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‘रायपुर’ में है तेजी से बदलते शहर का इतिहास : रविवारीय पुस्तक-चर्चा

स्वराज्य करुण
(ब्लॉगर एवं पत्रकार )

हम सब जिस गाँव, शहर, राज्य और देश में रहते हैं, उसके अतीत के बारे में जानने की उत्सुकता से ही उसका इतिहास बनता है। भारत के प्रमुख राज्य छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का भी अपना एक लंबा इतिहास है, जो इस राज्य के इतिहास से अलग नहीं है। जो रायपुर कभी एक छोटा-सा गाँव था, फिर छोटा-सा कस्बा बना और उसके बाद एक छोटे शहर के रूप में नगरीय सभ्यता के दौर में प्रवेश कर गया। औद्योगिक विकास की तेज रफ्तार हवाओं के बीच बढ़ती जनसंख्या ने अब इसे महानगर में तब्दील कर दिया है। तेजी से बदलता और बढ़ता यह शहर सैकड़ों-हजारों वर्षों में हुए कई तरह के ज्ञात-अज्ञात बदलावों का साक्षी तो है ही, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी के आंदोलनों का भी गवाह है। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए बीसवीं सदी में दशकों तक चले आंदोलनों के बाद इस शहर ने नवंबर 2000 में स्वयं को नए छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी के रूप में भी आकार लेते हुए देखा है।

प्रदेश के वरिष्ठ लेखक और पत्रकार आशीष सिंह ने ‘रायपुर’ शीर्षक से प्रकाशित 194 पृष्ठों की अपनी किताब में रायपुर शहर के इतिहास को अपनी धाराप्रवाह लेखन शैली में बहुत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है।

उन्होंने इस शहर के वर्ष 1867-68 के नक्शे और यहाँ के वरिष्ठ गीतकार रामेश्वर शर्मा की कविता ‘रायपुर महिमा’ से शुरुआत की है। नक्शे में 158 साल पहले के रायपुर के नागरिक क्षेत्रों और सैन्य छावनी के क्षेत्र भी दर्शाए गए हैं। यह पुस्तक रायपुर के सुदूर अतीत से लेकर उसके वर्तमान स्वरूप तक की झाँकियाँ प्रस्तुत करती है।

आशीष सिंह ने वर्ष 1987 में ‘रायपुर नगर का इतिहास’ शीर्षक से एक लघु शोध-प्रबंध लिखा था। उन्होंने इसे पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के एम.ए. (इतिहास) के चतुर्थ प्रश्नपत्र में विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया था। आशीष बहुत अच्छे लेखक और पत्रकार थे। लेखकीय अभिरुचि उन्हें अपने पिता और छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध साहित्यकार हरि ठाकुर से विरासत में मिली थी। आशीष सिंह का जन्म 24 जनवरी 1963 को हुआ था। उनका निधन 7 सितंबर 2025 को गृह नगर रायपुर में हुआ। उन्होंने 1994 से 2022 तक रायपुर शहर के विभिन्न समाचार-पत्रों में एक सजग और सक्रिय पत्रकार के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन किया। कई किताबें लिखीं और अनेक पुस्तकों का संपादन भी किया।

आशीष सिंह की नई पुस्तक ‘रायपुर’ का प्रथम संस्करण हरि ठाकुर स्मारक संस्थान के लिए मीडिया लिंक, 413 सुंदर नगर, रायपुर द्वारा स्वर्गीय हरि ठाकुर के जन्मदिन 16 अगस्त 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसका दूसरा संस्करण अक्टूबर 2024 में प्रकाशित हुआ।

अपनी किताब ‘रायपुर’ के प्राक्कथन में आशीष सिंह ने लिखा है —
“रायपुर का अपना इतिहास रहा है। लगभग एक हजार वर्ष पूर्व का हमें विवरण ज्ञात हो सकता है। रायपुर के राजाओं की वंशावली तो ज्ञात हो जाती है, किंतु उनके कार्यकाल की किसी विशेष घटना का विवरण नहीं मिलता। तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक दशा का हम अनुमान भी नहीं लगा सकते। राजा और प्रजा के संबंध, राजदरबार के मुख्य अधिकारी, संस्कृति और कला के विषय में भी रायपुर के हैहयवंशी नरेशों की गतिविधियों की सूचना बहुत कम है।”

आशीष आगे लिखते हैं —
“राजा व रानी के विषय में रेवाराम या हंटर ने जो बताया, वही हमारा आधार है। यह कितनी दुर्भाग्यजनक स्थिति है कि हजार वर्ष तक छत्तीसगढ़ में शासन करने वाले हैहयवंशी या कलचुरियों की वर्तमान पीढ़ी के विषय में रायपुर के अधिकांश लोग कुछ नहीं जानते।”

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आशीष लिखते हैं —
“रायपुर के विषय में कुछ सूचनाएँ मराठाकालीन अभिलेखों में मिलती हैं। मराठों से संधि के तहत जब छत्तीसगढ़ अंग्रेजों के अधीन हुआ, तब सही मायनों में इतिहास की कड़ियाँ जुड़ती हैं। अंग्रेज अफसरों ने हर छोटी-बड़ी चीज को समझा और अपने उच्चाधिकारियों को प्रेषित कर दिया। उनको इसकी चिंता नहीं थी कि उनकी रिपोर्ट का महत्व है या नहीं। अंग्रेज अधिकारियों की रिपोर्ट से ही नारायण सिंह, हनुमान सिंह जैसे वीरों का पता चल सका। 1857-58 में उनके कार्य अवश्य ही विद्रोह की श्रेणी में थे, पर उन्हीं कार्यों को हम स्वतंत्रता संग्राम कहते हैं।”

आशीष सिंह ने प्राक्कथन में यह भी लिखा है कि उनकी यह पुस्तक शुद्ध रूप से रायपुर का इतिहास है, ऐसा वे नहीं मानते, किंतु इतिहास के बहुत करीब है, इतना जरूर कह सकते हैं। लेखक ने जितनी गंभीरता से और जितनी मेहनत से विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेखों को संकलित करने और उन्हें खंगालने का प्रयास किया है, वह निश्चित रूप से सराहनीय है। कुल 40 अध्यायों की इस पुस्तक की भूमिका छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ इतिहासकार रामकुमार बेहार ने लिखी है। दुर्भाग्यवश वे भी अब इस भौतिक संसार में नहीं हैं।

छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम कोसल और दक्षिण कोसल भी रहा है। आशीष सिंह ने पुस्तक के प्रथम अध्याय में कोसल यानी छत्तीसगढ़ का सामान्य परिचय दिया है, जिसमें यहाँ के पौराणिक इतिहास से लेकर तत्कालीन भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति का भी उल्लेख है। उन्होंने इस अध्याय में ‘छत्तीसगढ़’ के नामकरण के ऐतिहासिक घटनाक्रमों का भी विवरण दिया है। दूसरे अध्याय में रायपुर नगर की ऐतिहासिकता, तीसरे अध्याय में ‘मराठाकालीन रायपुर’ और चौथे अध्याय में ‘ब्रिटिशकालीन रायपुर’ पर प्रकाश डाला गया है।

पुस्तक के अगले अध्यायों में कई विवरण मिलते हैं। जैसे, रायपुर शहर में 54 ऐतिहासिक तालाबों के विलुप्त होने की जानकारी उनकी सूची सहित दी गई है। अपने प्राक्कथन में आशीष सिंह ने रायपुर के बारे में कई रोचक तथ्य भी दिए हैं। उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए लिखा है —

“बैलाडीला की पहाड़ियों पर लौह अयस्क के भंडार की जानकारी भी तत्कालीन रिपोर्ट से मिलती है। बस्तर में कपास की खेती का उल्लेख आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। यही नहीं, रायपुर और रतनपुर में भी कपास का काफी उत्पादन होता था। 1857 में 31 हजार 200 रुपए का कपास उत्पन्न हुआ था। रायपुर तहसील के कपास की तारीफ भी की गई है, क्योंकि उसके ताने-बाने से मजबूत कपड़े बनते थे। आश्चर्य है कि आज संपूर्ण छत्तीसगढ़ में नाम मात्र का ही कपास पैदा होता है।”

ब्रिटिश रिपोर्ट के हवाले से आशीष सिंह ने प्राक्कथन में यह भी लिखा है —

“आश्चर्यजनक तथ्य है कि 1858 में रायपुर जेल में नौ महिलाएँ भी कैदी थीं। तीन छोटे बच्चे भी जेल में थे, जिनकी उम्र 12 वर्ष तक थी। स्मरण रहे, 1858 में रायपुर जेल में 179 कैदी थे। 1858 के प्रतिवेदन में इलियट ने रायपुर शहर को तालाबों से परिपूर्ण, वृक्षों और बगीचों से आच्छादित लिखा है। उस समय रायपुर में 6 हजार घर थे, आबादी 30 हजार बताई गई। विशेष उल्लेखनीय है रतनपुर के स्थान पर रायपुर को मुख्यालय बनाना। इलियट ने रायपुर को विकासशील नगर कहा था। लगभग 150 वर्ष पूर्व कही उसकी बातें भविष्यवाणी की तरह सत्य उतर रही हैं। नए प्रदेश की नई राजधानी ‘नया रायपुर’ को भारत के तेज गति से बढ़ते शहरों में शुमार किया जा रहा है। नया रायपुर भारत का सर्वाधिक संभावनाओं वाला नगर माना गया है। आज हमारा यह रायपुर स्मार्ट शहरों की सूची में शामिल है। यही तो है रायपुर की ऐतिहासिकता का ज्वलंत प्रमाण। लगभग एक हजार वर्ष प्राचीन नगर की नींव पर एक नया और विश्वस्तरीय नगर साकार हो रहा है।”

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आशीष सिंह की इस पुस्तक में अंग्रेजी राज के खिलाफ यहाँ हुए जनविद्रोह की घटनाओं का भी उल्लेख है। इनमें 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वीर नारायण सिंह के नेतृत्व में हुए संघर्ष और उसके बाद 10 दिसंबर 1857 को रायपुर में उन्हें दी गई फाँसी, फिर उनकी शहादत के बाद 18 जनवरी 1858 को रायपुर की ब्रिटिश सैन्य छावनी में सैनिक हनुमान सिंह के नेतृत्व में हुए विद्रोह, उनके द्वारा सार्जेंट मेजर सिंडवेल की हत्या और इस घटना के बाद 22 जनवरी 1858 को रायपुर में ही 17 भारतीय सिपाहियों को दी गई फाँसी का विवरण भी शामिल है।

बाद के वर्षों में महात्मा गांधी जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में देशभर में चले अहिंसक स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों के दौरान रायपुर में हुई घटनाओं की जानकारी भी पुस्तक में दी गई है। इसके अंतर्गत वर्ष 1920 के असहयोग आंदोलन, 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन, 1932 के संग्राम तथा वर्ष 1942 में रायपुर में सशस्त्र क्रांति के प्रयास का विवरण भी पुस्तक में समाहित है। राष्ट्रीय आंदोलनों के उस दौर में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे दिग्गज नेताओं के रायपुर प्रवास की यादगार घटनाओं को भी इसमें दर्ज किया गया है।

महान दार्शनिक और समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद ने अपनी किशोरावस्था के कुछ वर्ष रायपुर में बिताए थे। स्वतंत्र भारत के दो बार कार्यवाहक राष्ट्रपति रहे तथा बाद में 25 फरवरी 1968 को भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने एम. हिदायतुल्लाह ने वर्ष 1922 में रायपुर के शासकीय स्कूल से मेट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी। आचार्य रजनीश, जिनका मूल नाम चंद्रमोहन जैन था, वर्ष 1957 में रायपुर के शासकीय संस्कृत महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक थे। महान भाषाविद हरिनाथ डे ने भी मिडिल स्कूल तक शिक्षा रायपुर में प्राप्त की थी। ऐसी अनेक महत्वपूर्ण और दिलचस्प जानकारियाँ आशीष ने अपनी पुस्तक ‘रायपुर’ में संकलित की हैं।

ग्यारहवाँ अध्याय ‘गोवा मुक्ति संग्राम’ शीर्षक से है। इसमें गोवा को पुर्तगाल से मुक्ति दिलाने के आंदोलन में छत्तीसगढ़ से भी कई सत्याग्रही सम्मिलित हुए थे, जिनमें प्रसिद्ध साहित्यकार हरि ठाकुर के साथ रामाधार तिवारी, केयूर भूषण और नंदकुमार पाठक भी शामिल थे।

पुस्तक का बारहवाँ अध्याय छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए लंबे समय तक चले आंदोलन पर केंद्रित है। आशीष सिंह स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रायपुर की अनेक महान विभूतियों और शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता तथा सार्वजनिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वरिष्ठजनों का उल्लेख करना भी नहीं भूलते।

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पुस्तक में ‘जिनसे रायपुर गौरवान्वित है’ शीर्षक बीसवें अध्याय में उन्होंने छत्तीसगढ़ के प्रथम पत्रकार माधव राव सप्रे, सहकारिता आंदोलन के प्रमुख नेता वामन राव लाखे, अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल, महान श्रमिक नेता ठाकुर प्यारेलाल सिंह सहित मौलाना रऊफ खान, संत यति यतन लाल, महंत लक्ष्मी नारायण दास, खूबचंद बघेल, डॉ. राधाबाई, केकती बाई, राजकुंवर, रोहिणी बाई, बेलाबाई और ‘गांधी मीमांसा’ के लेखक रामदयाल तिवारी का परिचय काफी विस्तार से दिया है।

देश की रक्षा के लिए सीमाओं पर शहीद हुए भारतीय सेना के अनेक वीरों में से रायपुर शहर के शहीदों का परिचय भी लेखक ने दिया है, जिनमें मेजर यशवंत गोरे, अरविंद दीक्षित, अरुण सप्रे, राजीव पांडेय और लेफ्टिनेंट पंकज विक्रम शामिल हैं। अंदरूनी पन्नों में कई यादगार घटनाओं और महान विभूतियों के श्वेत-श्याम चित्र भी ‘रायपुर’ में संकलित हैं। मुखपृष्ठ और तीनों आवरण पृष्ठ रंगीन चित्रों से सुसज्जित हैं।

पुस्तक के 31वें अध्याय में उन महान दानवीरों का परिचय दिया गया है, जिनकी दानशीलता से शहर में कई बड़े संस्थान और उनके भवन तैयार हुए। इनमें दाऊ कल्याण सिंह, दाऊ कामता प्रसाद अग्रवाल, पंडित नारायण प्रसाद अवस्थी, खुदादाद डुंगाजी, रामनारायण दीक्षित और नगर माता बिन्नी बाई शामिल हैं।

पुस्तक का 32वाँ अध्याय चंबल के बागियों का आत्मसमर्पण करवाने में अहम भूमिका निभाने वाले छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में जन्मे स्वाधीनता सेनानी रामानंद दुबे को समर्पित है। रायपुर शहर की ऐतिहासिक इमारतों, यहाँ के प्राचीन तालाबों आदि का ब्यौरा भी अलग-अलग अध्यायों में है।

बहरहाल, ‘रायपुर’ काफी बदल गया है और तेजी से बदलता भी जा रहा है। शहर के बदलते स्वरूप पर आशीष सिंह की पुस्तक ‘रायपुर’ में उनके पिता स्वर्गीय हरि ठाकुर की एक कविता ‘इस शहर को क्या हो गया है?’ शीर्षक से शामिल है, जिसमें कवि लिखते हैं —

अपने ही शहर में
अजनबी की तरह जीना
उतना ही कठिन है,
जितना हवा के बिना साँस लेना।
अपने बचपन में मैंने इस शहर को
फूल की तरह जिया था और
गाया था भजन की तरह।
इसकी धूल में लोट-पोट कर
बिताया था बचपन।
तब यह शहर बहुत छोटा था,
एकदम खुला-खुला,
खिला-खिला,
लैम्प पोस्ट की रोशनी में
झिलमिलाता, खिलखिलाता, इठलाता।
तब यह शहर बहुत आत्मीय था,
और इतना विश्वसनीय था
कि सुरक्षा की किसी को
चिंता नहीं थी।
अब यह शहर इतना बड़ा हो गया है
कि हवा का भी दम घुटता है।
सारा शहर या तो बाजार बन गया है
या दफ्तर या अस्पताल।
न जाने इस शहर को
क्या हो गया है कि
अपना होकर कितना
पराया हो गया है।

भारत छोटे-बड़े गाँवों का देश रहा है, लेकिन अत्यधिक शहरीकरण की आँधी से गाँव अपनी पहचान खो रहे हैं। ग्राम्य संस्कृति की सहजता, सरलता और सौम्यता खत्म होती जा रही है। कभी ग्राम्य संस्कृति रायपुर की विशेषता हुआ करती थी, लेकिन आज नहीं। अब तो यहाँ महानगरीय जीवन की भागदौड़ है। समय के साथ यह बदलाव स्वाभाविक है, तो उससे उपजते दुष्परिणामों से किसी भी संवेदनशील कवि का व्यथित होना भी स्वाभाविक है, जिसकी अभिव्यक्ति स्वर्गीय हरि ठाकुर की इस कविता में है।

आशीष सिंह की पुस्तक ‘रायपुर’ छत्तीसगढ़ की राजधानी से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण स्मृतियों का एक महत्वपूर्ण संकलन है।