जब कोई गाँव या शहर बन जाता है रंगमंच!
ओड़िया महानाटक ‘धनुजात्रा’ में उभरती है कंस की लोक-हितैषी छवि

(ब्लॉगर एवं पत्रकार )
हमारी भारतीय संस्कृति में लोकनाटकों के लेखन और मंचन की परम्परा हजारों वर्ष पुरानी है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में वर्णित पात्रों पर केंद्रित कथाओं को लेकर भी लोकनाटकों का मंचन होता रहा है। बने-बनाए रंगमंच पर खेले जाने वाले इन लोकनाटकों में कई सामाजिक संदेश मिलते हैं। लेकिन किसी एक गाँव या शहर को ही चलता-फिरता रंगमंच बनाकर स्थानीय जनता की भागीदारी से नाटकों का मंचन किए जाने का उदाहरण ओड़िशा के अलावा शायद ही कहीं और किसी ने देखा हो। नए जमाने में बिजली की रंग-बिरंगी रोशनी और तरह-तरह के अत्याधुनिक वाद्य यंत्रों से इस प्रकार के लोकनाटकों की रंगत और रौनक भी काफी बढ़ गई है।
भारतीय जनमानस में प्रचलित भगवान श्रीकृष्ण की कथाओं में कंस एक अत्याचारी राजा के रूप में कुख्यात है। यह उसकी नकारात्मक छवि है, लेकिन उसकी एक सकारात्मक और प्रजाहितैषी छवि भी है, जो छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य ओड़िशा की लोक-संस्कृति में प्रचलित ओड़िया महानाटक ‘धनुजात्रा’ में उभरती है।
राजा के रूप में कंस की यह प्रजावत्सल छवि तब देखने को मिलती है, जब वह हाथी पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हुए लोगों की समस्याओं का जायजा लेता है और दरबार लगाकर अपने अधिकारियों को तलब करता है। कंस की ओर से दरबार में जनप्रतिनिधियों को भी बुलाया जाता है। वर्तमान युग के हिसाब से क्षेत्रीय विधायक और सांसद भी वहाँ आते हैं। जन-शिकायतों और समस्याओं को अपनी प्रजा से सुनकर कंस जनप्रतिनिधियों और अपने अफसरों को उनके त्वरित निराकरण का आदेश देता है। तब उसकी यह प्रजावत्सल छवि उभरती है। वह अपने परिजनों के लिए जरूर आततायी था, लेकिन अपनी प्रजा के लिए नहीं।
यह कहना है ‘धनुजात्रा’ में कंस की भूमिका निभाने वाले ओड़िशा के प्रसिद्ध मंचीय अभिनेता और लोकगायक, सोनपुर जिले के ग्राम बिनका निवासी गोपालचंद्र पण्डा का। मेरी उनसे मुलाकात लगभग सात वर्ष पहले, मई 2019 में पश्चिम ओड़िशा के बरगढ़ जिले में स्थित ग्राम लेलहेर में हुई थी। महानाटक ‘धनुजात्रा’ के बारे में मुझे उनसे बहुत कुछ जानने-समझने को मिला।
कंस ने अपनी मुक्ति के लिए रचा था सारा प्रपंच
संक्षिप्त मुलाकात में गोपालचंद्र पण्डा ने मुझे बताया था, “जैसे त्रेतायुग में रावण ने राम के हाथों मोक्ष की चाहत से सीताहरण किया था, उसी तरह कंस ने कृष्ण के हाथों अपनी मुक्ति के लिए सारा प्रपंच रचा था।”
गोपालचंद्र कहते हैं, “द्वापर युग में युधिष्ठिर ने धर्मशास्त्र का और कंस ने न्यायशास्त्र का अध्ययन किया था। लेकिन कंस में राक्षसी प्रवृत्ति कहाँ से आई, इसकी जानकारी के लिए हमें पौराणिक आख्यानों में जाना होगा। कंस के पिता उग्रसेन मथुरा के राजा थे। वह भी अत्यंत प्रजाहितैषी थे। उनकी रानी पद्मावती स्नान करने नदी गई थीं, जहाँ ध्रुमिलासुर नामक राक्षस ने उनके साथ बेहद अशोभनीय और निंदनीय व्यवहार किया। इससे कंस का जन्म हुआ। कंस को यह बात मालूम नहीं थी। राक्षसी स्वभाव के कारण वह अपने परिजनों और देवी-देवताओं पर भी अत्याचार करने लगा।”
कुछ पौराणिक आख्यानों में ध्रुमिलासुर को आसुरी प्रवृत्ति का गन्धर्व बताया गया है, जिसने मायके गई रानी पद्मावती को बागीचे में सम्मोहित कर लिया था। राक्षसी स्वभाव के प्रभाव में आकर कंस ने अपने पिता महाराज उग्रसेन को राजगद्दी से उतारकर सिंहासन पर आधिपत्य जमा लिया और अपनी बहन देवकी का विवाह सुरकुल के राजा देवमीढ़ के पुत्र वासुदेव से करवाया।
एक दिन आकाशवाणी हुई कि देवकी के गर्भ से जन्म लेने वाली आठवीं संतान कंस की मृत्यु का कारण बनेगी। यह आठवीं संतान भगवान श्रीकृष्ण के रूप में आने वाली थी। तभी से कंस भयभीत और सशंकित रहने लगा। उसने देवकी और वासुदेव को बन्दी बनाकर कारागार में डाल दिया।
देवकी के छह पुत्रों का तो उसने वध कर दिया, लेकिन सातवें पुत्र के रूप में देवकी के गर्भ में जब स्वयं भगवान बलराम अवतरित हुए, तो योगमाया ने उन्हें ब्रज (गोकुल) में नन्द बाबा के घर रहने वाली रोहिणी जी के गर्भ में भिजवा दिया। इस प्रकार कंस के प्रकोप से बलराम जी बच गए।
फिर श्रीकृष्ण जी के जन्म, जेल के लौह-द्वारों के स्वयं खुल जाने और भारी वर्षा के बीच उफनती यमुना को पार करके वासुदेव जी द्वारा उन्हें वृन्दावन में नन्द बाबा और यशोदा माता के घर सुरक्षित पहुँचाए जाने की कथा हम सबको मालूम ही है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार हमें यह भी ज्ञात है कि आततायी कंस ने कृष्ण और बलराम की हत्या करने के इरादे से नन्द बाबा और गोपों के साथ उन्हें अक्रूर जी के हाथों धनुर्योग मेले का न्यौता भिजवाया था, जहाँ कृष्ण जी के हाथों कंस का वध हुआ।
धनुर्योग मेले के लिए कृष्ण जी की यात्रा का नाट्य रूपांतरण है ‘धनुजात्रा’
मेरा ख़्याल है कि शायद धनुर्योग मेले में शामिल होने के लिए वृन्दावन (गोकुल) से मथुरा नगरी तक उनकी यात्रा का विशाल नाट्य-रूपांतरण ही धनुजात्रा है। इसमें कृष्ण जन्म से लेकर कंस वध तक पूरी कहानी का नाट्य मंचन चलित रंगमंच पर होता है।
गाँव हो, कोई कस्बा हो या कोई शहर, जहाँ भी इसका मंचन होता है, वह स्थान अपने-आप में एक विशाल रंगमंच में परिवर्तित हो जाता है। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी इस महानाटक के पात्र बन जाते हैं। उपलब्धता के अनुसार आस-पास की किसी नदी को, बरसाती नाले को, या नहीं तो तालाब को ही यमुना नदी मान लिया जाता है, जिसके इस पार और उस पार क्रमशः मथुरा और वृन्दावन के दृश्य मंचित होते हैं।
बरगढ़ में बना मथुरा नगर का प्रवेश द्वार
पौष-माघ के महीने में इस महानाटक का आयोजन कहीं दस दिनों तक तो कहीं पंद्रह दिनों तक चलता है। पश्चिम ओड़िशा के जिला मुख्यालय बरगढ़ की धनुजात्रा देश-विदेश में प्रसिद्ध है। वहाँ जीरा नदी को यमुना नदी मानकर उसके दोनों किनारों को मथुरा और वृन्दावन मान लिया जाता है।
बरगढ़ में इस महानाटक की लोकप्रियता की एक झलक वहाँ सड़क पर यात्रियों के स्वागत के लिए बनाए गए शानदार प्रवेश द्वार से मिलती है। यह बरगढ़ शहर में मथुरा नगर का पक्का प्रवेश द्वार है। उस पर सामने ओड़िया लिपि में ‘मथुरा नगर’ और पीछे ‘धन्यवाद’ लिखा हुआ है। बरगढ़ में मथुरा नगर का यह नवनिर्मित प्रवेश द्वार वहाँ आने-जाने वाले लोगों को महानाटक ‘धनुजात्रा’ की हमेशा याद दिलाता है। फरवरी 2026 में बरगढ़ के संक्षिप्त प्रवास के दौरान मैं भी इस प्रवेश द्वार से गुजरा, हालांकि तब तक वहाँ ‘धनुजात्रा’ का महानाटक मंचित हुए कई दिन बीत चुके थे।

ओड़िशा के कई गाँवों में होने लगी ‘धनुजात्रा’
बरगढ़ की धनुजात्रा से प्रेरित और उत्साहित होकर अब ओड़िशा के कई गाँवों में भी लोगों ने धनुजात्रा महोत्सव समितियों का गठन कर इस चलित नाटक का आयोजन शुरू कर दिया है।
गोपालचंद्र पण्डा कहते हैं, “मेरी जानकारी के अनुसार बरगढ़ में पिछले 70 या 72 वर्षों से धनुजात्रा हो रही है, लेकिन बलांगीर जिले के ग्राम भालेर में तो यह वार्षिक आयोजन लगभग एक सौ वर्षों से किया जा रहा है। इधर बरगढ़ जिले के ही चिचोली और लेलहेर नामक गाँवों में भी धनुजात्रा की धूम रहती है।”
लेलहेर निवासी पूर्व सरपंच श्री हीराधर साहू ने बताया कि लेलहेर में ग्राम देवता की पूजा-अर्चना के बाद धनुजात्रा का शुभारंभ होता है। कंस के मुकुट की भी पूजा होती है।
पड़ोसी गाँव चण्डीपाली को वृन्दावन (गोपपुर) और लेलहेर को मथुरा मानकर महानाटक का मंचन किया जाता है। सम्पूर्ण आयोजन के दौरान दस-पन्द्रह दिनों तक दोनों गाँवों में भारी चहल-पहल बनी रहती है।
गोपालचंद्र पण्डा को हर साल 14 से 18 धनुजात्राओं में कंस की भूमिका निभाने का न्यौता मिलता है। वह सम्बलपुरी लोकगायक भी हैं। इन गीतों में अभिनय के साथ उनके दस-पन्द्रह एलबम भी आ चुके हैं। वह रावण और अन्य कई असुरों का भी किरदार निभाते हैं। गोपाल अच्छे कॉमेडियन भी हैं। उनकी मण्डली में 20 कलाकार हैं।
छत्तीसगढ़ में भी हुई ‘धनुजात्रा’ की एंट्री
सीमावर्ती राज्यों की कला-संस्कृति एक-दूसरे से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। पश्चिम ओड़िशा की लोकप्रिय ‘धनुजात्रा’ ने अब अपनी सरहद से लगे छत्तीसगढ़ के सरायपाली इलाके में भी रंग जमाना शुरू कर दिया है। तहसील मुख्यालय सरायपाली में दिसम्बर 2017 में पहली बार इसका भव्य आयोजन हुआ।
इस अंचल के वरिष्ठ साहित्यकार, ग्राम तोषगाँव निवासी सुरेन्द्र प्रबुद्ध कुछ साल पहले दिवंगत हुए हैं। उन्होंने एक बार मुझे बताया था कि यह एक प्रदर्शनकारी मुक्ताकाशी महानाटक है।
कृष्ण कथा के रूप में मंचित होने वाले इस महानाटक का नाम धनुजात्रा क्यों है? श्री प्रबुद्ध के अनुसार, यह एक जटिल प्रश्न है, क्योंकि कृष्ण के व्यक्तित्व के विभिन्न प्रतीकों में मथुरा, वृन्दावन, द्वारिका, यशोदा, राधा, दूध, दही, गोप, गोपिकाएँ, मोर पंख, बाँसुरी, सुदर्शन चक्र और पांचजन्य शंख आदि तो हैं, लेकिन उनमें धनुष नहीं है, जबकि यह राम के व्यक्तित्व में रूढ़ हो गया है। तलाशने पर भी धनुजात्रा में कृष्ण और धनुष के अंतर-संबंध नहीं मिलते।
धनुजात्रा में व्यवहृत ‘जात्रा’ शब्द को स्पष्ट करते हुए सुरेन्द्र प्रबुद्ध ने अपने एक लेख में लिखा था, “हिन्दी में ‘यात्रा’ शब्द की जो अभिधा है, भारत की पूर्वी भाषाओं ओड़िया, बांग्ला और असमिया में उसका अर्थ अलग है। जात्रा एक सामूहिक सांस्कृतिक मेला है। यह धर्म और प्राचीन साहित्य, कला और संगीत का सम्मिश्रण है, जो पूरे गाँव या कस्बे को चलित मंच बना देता है और दर्शक भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस महानाटक में भागीदार बन जाते हैं। पौराणिक राज-पोशाक में सुसज्जित होकर महाराज कंस का नगर भ्रमण भी जनता के आकर्षण का केन्द्र बन जाता है।”
धनुजात्रा का इतिहास 500 साल से पुराना नहीं
सुरेन्द्र प्रबुद्ध भारतीय नाट्य साहित्य के इतिहास के तथ्यात्मक अध्ययन के आधार पर यह भी कहते थे कि ओड़िशा की धनुजात्रा का इतिहास पाँच सौ वर्षों से अधिक पुराना नहीं है।
वे कहते थे, “भरत मुनि भारतीय नाट्य साहित्य के आदि पुरुष और प्रवर्तक थे। संस्कृत भाषा में नाटकों का विशाल और बहुरंगी भण्डार है, जिसकी समृद्ध परम्परा में भारतीय भाषाओं के नाटकों की परम्परा लगातार विकसित हो रही है। उत्तरप्रदेश की रामलीला रामायण का वैश्विक नाट्य रूप है। किसी भी नाटक के सफल मंचन के लिए मंच अनिवार्य तत्व है, जिसका अधिकतम विस्तार रूसी नाटकों में देखा गया है। रूस में एक-डेढ़ फर्लांग लंबे-चौड़े रंगमंच हुआ करते थे। पारसी नाटकों पर भी इसका असर देखा गया, लेकिन धनुजात्रा जैसे महानाटक का मुक्ताकाशी विस्तार शहरों और गाँवों को मंच के रूप में कब और कैसे परिवर्तित कर गया, उसका सम्यक विवरण भारतीय नाट्यशास्त्र में नहीं मिलता। फिर भी अनुमानों के आधार पर यह नई अवधारणा 500 वर्षों से अधिक पुरानी नहीं लगती।”
आत्मकेंद्रित होते समाज में ‘धनुजात्रा’ के लिए होती है जनता की उत्साहजनक भागीदारी
बहरहाल, मेरे विचार से कलियुग में ओड़िशा की धनुजात्रा भारत के द्वापर युगीन इतिहास में कृष्ण जन्म, कृष्ण लीला और कंस वध जैसी घटनाओं का ऐसा सजीव चित्रण करती है, जिसे देखकर हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।
टेलीविजन चैनलों और इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया के इस युग में आधुनिक समाज आत्मकेंद्रित होता जा रहा है। ऐसे नाजुक समय में इस महानाटक में आम जनता की उत्साहजनक, सक्रिय और सामूहिक भागीदारी देखकर भारतीय रंगमंच की विकास यात्रा को अंधेरे में रोशनी की किरण नजर आती है।
— स्वराज्य करुण

