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बंगाल में कमल खिलाना डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि

आचार्य ललित मुनि

“एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।” यह उद्घोष उस व्यक्ति की आत्मा की आवाज थी, जिसने भारत की एकता और अखंडता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया और अंततः उसी संघर्ष में अपने प्राण भी न्योछावर कर दिए। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी केवल एक राजनेता नहीं थे। वे एक विचार थे, एक दृष्टि थे, एक ऐसी चेतना थे, जो यह मानती थी कि भारत की विविधता उसकी शक्ति है, किंतु उसकी एकता उसका प्राण है। आज जब बंगाल की धरती पर राष्ट्रवाद की एक नई लहर उठती दिख रही है।

बंगाल और राष्ट्रवाद का संबंध उतना ही पुराना है जितना कि आधुनिक भारत का इतिहास। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब भारत में राष्ट्रीय चेतना अंकुरित हो रही थी, तब बंगाल उसका सबसे उर्वर केंद्र था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने “वंदे मातरम्” लिखकर मातृभूमि को देवी का दर्जा दिया। स्वामी विवेकानंद ने वेदांत के माध्यम से यह स्थापित किया कि भारत की आत्मा उसकी संस्कृति में बसती है और उस संस्कृति की रक्षा ही सच्ची देशभक्ति है। श्री अरविंद घोष ने क्रांतिकारी चिंतन को दार्शनिक आधार दिया और यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक मुक्ति नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण भी है और फिर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अपनी आजाद हिंद फौज के साथ यह घोषणा की कि स्वतंत्रता भीख में नहीं मिलती, उसे छीनना पड़ता है। इन सबके बाद बंगाल से ही एक और नक्षत्र डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का उदय हुआ।

डॉ. मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति थे। विद्वत्ता और राष्ट्रप्रेम उन्हें विरासत में मिली थी। मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने, जो आज भी एक असाधारण उपलब्धि मानी जाती है। किंतु शिक्षा जगत की यह ऊँचाई उन्हें राजनीति से अलग नहीं कर सकी, क्योंकि उन्होंने अनुभव किया था कि देश की नियति निर्धारित करने वाले निर्णय सभागारों में नहीं, राजनीतिक गलियारों में होते हैं।

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1947 में जब भारत का विभाजन तय हो गया, तब डॉ. मुखर्जी ने बंगाल के विभाजन में एक सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभाई। उनका प्रयास था कि बंगाल के हिंदू बहुल जिले भारत के साथ रहें। सीमा आयोग के समक्ष उनकी पैरवी और तत्कालीन परिस्थितियों के प्रति उनकी सजगता के कारण पश्चिम बंगाल, कूच बिहार और त्रिपुरा का एक बड़ा हिस्सा भारत के साथ रह सका। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी।

स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने देश के औद्योगिक ढाँचे की नींव रखने में योगदान दिया। किंतु जब उन्हें लगा कि सरकार की नीतियाँ राष्ट्रहित के विरुद्ध जा रही हैं, विशेषकर तत्कालीन पाकिस्तान के साथ 1950 में हुए नेहरू लियाकत समझौते के संदर्भ में, तब उन्होंने बिना किसी दबाव के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। यह निर्णय उनके उस चरित्र का परिचायक था जो सत्ता से अधिक सिद्धांत को महत्व देता था।

1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। यह केवल एक और राजनीतिक दल का जन्म नहीं था। यह उस वैचारिक धारा को संगठित स्वरूप देने का प्रयास था जो भारत को उसकी सांस्कृतिक जड़ों के साथ जोड़कर एक सशक्त, एकीकृत और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में देखना चाहती थी। जनसंघ का उद्देश्य था कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का साधन न हो, बल्कि वह सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राष्ट्रीय एकता का माध्यम बने। डॉ. मुखर्जी का यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था।

उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम संघर्ष था जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति का विरोध। संविधान का अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर को एक विशेष दर्जा देता था, जिसके अंतर्गत भारतीय नागरिकों को वहाँ प्रवेश के लिए परमिट की आवश्यकता होती थी। डॉ. मुखर्जी इसे भारत की एकता के लिए घातक मानते थे। उन्होंने प्रश्न किया कि जब कोई भारतीय बिना परमिट के असम जा सकता है, केरल जा सकता है, तब उसे जम्मू कश्मीर जाने के लिए परमिट क्यों चाहिए?

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यह एक ही देश में दो नियमों का विरोधाभास था, जो उन्हें स्वीकार नहीं था। 1953 में वे बिना परमिट के जम्मू कश्मीर में प्रवेश करते हुए गिरफ्तार हुए। उसी गिरफ्तारी के दौरान 23 जून 1953 को हिरासत में उनका निधन हो गया। वे मात्र 52 वर्ष के थे। उनकी मृत्यु के परिस्थितियाँ आज भी रहस्यमयी बनी हुई हैं और उन पर विस्तृत जाँच की माँग समय समय पर उठती रही है।

अब जब हम बंगाल की वर्तमान राजनीतिक चेतना की ओर दृष्टि डालते हैं, तो एक महत्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित होता है। दशकों तक बंगाल की राजनीति पर वामपंथी विचारधारा का प्रभुत्व रहा। 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक वामपंथी शासन ने बंगाल को एक विशेष राजनीतिक संस्कृति दी, जिसमें वर्गीय संघर्ष, आर्थिक समानता और अंतर्राष्ट्रीयतावाद केंद्रीय विमर्श बने रहे। राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान को इस विमर्श में प्रायः हाशिये पर रखा गया।

किंतु पिछले डेढ़ दशक में एक स्पष्ट परिवर्तन दिखाई दिया है। राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमापार घुसपैठ, सांस्कृतिक पहचान और विकास के प्रश्न बंगाल के सामान्य नागरिक के लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं जितने देश के अन्य भागों में। बंगाल के ग्रामीण और अर्ध नगरीय क्षेत्रों में एक ऐसी युवा पीढ़ी उभरी है जो न तो वामपंथ के वर्गीय ढाँचे में अपनी आकांक्षाओं को समेट पाती है और न ही क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति में संतुष्ट रहती है। वह कुछ अधिक बड़ा चाहती है, एक ऐसी पहचान जो बंगाली होने के साथ साथ भारतीय होने को भी उतनी ही गर्व की बात माने।

यहाँ डॉ. मुखर्जी की विरासत की पुनः प्रासंगिकता स्पष्ट होती है। 2019 में जब संसद ने अनुच्छेद 370 को निरस्त किया, तब पूरे देश में डॉ. मुखर्जी के उस संघर्ष की चर्चा नए सिरे से हुई जो उन्होंने सात दशक पहले आरंभ किया था। उनके उस उद्घोष को याद किया गया कि एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे। उनकी बात सच हुई, भले ही वे उसे देख नहीं सके। बंगाल में भी इस घटना ने एक नई बहस को जन्म दिया कि राष्ट्रीय एकता के प्रश्न को क्षेत्रीय या दलीय चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

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डॉ. मुखर्जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि वह है जो उनके विचारों को जीवंत रखे। राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि मानना, इसका अर्थ है कि भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर देश को खंडित करने के किसी भी प्रयास का सशक्त विरोध। संविधान के प्रति सम्मान, इसका अर्थ है लोकतंत्र को केवल चुनाव जीतने का माध्यम न मानकर उसे एक जीवन पद्धति के रूप में स्वीकार करना। सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, इसका अर्थ है बंगाल की उस महान परंपरा को आगे ले जाना जिसमें रवींद्रनाथ का मानवतावाद, विवेकानंद का आध्यात्मिक राष्ट्रवाद और बोस का बलिदानी जोश एक साथ प्रवाहित होते हैं और सबसे बढ़कर, राष्ट्रहित को दलगत हितों से ऊपर रखना, इसका अर्थ है वह साहस दिखाना जो डॉ. मुखर्जी ने दिखाया था, जब उन्होंने सत्ता छोड़ी किंतु सिद्धांत नहीं छोड़ा।

बंगाल की नई पीढ़ी डॉ. मुखर्जी को नए दृष्टिकोण से देख रही है। वह उनमें केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक ऐसे विद्वान और विचारक को देखती है जिसने शिक्षा, संस्कृति और राजनीति तीनों क्षेत्रों में समान दक्षता के साथ काम किया। वह उनमें एक ऐसे व्यक्ति को देखती है जिसने सुविधा की नहीं, सच्चाई की राह चुनी। यह पहचान केवल भावनात्मक नहीं है, यह वैचारिक है और इसीलिए यह टिकाऊ है।

बंगाल में राष्ट्रवाद का जो कमल खिल रहा है, वह उसी परंपरा की अगली कड़ी है जो बंकिम से शुरू हुई, विवेकानंद से पुष्ट हुई, अरविंद से गहरी हुई, नेताजी से प्रज्वलित हुई और मुखर्जी ने जिसे संगठित राजनीतिक शक्ति का रूप दिया। यह परंपरा यह सिखाती है कि देश की सेवा केवल सीमा पर जाकर नहीं होती, वह विचारों की लड़ाई लड़कर भी होती है, सत्य के लिए कारागार भी स्वीकार करके होती है और जरूरत पड़े तो प्राणों का बलिदान देकर भी होती है।