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हो. वे. शेषाद्रि जी : जीवन, मूल्य और संघ की दायित्व–परंपरा

कैलाश चन्द्र

हो• वे• शेषाद्रि जी (H. V. Seshadri) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस धारा के तेजस्वी प्रवाह हैं, जिसमें व्यक्तिगत पद नहीं—कर्तव्य और उत्तरदायित्व ही प्रधान होते हैं। उनका जीवन सतत तप, अध्ययन, संगठनशीलता और राष्ट्रनिर्माण के संकल्प से ओतप्रोत रहा। 26 मई की उनकी जन्म-जयंती हमें याद दिलाती है कि संस्कृति, समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण कैसा होता है।

मूलतः कर्नाटक के निवासी शेषाद्रि जी का प्रारम्भिक जीवन सादगी, अध्ययन और तेजस्वी बुद्धि के लिए जाना जाता है। वे प्रारम्भ में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संपर्क में आये और विद्यार्थी जीवन में ही संघ प्रचारक बनने का निर्णय लिया। संघ की शाखा उनके लिए केवल वैचारिक प्रशिक्षण का स्थल नहीं, बल्कि व्यक्तित्व-निर्माण की प्रयोगशाला बन गई।

एक प्रचारक के रूप में उन्होंने दक्षिण भारत में संगठन के विस्तार, कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शन और समाजजीवन में समन्वय स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। चाहे 1960–70 के दशक का संगठनात्मक संघर्ष हो या 1975 के आपातकाल का दौर, उन्होंने अद्भुत धैर्य, अनुशासन और सूक्ष्म दृष्टि से कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया।

संघ में “पद नहीं, दायित्व” की परंपरा—और शेषाद्रि जी का आदर्श- संघ की परंपरा में पद का आग्रह नहीं, दायित्व का निर्वाह ही मूल विषय रहा है। शेषाद्रि जी इसका जीवंत उदाहरण थे।

दायित्व स्वीकारने में विनम्रता—और संघीय परंपरा का अनुपम प्रसंग
1990 के दशक के अन्त में, जब चौथे सरसंघचालक प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह (रज्जु भैय्या जी) स्वास्थ्यगत कारणों से अवकाश चाहते थे, तब अनेक कार्यकर्ताओं का मत था कि शेषाद्रि जी को यह सर्वोच्च दायित्व दिया जाए। परन्तु शेषाद्रि जी ने विनम्रता और आत्मावलोकन के स्वर में कहा— “स्वास्थ्य ऐसा नहीं कि यह दायित्व निभा सकूँ। युवा कार्यकर्ता को अवसर मिलना चाहिए।” यह मात्र विनम्रता नहीं थी, बल्कि उस गहन परंपरा का विस्तार था, जिसमें व्यक्ति नहीं, संगठन की आवश्यकता प्रधान होती है। अंततः सर्वोच्च दायित्व सुदर्शन जी को दिया गया, और शेषाद्रि जी ने सह–सरकार्यवाह एवं प्रचारक प्रमुख के रूप में पूरी निष्ठा से उनके साथ सहयोगी के नाते कार्य किया।

संघ परंपरा का ऐतिहासिक अनुकरण
यह परंपरा संघ के प्रारम्भ से ही प्रवाहित है—
* पहले सरसंघचालक केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वयं कहा था— “मुझसे अधिक योग्य कार्यकर्ता मिलते ही यह दायित्व उसे सौंप दूँगा।”
* द्वितीय सरसंघचालक M. S. Golwalkar (श्री गुरुजी) को भी नियुक्ति के पश्चात ज्ञात हुआ; उन्होंने कहा—
“यह दायित्व मेरा व्यक्तिगत नहीं, संगठन का है।”
* तृतीय सरसंघचालक बाला साहब देवरस ने स्वास्थ्य कारणों से स्वयं दायित्व त्यागने का आग्रह किया।

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शेषाद्रि जी—दायित्व की गरिमा के संरक्षक
शेषाद्रि जी के जीवन में यह परंपरा कई बार प्रकट हुई। एक महत्वपूर्ण प्रसंग— “दोनों ओर ‘वरिष्ठ–कनिष्ठ’ नहीं, केवल ‘कार्यकर्ता’ ही दिखता था।”
प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जु भैय्या) जब सरकार्यवाह थे तब शेषाद्रि जी क्षेत्र प्रचारक थे। कुछ ही वर्षों में शेषाद्रि जी मा• सरकार्यवाह बने तो रज्जु भैय्या सह सर कार्यवाह रहे। उसके 7-8 वर्ष पश्चात रज्जु भैय्या संघ के सरसंघचालक बने और शेषाद्रि जी ने उनके नेतृत्व में पूर्ण निष्ठा से कार्य किया।

इस लेख के लेखक के कथनानुसार—“मैंने स्वयं देखा है कि शेषाद्रि जी ने सरसंघचालक रज्जु भैय्या जी का कुर्ता स्वयं तुरपाई कर पहना।” यह केवल शारीरिक सेवा नहीं थी—यह आत्मीयता, सौहार्द, अहंकार-शून्यता और कर्तव्यनिष्ठा की पराकाष्ठा है। संघ की जड़ें इसी भावभूमि में गहरी हैं।

संघ के पाँच महान दायित्व-पुरुष : पद की नहीं, कर्तव्य की परंपरा
नीचे संघ के पाँच शीर्ष नेतृत्वकर्ताओं का “दायित्व–दर्शन” संक्षेप में प्रस्तुत है—

१. डॉ. हेडगेवार : संगठन का दायित्व सर्वोपरि

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जीवन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि संघ का मूल आधार पद की प्रतिष्ठा नहीं—कर्तव्य की पूर्णता है। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन एक ऐसे संगठन के निर्माण में लगाया जिसमें “व्यक्ति” नहीं, “व्यवस्था” प्रमुख हो।
उनकी दृष्टि स्पष्ट थी—
* दायित्व उसी को मिले जो सक्षम, समर्पित और परिस्थिति के अनुकूल हो।
* दायित्व छोड़ना भी उतना ही पवित्र है जितना दायित्व स्वीकारना।
इसलिए वे बार-बार कहते थे—“संघ व्यक्ति पर नहीं, संघ-व्यवस्था पर चलता है।”

2. श्री गुरुजी : दायित्व को तप में रूपांतरित करने वाले
माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर (श्री गुरुजी) को दायित्व ग्रहण करने की सूचना डॉ हेडगेवार जी के निधन पश्चात पत्र के माध्यम से मिली है। यह बताते समय वे भावुक हो उठे—“यदि संघ को यही अपेक्षित है, तो मैं अपना स्वत्व निछावर करता हूँ।” उनका पूरा जीवन तप, विचार-गहराई, संगठन की सुगंध और कर्तव्य की पूर्णता का प्रतीक रहा।

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3. बाला साहब देवरस : दायित्व में प्रयोगशीलता और व्यावहारिक दृष्टि
बाला साहब देवरस ने दायित्व को निरंतर गतिमान रखा—
* सामाजिक समरसता,
* अस्पृश्यता-उन्मूलन,
* राष्ट्रीय स्तर पर संगठन विस्तार
में उनका योगदान अतुलनीय है।
उन्होंने कहा— “संगठन की शक्ति सेवा से बढ़ती है, पद से नहीं।”

4. रज्जु भैय्या : सरलता, सहजता और दायित्व की पवित्रता
प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जु भैय्या) जैसे विद्वान, वैज्ञानिक दृष्टि वाले और अत्यंत सरल व्यक्तित्व में “दायित्व” स्वभाव की तरह था, पद की तरह नहीं। उन्होंने बार-बार कहा— “दायित्व मेरा नहीं—संघ का है।”
स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्होंने स्वयं दायित्व छोड़ने का आग्रह किया—यह संगठन-केंद्रित सोच का सर्वोच्च उदाहरण है।

5. सुदर्शन जी : अनुशासन, परिश्रम और दायित्व की श्रेष्ठता
सुदर्शन जी का जीवन कठोर अनुशासन, बौद्धिक ताजगी और निरंतर संगठन-प्रयास का प्रतीक था। वे स्पष्ट कहते थे— “दायित्व कभी हल्का नहीं होता, परंतु स्वयंसेवक उसे आनंद से निभाता है।”
उन्हें जब सर्वोच्च दायित्व मिला तो वे भी उतने ही विनम्र थे जितने कि प्रचारक अवस्था में।

हो. वे. शेषाद्रि जी और रज्जु भैय्या जी—एक-दूसरे के लिए आदर्श सहयोग
एक ओर रज्जु भैय्या का सौम्य नेतृत्व, दूसरी ओर शेषाद्रि जी की बौद्धिक शक्ति—दोनों ने मिलकर दक्षिण और उत्तर भारत के बीच संगठनात्मक सेतु बनाया।
* रज्जु भैय्या कहते थे— “शेषाद्रि जी संगठन की सर्वोत्तम स्मृति और बुद्धि हैं।”
* शेषाद्रि जी कहते थे— “रज्जु भैय्या सरलता की प्रतिमूर्ति हैं—जो सीखा, उनसे ही सीखा।”
दोनों संबंधों में स्पर्धा नहीं, केवल सहयोग था। यह संघ-परंपरा का अद्भुत उदाहरण है।
शेषाद्रि जी के ग्रंथ—विचार, नीति और युग-चिंतन की निधि
शेषाद्रि जी केवल संघ के शीर्ष संगठनकर्ता ही नहीं, बल्कि अत्यंत गहन विचारक, इतिहास–विश्लेषक और लेखन–कुशल अध्येता थे। उन्होंने समाज, इतिहास, राष्ट्रीय अस्मिता और संगठन पर अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। उनके लेखन की तीन विशेषताएँ खड़ी होती हैं—
1. सुस्पष्ट विश्लेषण,
2. सरल भाषा,
3. तथ्यों पर आधारित दृष्टि।
(1) “राष्ट्र निर्माण की दिशा”
इस महत्वपूर्ण विषय को अनेकों कृति में उन्होंने बताया कि भारत का राष्ट्र-निर्माण केवल राजनीतिक क्रिया न होकर एक संस्कृति-आधारित प्रक्रिया है। उन्होंने शिक्षा, समाज-संगठन, सेवा, समरसता और संस्कारों को राष्ट्र निर्माण के पाँच आधार-स्तंभ बताया।
(2) “भारत की राष्ट्रीय पहचान”
यह पुस्तक भारतीय राष्ट्र की आध्यात्मिक-ऐतिहासिक यात्रा को समझने के लिए अमूल्य है। इसमें उन्होंने सिद्ध किया कि—
* भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं;
* बल्कि संस्कृति-समूह, मूल्य-संपन्न सभ्यता और निरंतरता का चमत्कार है।
उनकी विश्लेषण शैली अकादमिक होते हुए भी सरल है—यह उनकी सबसे बड़ी लेखन शक्ति है।
(3) “संघ : एक परिचय”
संघ के उद्देश्य, कार्यपद्धति, संगठनात्मक रूप, शाखा-जीवन और राष्ट्र-चिंतन का सरलतम रूप में परिचय देने वाली यह पुस्तक सदैव लोकप्रिय रही है।
ये पुस्तक उन जिज्ञासुओं के लिए बने विशाल सेतु का कार्य करती है जो संघ के बारे में निष्पक्ष, स्पष्ट और विश्वसनीय जानकारी चाहते हैं।
(4) “Hindu Renaissance” (English)
इस ग्रंथ में शेषाद्रि जी ने हिंदू समाज के पुनर्जागरण की वैश्विक प्रक्रिया का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि “हिंदू पुनर्जागरण” केवल धार्मिक जागरण नहीं—बल्कि
* सांस्कृतिक स्वाभिमान,
* सामाजिक समरसता,
* राजनीतिक आत्मविश्वास
का समेकित स्वरूप है।
(5) निबंध–संग्रह और व्याख्यान–समाहार
उनके विभिन्न व्याख्यान—आपातकाल, भारतीय राजनीति, समाज-संगठन, शिक्षा और राष्ट्र-चिंतन पर केंद्रित रहे। इन संग्रहों में वाक्य–शक्ति, तथ्य–निष्ठा और विश्लेषण–गहराई अद्वितीय है। पूजनीय श्री गुरुजी के मार्गदर्शन पर कृतिरूप संघ दर्शन और विचार नवनीत का अनोखा संयोजन एवं संकलन भी अनुपम कृतियों में से है।
संक्षेप में, शेषाद्रि जी की कृतियाँ विचार–जगत की निधि और राष्ट्र-चिंतन के विश्वसनीय दस्तावेज हैं।

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जहाँ कार्य ही पूजा है—वहीं दायित्व ही गौरव है
शेषाद्रि जी, रज्जु भैय्या, सुदर्शन जी, श्री गुरुजी, देवरस जी और डॉ. हेडगेवार—इन सभी व्यक्तित्वों ने हमें एक बात सिखाई है—संगठन का कार्य पद से बड़ा है। पद का त्याग भी उतना ही पवित्र है जितना पद का स्वीकार। स्वयंसेवक का गौरव उसकी विनम्रता से बढ़ता है, अधिकार से नहीं। राष्ट्र-जीवन के इस विराट यज्ञ में इन महापुरुषों का योगदान केवल इतिहास का विषय नहीं—यह वर्तमान और भविष्य दोनों की दिशा है। शेषाद्रि जी की जन्म-जयंती पर यही संकल्प जगता है कि हम पद के पीछे नहीं—कर्तव्य के पीछे चलें। पद नहीं, दायित्व ही हमारा स्वभाव बने। कार्य ही हमारी पूजा बने।
✍️कैलाश चन्द्र