जहाँ पाषाणों में जीवंत है विजयनगर का वैभव विरुपाक्ष स्वामी मंदिर

तुंगभद्रा नदी के तट पर बसा हम्पी भारतीय इतिहास, स्थापत्य और संस्कृति का ऐसा अध्याय है, जिसकी भव्यता आज भी उसके खंडहरों में जीवित दिखाई देती है। कभी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहा यह नगर मध्यकालीन भारत के सबसे समृद्ध और सुनियोजित नगरों में गिना जाता था। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हम्पी अपने विशाल मंदिरों, बाजारों, राजप्रासादों और अद्भुत स्थापत्य कला के लिए विश्वविख्यात है। इन सभी स्मारकों में विरुपाक्ष मंदिर का स्थान विशेष है, क्योंकि यह हम्पी का ऐसा मंदिर है जहाँ सदियों से पूजा-अर्चना का क्रम निरंतर जारी है।
हम्पी के लैंडमार्क के रूप में यहाँ के विट्ठल मंदिर का पाषाण गरुड़ रथ दिखाया जाता है। यह गरुड़ रथ हम्पी की पहचान बन गया है। हम्पी पहुँचने से पहले मैंने इस प्राचीन नगर के विस्तार के विषय में सोचा ही नहीं था। मेरी सोच से भी बढ़कर मैंने इसे पाया। सबसे पहले हम विरुपाक्ष मंदिर गए। यह मंदिर सतत पूजित है, यहाँ अभी भी उत्सव एवं पूजा होती है। नगर विन्यास की दृष्टि से देखा जाए तो इसे वर्तमान आधुनिक शहरों की तरह ही बसाया गया है। विजयनगर साम्राज्य की यह राजधानी अपने समय में बहुत ही सुंदर रही होगी। खंडहर बताते हैं कि इस नगर का रुतबा क्या रहा होगा। यह राजधानी तुंगभद्रा नदी को मध्य में लेकर कई गाँवों को मिलाकर बसी हुई है।
हेमकूट पर्वत से घिरे पन्द्रहवीं सदी में निर्मित विरुपाक्ष मंदिर के मार्ग के दोनों तरफ प्राचीन बाजार के अवशेष दिखाई देते हैं। प्रस्तर निर्मित स्तंभों पर छतें अभी तक मौजूद हैं। मार्ग के दोनों ओर दो तल्ला दुकानों की कतारें सुव्यवस्थित हैं। गंगाधर ने बताया कि इन दुकानों पर अतिक्रमण करके लोग निवास कर रहे थे, उन्हें पुरातत्व विभाग ने स्थानीय प्रशासन के सहयोग से हटाया। अन्यथा यह पुरातात्विक धरोहर भी खतरे में थी। ऐसा ही बाजार की बसाहट सिरपुर में देखने मिलती है। यहीं विरुपाक्ष मंदिर का विशाल गोपुरम दिखाई देता है। यह गोपुरम सात तल का है। पहला तल प्रस्तर निर्मित है, इसके बाद सभी तल ईंटों से बनाए गए हैं, जिन पर चूने से लिपाई की गई है। यहाँ के सभी मंदिर इसी तरह निर्मित हैं। उनकी छत तक निर्माण प्रस्तर का है, उसके बाद के निर्माण ईंटों के हैं।
गोपुरम से प्रवेश करने पर विशाल प्रांगण है। इसके बाईं तरफ मंदिर का हाथी बंधा हुआ है, इसके पीछे पाकशाला है। मंदिर के हाथी के साथ उसके दो महावत भी सोए हुए हैं। उन्होंने लेटे-लेटे आवाज दी और हाथी ने हमारे सिर पर सूँड़ रखकर आशीर्वाद दिया। मंदिर में प्रसाद बनाने के लिए जल की व्यवस्था नालियों द्वारा की गई है। यहाँ तुंगभद्रा नदी का स्वच्छ जल पाकशाला से होकर प्रवाहित होता है। चावल पकाने के लिए बड़े-बड़े प्रस्तर के कुंड हैं और दाल पीसने के बड़े सिल-लोढ़े भी यहाँ रखे हुए हैं। हालाँकि इनका प्रयोग अब नहीं किया जाता, परन्तु उत्सव के अवसर पर इस पाकशाला में हजारों श्रद्धालुओं का भोजन तैयार होता था।
मंदिर के प्रांगण में दो स्तंभ दिखाई देते हैं। एक स्तंभ लकड़ी का बना हुआ है, दूसरा प्रस्तर निर्मित है। प्रस्तर निर्मित स्तंभ पर राजकीय चिन्ह है तथा लकड़ी का स्तंभ ध्वजा आदि के काम लिया जाता रहा होगा। मंदिर परिसर के सभी स्तंभ प्रतिमाओं एवं लता-वल्लरियों से अलंकृत हैं। मंदिर के द्वार पर एक स्तंभ में नंदी अंकित है तथा उसके शीर्ष पर दोनों तरफ चाँद एवं सूर्य हैं। नीचे के भाग में स्थानीय लिपि में लेख अंकित है। यहाँ की लिपि न जानने के कारण अभिलेख का आशय समझ नहीं सके और सर्वे कार्यालय में भी जानकारी लेना भूल गए।
विरुपाक्ष मंदिर के गर्भगृह के समक्ष विशाल प्रस्तर निर्मित मंडप है। इस मंडप के वितान पर पद्मांकन के साथ रंगों से चित्रकारी की गई है। गर्भगृह में स्वर्ण-रजत अलंकरण से सुशोभित भगवान विरुपाक्ष विराजमान हैं। यहाँ के पुजारी ने गर्भगृह में ले जाकर मुझसे पूजा करवाई और विरुपाक्ष भगवान के दर्शन करवाए। विरुपाक्ष शिव का ही एक नाम है। विरुपाक्ष का अर्थ सुंदर नेत्रों वाला तथा भयंकर नेत्रों वाला दोनों हो सकता है। विरुपाक्ष भगवान के स्वरूप के विषय में आगे चर्चा करेंगे।
गर्भगृह के दाईं तरफ स्थित कक्ष में गोपुरम की विलोम छवि दिखाई देती है। इस कक्ष की भित्ति पर एक छोटे छिद्र से प्रकाश प्रवेश करता है और वही प्रकाश भित्ति पर विलोम छवि का निर्माण करता है, ठीक आधुनिक पिनहोल कैमरे की भाँति। पन्द्रहवीं सदी के वास्तुकारों को इस तकनीक का ज्ञान था, यह आश्चर्यजनक है। लगभग तीन सौ फुट से अधिक दूरी की छवि को एक छिद्र के माध्यम से भित्ति पर प्रदर्शित करना उस समय की एक अद्भुत तकनीकी उपलब्धि थी और यह व्यवस्था आज भी सुचारु रूप से कार्य कर रही है।
इस मंदिर के गोपुरम का निर्माण राजा कृष्णदेव राय ने करवाया था। दाईं तरफ स्थित गोपुरम से बाहर निकलने पर एक विशाल पुष्करणी दिखाई देती है। इसका निर्माण पत्थरों से किया गया है तथा चारों ओर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। धार्मिक अनुष्ठान यहाँ सम्पन्न करवाए जाते हैं और गोपुरम की छवि पुष्करणी के जल में प्रतिबिंबित होती है। गोपुरम की भित्ति में मंदिर की ओर राजा कृष्णदेव राय की खड़गधारी, करबद्ध स्थानक मुद्रा में छवि अंकित की गई है और उसके साथ उनका नाम भी उत्कीर्ण है। किसी मंदिर में किसी राजा की नाम सहित प्रतिमा मैंने पहली बार देखी।
विरुपाक्ष मंदिर अपनी तरह का अनोखा मंदिर है। पन्द्रहवीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर की पूर्व दिशा में विशाल नंदी विराजमान है तथा दक्षिण दिशा में गणेश जी की विशाल प्रतिमा स्थापित है। इसके साथ ही द्वार पर त्रिमुखी नंदी भी स्थापित है। त्रिमुखी नंदी मैंने पहली बार देखा। यहाँ विष्णु के नृसिंह अवतार की विशाल प्रतिमा भी विद्यमान है। विरुपाक्ष मंदिर तल से शिखर तक लगभग पचास मीटर ऊँचा है। इस प्रांगण में विरुपाक्ष मंदिर से भी प्राचीन अनेक छोटे-छोटे मंदिर स्थित हैं। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर में राजा कृष्णदेव राय ने अपने अभिषेक के समय गोपुरम का निर्माण करवाया था। इस मंदिर को पंपापति नाम से भी जाना जाता है। अर्थात इस नगर का प्राचीन नाम पंपा था और इसके अधिष्ठाता देव पंपापति अर्थात विरुपाक्ष भगवान हैं।
प्रत्येक प्रसिद्ध स्थान के साथ कुछ न कुछ किंवदंतियाँ जुड़ी रहती हैं। विरुपाक्ष मंदिर के साथ भी एक रोचक किंवदंती प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इस स्थान को अपने निवास के लिए कुछ अधिक ही बड़ा समझा और अपने धाम वापस लौट गए। विरुपाक्ष मंदिर में एक भूमिगत शिव मंदिर भी है। मंदिर का बड़ा भाग जलमग्न रहता है, इसलिए वहाँ प्रवेश नहीं किया जा सकता। बाहर के हिस्से की तुलना में इस भाग का तापमान अत्यंत कम रहता है।
यद्यपि हम्पी एक प्राचीन नगर है और इसका उल्लेख रामायण में भी मिलता है, जहाँ इसे किष्किन्धा के रूप में पहचाना जाता है, तथापि इतिहासकारों के अनुसार तेरहवीं से सोलहवीं शताब्दी के मध्य यह नगर विजयनगर साम्राज्य की राजधानी के रूप में अपने चरम वैभव पर पहुँचा। व्यापार, संस्कृति, धर्म और कला के क्षेत्र में इस नगर ने उस काल में अभूतपूर्व समृद्धि प्राप्त की थी।
विरूपाक्ष नाम भी वेदों में उल्लिखित है। महानारायण उपनिषद् में विरूपाक्ष को बार-बार प्रणाम किया गया है—
“विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नमः।”
एक अन्य श्लोक में कहा गया है—
“विषमाणि विविधशक्तीनीन्द्रियाणि विलक्षणानि वाक्षाणि।
हर! हेमकूटशैले लिंगे व्यक्तोऽस्यतो विरूपाक्षः।।”
अर्थात हे हर! आपके नेत्र विलक्षण हैं, आप विविध शक्तियों से सम्पन्न हैं, आपकी इन्द्रियाँ असाधारण हैं और आप हेमकूट पर्वत पर विरूपाक्ष लिंग रूप में प्रतिष्ठित हैं, इसलिए आपको विरूपाक्ष कहा जाता है। वस्तुतः हमारी इन्द्रियाँ विषयों को देखती हैं, जबकि शिव की दृष्टि चेतना को देखती है और विषयों के वास्तविक स्वरूप को उद्घाटित कर देती है। इसी कारण भगवान शिव का यह नाम विरूपाक्ष पड़ा।
विरुपाक्ष मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय स्थापत्य, विज्ञान और संस्कृति के उत्कर्ष का जीवंत प्रमाण है। मंदिर के विशाल गोपुरम, प्राचीन बाजार, जल प्रबंधन की उत्कृष्ट व्यवस्था, अद्भुत शिल्पकला तथा पिनहोल कैमरे जैसी वैज्ञानिक अवधारणा यह सिद्ध करती है कि विजयनगर के शिल्पियों और वास्तुकारों का ज्ञान अपने समय से बहुत आगे था। आज भी यह मंदिर श्रद्धालुओं, इतिहासकारों और पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करता है। हम्पी के भग्नावशेष जहाँ बीते वैभव की कहानी कहते हैं, वहीं विरुपाक्ष मंदिर उस वैभव की जीवित धड़कन बनकर आज भी आस्था और इतिहास को जोड़ता है। यही कारण है कि हम्पी की यात्रा विरुपाक्ष स्वामी के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है।

