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आंतरिक जागरण : अप्प दीपो भवः से उपनिषदों तक एक सनातन यात्रा

कैलाश चन्द्र

(जापानी सन्यासी की कथा राजकुमार और संन्यासी, जिसका वर्णन आचार्य रजनीश बार बार करते हैं। “अप्प दीपो भवः”, उपनिषद, गीता, शंकर, विवेकानन्द, योग–तंत्र–बौद्ध–जैन—सभी परंपराएं आन्तरिक रुप से समेकित “आंतरिक जागरण-शास्त्र” ही है।)

मनुष्य के भीतर एक ऐसा बिंदु है, जो कभी सोता नहीं। शरीर थकता है, मन उलझता है, विचार उठते-गिरते हैं—पर चेतना के गर्भ में एक ज्योति सर्वदा जलती रहती है। समस्या यह है कि अधिकांश लोग उस ज्योति को पहचान ही नहीं पाते। जीवन की भीड़, भय, महत्त्वाकांक्षाएँ, असुरक्षाएँ—ये सभी उस प्रकाश पर परतें चढ़ा देते हैं। इसी गहराई को समझाने हेतु एक प्रसिद्ध कथा है—जापानी संन्यासी और राजकुमार की।
संन्यासी राजकुमार को तलवार चलाना नहीं, होश चलाना सिखाता है। अभ्यास सरल था—दिन में किसी भी क्षण चुपके से पीछे से उसपर आक्रमण। परिणाम यह हुआ कि राजकुमार के भीतर एक “जागा हुआ बिंदु” बन गया। शरीर व्यस्त रहता था, पर भीतर चेतना सतर्क। विचार कम होने लगे, मन की भीड़ घटने लगी और मौन का उदय हुआ। यही पहला पाठ था—दिन में जागरण।
दूसरा पाठ और कठिन था—नींद में भी जागरण। संन्यासी रात में हमला करता। राजकुमार पहले डर गया, फिर धीरे-धीरे अवचेतन में भी चेतना का एक प्रहरी खड़ा हो गया। तीन महीने में स्थिति ऐसी कि शरीर सोता था, पर चेतना नहीं। यही ध्यान परंपराओं में कहा जाता है—“जागरण का दीया भीतर जल गया।”
तीसरा पाठ गहरा था—विचारों का लोप। संन्यासी का सिद्धांत स्पष्ट था— “विचार = नींद, होश = जागरण।”
जब राजकुमार सजग हुआ तो विचारों का बोझ गिर गया। प्रतिक्रियाएँ स्वतः सही होने लगीं। “मैं” की कठोर दीवार टूटने लगी और भीतर शुद्ध चैतन्य प्रकट हुआ। यही वह अवस्था है जहाँ मनुष्य “जागता” है, चाहे वह आँखें बंद किए हो या खुली।
यह कहानी हमें बताती है कि खतरा सजगता का साधन है। संकट हमें तोड़ता नहीं, जगाता है। होश शुरू में अभ्यास है, धीरे-धीरे स्वभाव बन जाता है। विचारों का अंधकार हटे तो भीतर की ज्योति दिखाई देती है। और जागरण का सबसे अंतिम सत्य यही है—गुरु मार्ग दिखा सकता है, चलना स्वयं को पड़ता है।

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बुद्ध : अप्प दीपो भवः—अपने भीतर दीप जलाओ
बुद्ध ने कहा—“अप्प दीपो भवः” — अपने दीपक स्वयं बनो।
यह वाक्य लगभग संपूर्ण बौद्ध धर्म का सार है। इसका अर्थ है—
* बाहरी सहारे सीमित हैं
* गुरु केवल दिशा दिखाता है
* सत्य का प्रकाश भीतर से प्रकट होता है
* अंतिम आश्रय व्यक्ति स्वयं का हो
बुद्ध के अनुसार मनुष्य तब सोता है जब वह अनचेतन होता है; वह तब जागता है जब वह साक्षी बन जाता है। इसलिए बुद्ध की सारी साधना—विपश्यना, स्मृति, श्वास-सजगता—एक ही बात सिखाती है:- “अपनी चेतना को वहीं रखो जहाँ तुम हो।”

उपनिषद : “उठो, जागो”—जागरण को परम अनुष्ठान माना
उपनिषद महायात्रा की उद्घोषणा करते हैं—“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” (उठो, जागो और श्रेष्ठ सत्य को पाने तक मत रुको)
उपनिषदों में नींद का अर्थ है अविद्या—स्वयं को शरीर, मन, विचार, अहंकार समझ लेना। और जागरण का अर्थ है—
“मैं” को चीरकर उसके पीछे स्थित प्रकाश को पहचानना।
उपनिषद कहते हैं—
* तुम देह नहीं, देह का साक्षी हो
* तुम विचार नहीं, विचारों को देखने वाली चेतना हो
* तुम्हारा असली स्वरूप नश्वर नहीं—अविनाशी है
* जागरण = आत्मा की पहचान (आत्म-विज्ञान)
सनातन परंपरा का यह सबसे प्रखर कथन है— “जागो” का अर्थ है : अपने भीतर के परमात्मा को पहचानो।

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श्रीकृष्ण : जहाँ लोक सोता है, योगी वहीं जागता है
गीता (2.69) कहती है— “यानीशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।” (जहाँ संसार नींद समझता है, वहाँ संयमी जागता है)
लोग इच्छाओं, प्रतिक्रियाओं, भोगों और मोहों में डूबे रहते हैं। उन्हें वही “जीवन” लगता है। पर योगी जिस बिंदु पर जागता है—
वह है स्व-अनुभूति, साक्षीभाव, समत्व। कृष्ण कहते हैं—
* मन को देखो, मन के साथ मत बहो
* प्रतिक्रियाओं पर सजग रहो
* सुख-दुःख दोनों में सम रहो
* कर्म करो पर “मैं कर रहा हूँ” हटाओ
यही साक्षीभाव है—और यही असली जागरण।

आदि शंकराचार्य : विवेक—जागरण का प्रथम द्वार
आदि शंकर जागरण को “विवेक” से शुरू करते हैं। उनका सूत्र है— नित्य-अनित्य विवेक — क्या स्थायी है, क्या अस्थायी?
* देह क्षणभंगुर
* विचार तरंगों की तरह
* इच्छाएँ बदलती रहती हैं
* पर आत्मा—नित्य, अचल, निष्कलंक
जब यह समझ दृढ़ होती है, तब मनुष्य बाहर नहीं, भीतर टिका रहता है। और भीतर टिकना ही—जागरण है।

स्वामी विवेकानन्द : “उठो—तुम दिव्य हो”
स्वामी विवेकानन्द इस जागरण को आधुनिक भाषा देते हैं।
वे उपनिषदों का सार कहते हैं—
* “Arise, awake.”
* “The greatest sin is to think yourself weak.”
* “All power is within you; you can do anything and everything.”
* “You are the infinite soul.”
विवेकानन्द के अनुसार— जागरण = अपने भीतर की दिव्यता, शक्ति, निर्भयता और अनंतता को पहचान लेना।
अज्ञान का पर्दा हटते ही मनुष्य जान लेता है—
उसका स्रोत परमात्मा है। और जो इस सत्य को जी ले, उससे बड़ा जाग्रत मनुष्य नहीं।

योग, तंत्र, जैन और भक्ति—चारों में जागरण का केंद्र एक
योग:- योग कहता है—“चित्तवृत्ति निरोध”। वृत्तियों का शांत होना = जागरण का उदय।
तंत्र:- तंत्र कहता है—ऊर्जा को होश से देखो। ऊर्जा अनियंत्रित हो तो नींद; साक्षी में रहे तो शिवत्व।
जैन धर्म:- जैन धारा में तीर्थंकरों को “जिन”—अर्थात जितेन्द्रिय, जाग्रत पुरुष कहा गया।
भक्ति:- भक्ति मार्ग कहता है—ईश्वर-चेतना में डूबना, अहंकार का विसर्जन = जागरण।
अलग मार्ग हैं, पर गंतव्य एक—
चेतना को उसके सर्वोच्च बिंदु तक पहुँचना।

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जागरण वास्तव में क्या है? — सनातन का सार
जागरण कोई धार्मिक क्रिया नहीं। जागरण कोई मानसिक अभ्यास नहीं। जागरण कोई सिद्धि भी नहीं। जागरण वह स्थिति है जहाँ मनुष्य पहली बार स्वयं को “देखता” है।यह देखकर कि—
* मैं विचार नहीं हूँ
* मैं भावनाएँ नहीं हूँ
* मैं मन नहीं हूँ
* मैं शरीर नहीं हूँ
* मैं वह प्रकाश हूँ जिसमें ये सब आते-जाते हैं
जागरण उसी क्षण होता है जब अंदर से आवाज उठती है—
“मैं वही हूँ जिसे हजारों साल से ‘आत्मा’ कहकर पुकारा गया।”

जागरण मनुष्य का भाग्य नहीं—निर्णय है
वही जीवन का चरम क्षण है जब मनुष्य जागते हुए सपनों से मुक्त हो जाता है। वही क्षण है जब भीतर का राजा, भीतर का बुद्ध, भीतर का कृष्ण प्रकट होता है। वही क्षण है जब मनुष्य समझता है—“दीपक बाहर नहीं, भीतर है।” “सत्य बाहर नहीं, भीतर है।” “जागरण बाहर नहीं, भीतर का प्रकाश है।”
संन्यासी की लकड़ी की तलवार, बुद्ध का “अप्प दीपो भवः”, उपनिषदों का “उत्तिष्ठत जाग्रत”, कृष्ण का साक्षीभाव, शंकर का विवेक, विवेकानन्द की दिव्यता— सब एक ही दिशा में इशारा करते हैं— “जागो—तुम वही हो जिसे जगत ब्रह्म, आत्मा, प्रकाश, चेतना कहता है।” और जब यह जागरण घटता है— मनुष्य स्वयं ईश्वर का रूप बन जाता है।
✍️कैलाश चन्द्र