कुत्ता पकड़ता रहा, सफर चलता रहा

गाँव और बचपन की यादें हमेशा एक ऐसी पोटली की तरह होती हैं जिसे खोलते ही मधुर यादों का खिड़की खुल जाती है, जिससे छन कर आता हुआ प्रकाश मुझे उस तिलस्मी संसार में ले जाता है, जो मेरी यादों में आज भी कहीं जीवित है। इन यादों में अगर कोई एक वस्तु है जिसने मेरे बचपन से लेकर युवावस्था की तस्वीर को अपने पहियों पर गढ़ा है तो वह मेरी सायकिल है। वह सिर्फ लोहे का एक ढांचा नहीं थी बल्कि वह मेरी उन्मुक्त आकाश में उड़ान भरने का प्रतीक थी। वह मेरा पहली सवारी थी जिसने मुझे दुनिया की पहली झलक दिखाई थी।
उस जमाने में सायकिल भी बहुत बड़ी चीज हुआ करती थी। गांव में बहुत कम घर होते थे, जिनमें सायकिल होती थी। जिनके घर सायकिल, रेड़ियो और घड़ी होती थी वह घर सम्पन्न माना जाता था। जब कोई सायकिल चलाता था तो मुझे किसी चमत्कार से कम नहीं लगता था, दो पहियों पर संतुलन बनाते हुए, पैरों से पैडल मारते हुए, सपाटे से आगे बढना किसी बाजीगरी से कम नहीं था। यह बाजीगरी मैं भी करना चाहता था, लेकिन छोटा था। उन दिनों अधिकतर सभी के पास 24 इंच की सायकिलें होती थी, आज जैसे बच्चों की छोटी सायकिलें नहीं होती थी। एक दिन ऐसा भी आया, जब सायकिल का हैंडिल मैने पकड़ा और उसे पकड़े पकड़े पैदल ही दूर तक गया। उस दिन के अनुभव और उमंग को प्रकट करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। वह अहसास गुंगे के गुड़ जैसा ही था।
एक दिन पहली बार मैंने कैंची सायकिल चलाने का प्रयास किया, जैसे ही पैडल दो बार घुमाया, सायकिल समेत धड़ाम से धरती पर। घुटने फ़ूटे और कोहनी छिली, पर आनंद तो आया कि आज कुछ दूर पैडल मारकर सायकिल चलाया। उसके बाद तो धीरे धीरे गिर पड़कर कैंची सायकिल चलाना सीख ही गया। दोस्तों को दिखाने के लिए घर से बाहर भी चलाने लगा। पांचवी कक्षा की बोर्ड परीक्षा का सेंटर स्कूल हमारे घर से दो तीन किलोमीटर दूर था, पहली बार मुझे पापा ने इतनी दूर सायकिल चलाने के लिए दी थी। सायकिल के कैरियर में कम्पास एवं क्लिप बोर्ड दबाकर स्कूल पहुंचा था परीक्षा दिलाने।
उन दिनों सायकिल का महत्व आज की गाड़ियों की तरह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के साधन का नहीं था। उस दौर में सायकिल एक साथी थी जो आपके पसीने की गंध और आपकी मुस्कान को जानती थी। वह सायकिल मुझे याद है जिस्की डंडी पर बैठकर पापा मुझे घुमाते थे। तब सायकिल का मतलब था पिता के मजबूत हाथों का सहारा। लेकिन जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ वह सायकिल मेरी खुद की सवारी बन गई।
स्कूल जाने के दिनों में सायकिल मेरे लिए एक जिम्मेदार दोस्त की तरह थी। सुबह के दस बजते ही स्कूल की ओर बढती मेरी सायकिल के पहियों की आवाज ही मेरे दिन की शुरुआत का संगीत होती थी। स्कूल जाने का वह रास्ता आज भी मुझे ज्यों का त्यों याद है। उस रास्ते पर पड़ने वाली दुकाने, वृक्ष, ढलान, पुलिया और वह कच्ची सड़क जहाँ सायकिल चलाते समय बरसात के दिनों में टायरों पर चिकनी मिट्टी चिपक जाती थी और मडगार्ड में फ़सने से पहिया जाम हो जाता था तब मिट्टी हटाकर आगे बढना पड़ना पड़ता था यह सब आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा हैं। सायकिल चलाते हुए हवा का वह झोंका जो चेहरे से टकराता था वह आज के एयर कंडीशनर के ठंडे झोंकों से कहीं अधिक ताजगी भरा होता था।
उस समय सायकिल चलाना एक अनुशासन था। वह आपको संतुलन सिखाती थी। अगर आप ध्यान नहीं देते तो गिर सकते थे। वह आपको यह बताती थी कि मंजिल तक पहुँचने के लिए अपनी ऊर्जा को कैसे नियंत्रित किया जाता है। मैं याद करता हूँ कि कैसे स्कूल के दिनों में जब हम चार पांच दोस्त एक साथ सायकिल पर निकलते थे तो वह सड़क एक रेस का मैदान बन जाती थी। हम अपनी सायकिल की घंटी को एक खास लय में बजाते थे जो हमारी दोस्ती की धुन होती थी। वह घंटी की आवाज आज के हॉर्न के शोर से कहीं ज्यादा मधुर और आत्मीय थी।
सायकिल का महत्व उस समय इस बात से भी था कि वह बहुत कीमती थी। उसे खरीदने का अर्थ था घर की जरूरतों में से कुछ हिस्सा बचाकर उसे हासिल करना। इसलिए उसका रखरखाव भी एक कर्तव्य था। रविवार के दिन सायकिल को साफ करना उसके चैन में तेल डालना और उसके हैंडल को चमकते हुए देखना एक उत्सव जैसा था। जब वह सायकिल चमकती थी तो ऐसा लगता था जैसे मेरा चेहरा चमक रहा हो। वह सायकिल मुझे मेहनत करना सिखाती थी। मैं समझता था कि जितनी मेहनत पैडल मारने में करेंगे उतनी ही तेजी से हम अपने स्कूल पहुंचेंगे। आज के दौर की मशीनों में जहाँ सब कुछ बटन दबाते ही हो जाता है वहाँ सायकिल ने मुझे यह पाठ पढ़ाया था कि सफलता केवल मेहनत से ही मिलती है।
स्कूल के आखिरी दिनों तक आते आते वह सायकिल मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन गई थी। हम दोनों भाइयों के लिए हर साल नई सायकिल खरीदी जाती और पुरानी सायकिल जरुरतमंदों को बेच दी जाती। वो दिन कुछ और थे, आज जब मैं सड़कों पर तेज रफ्तार गाड़ियों को देखता हूँ तो मुझे वह सुकून नहीं मिलता जो सायकिल की धीमी गति में मिलता था। उस समय दुनिया बहुत छोटी और प्यारी थी। सायकिल पर चलते हुए मैं पक्षियों की आवाज सुन सकता था खेतों की खुशबू ले सकता था और रास्ते में मिलने वाले हर इंसान को मुस्कुराहट के साथ अभिवादन कर सकता था।
हाँ मेरी सायकिल ने मुझे एक चीज और सिखाई, सायकिल के फ़्रायव्हील में एक छोटी सा तार डलता था, जिसे स्थानीय भाषा में कुत्ता कहा जाता था, उसका अन्य नाम तो मुझे आजतक पता नहीं। यह कुत्ता ही सायकिल में इतना महत्वपूर्ण होता था, जितना की किसी प्राणी में प्राण। उल्टा घुमाने पर सायकिल का फ़्रायव्हील फ़्री चलता था और सीधे पैडल मारने पर वह अटक जाता और सायकिल को आगे बढता था। समझ लो आज के किसी मोटर सायकिल के गेयर की तरह होता था। जब वह घिस जाता था आगे बढाने पर भी पैडल फ़्री हो जाते थे। इसे कुत्ता छोड़ना कहा जाता था। इसने मुझे सिखाया कि जीवन यात्रा भी एक ऐसी यात्रा है जिसमें कभी कभी कुत्ता छोड़ देता है तो प्रवाह रुक जाता है, जब कुत्ता पकड़ लेता है तो जीवन यात्रा आगे बढ जाती है, सिर्फ़ कुत्ते के पकड़ने और छोड़ने बीच ही समय ही जीवन है।
आज मेरे पास सायकिल नहीं है, कई वर्षों से सोच रहा हूं कि सायकिल खरीदी जाए, लेकिन दुकान से लौट आता हूँ, किसी और के घर में खड़ी सायकिल मेरी रूह में वह आज भी उसी तरह चल रही होती है। वह बचपन की यादें वे स्कूल के दिन और उस सायकिल की घंटी की आवाज कभी नहीं मिट सकती। वह मेरी पहली आजादी थी मेरा पहला प्यार था और मेरा पहला सफरनामा था। सायकिल सिर्फ एक सवारी नहीं थी वह एक बचपन दस्तावेज़ थी जिसे हम अपनी यादों की किताब में संजोकर रखते हैं। आज के यांत्रिक युग में अगर हम वापस उस सायकिल के सफर पर जाना चाहें तो हम उस मासूमियत को फिर से नहीं पा सकें जो भागती दौड़ती जिंदगी में कहीं खो गई है। मेरे और मेरी सायकिल का वह रिश्ता हमेशा मेरे दिल के सबसे करीब रहेगा क्योंकि उसने ही मुझे सिखाया था कि खुद के दम पर आगे बढ़ना क्या होता है। कहने को तो बहुत कुछ है, पर आज इतना ही।

