे हुई? वह कौन-सा सामाजिक अंधेरा है जिसमें किसी की व्यक्तिगत इच्छा किसी दूसरे के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है? आखिर क्यों एक अस्वीकार, एक संवाद, एक साहसिक निर्णय या एक स्पष्ट इनकार की जगह हत्या को समाधान मान लिया जाता है?

समाज की सभ्यता का मापदंड उसकी ऊंची इमारतें, भव्य विवाह समारोह या आर्थिक समृद्धि नहीं होती। उसका वास्तविक मूल्य इस बात से तय होता है कि वह रिश्तों में विश्वास, असहमति में संवाद और संकट में संवेदनशीलता को कितना बचा पाता है।

यदि हम आने वाली पीढ़ियों को केवल सफलता सिखाएंगे, लेकिन संवेदना नहीं; केवल अधिकार बताएंगे, लेकिन उत्तरदायित्व नहीं; केवल महत्वाकांक्षा देंगे, लेकिन नैतिकता नहीं—तो ऐसी घटनाएं अपवाद नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनती जाएंगी।

आज आवश्यकता केवल कठोर कानूनों की नहीं, बल्कि मजबूत परिवारों की है। केवल सजा की नहीं, बल्कि संस्कारों की है। केवल आरोपों की नहीं, बल्कि संवाद की है। क्योंकि जब रिश्तों में विश्वास मरने लगता है, तब केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं होती, बल्कि समाज की आत्मा भी घायल होती है।

और शायद यही इस समय का सबसे बड़ा प्रश्न है—क्या हम अपने बच्चों को सफल तो बना रहे हैं, लेकिन संवेदनशील इंसान बनाना भूलते जा रहे हैं? यदि इसका उत्तर ‘हां’ है, तो यह केवल कुछ परिवारों का संकट नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है।