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क्या मधुमक्खियों के बिना बच पाएगी मानव सभ्यता?

आचार्य ललित मुनि

प्रकृति की विशाल रंगशाला में मधुमक्खी एक ऐसा नन्हा पात्र है जिसके बिना जीवन का पूरा नाट्य ही अधूरा रह जाता है। जब हम भोर की पहली किरण के साथ खिलते हुए फूलों को देखते हैं तो हमारा ध्यान अक्सर उनके रंगों और सुगंध पर जाता है परंतु उस सौंदर्य के पीछे जो अथक परिश्रम और जीवन चक्र की निरंतरता छिपी है उसका श्रेय इस नन्हीं सी जीव को जाता है। मधुमक्खियाँ केवल शहद बनाने वाली मशीनें नहीं हैं बल्कि वे इस धरा के पारिस्थितिक संतुलन की वास्तविक आधारशिला हैं।

ब्रह्मांड की इस व्यवस्था में हर जीव का अपना एक निश्चित स्थान है लेकिन मधुमक्खियों का स्थान इतना महत्वपूर्ण है कि यदि वे विलुप्त हो जाएं तो मानव सभ्यता का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो मधुमक्खियाँ परागण की प्रक्रिया की सबसे सक्रिय कड़ी हैं। दुनिया के अधिकांश खाद्य पदार्थों और फलों के उत्पादन के लिए इनका फूलों पर मंडराना अनिवार्य है। यह एक मूक सेवक है जिसे प्रकृति ने बड़ी ही कुशलता से रचा है। एक मधुमक्खी अपने पूरे जीवनकाल में हजारों फूलों का भ्रमण करती है और इस दौरान वह अनजाने में ही जीवन के बीज बोती जाती है।

मानवीय संवेदना के धरातल पर देखें तो मधुमक्खियों का जीवन अनुशासन और सहकारिता का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण है। उनके छत्ते के भीतर का संसार किसी आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था से कम नहीं है जहाँ हर सदस्य का कार्य निर्धारित है और सभी का लक्ष्य सामूहिक कल्याण है। एक रानी मक्खी और हजारों श्रमिक मक्खियों का यह परिवार हमें सिखाता है कि एकता और समर्पण से ही बड़े लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य ने सदियों से मधुमक्खियों से बहुत कुछ सीखा है।

इनकी वास्तुकला यानी छत्ते का निर्माण ज्यामिति का एक अद्भुत नमूना है। षटकोणीय कक्षों का निर्माण कम स्थान में अधिकतम भंडारण की क्षमता प्रदान करता है जो आज भी इंजीनियरों और वास्तुकारों के लिए शोध का विषय है।  मधुमक्खी को एक तपस्वी के रूप में देखा जा सकता है जो स्वयं के लिए बहुत कम संग्रह करती है परंतु जगत के लिए मिठास छोड़ जाती है। शहद केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं है बल्कि यह मधुमक्खियों के श्रम का वह अर्क है जिसे आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों ने ही अमृत तुल्य माना है।

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पारिस्थितिक संतुलन की दृष्टि से मधुमक्खियों का योगदान अत्यंत व्यापक है। केवल मनुष्यों के भोजन के लिए ही नहीं बल्कि जंगली वनस्पतियों और अन्य जीवों के अस्तित्व के लिए भी ये अनिवार्य हैं। यदि मधुमक्खियाँ परागण न करें तो वनों का विस्तार रुक जाएगा और इससे वर्षा चक्र प्रभावित होगा। जैव विविधता को बनाए रखने में इनका योगदान अतुलनीय है। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी मधुमक्खियों का अप्रत्यक्ष योगदान खरबों डॉलर का है क्योंकि कृषि क्षेत्र की उत्पादकता सीधे तौर पर परागण की दक्षता पर निर्भर करती है।

बादाम सेब चेरी और कपास जैसी फसलें तो पूरी तरह से इन्हीं पर निर्भर हैं। परंतु विडंबना यह है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य ने इस नन्हीं सी मित्र के जीवन को ही खतरे में डाल दिया है। कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग और बढ़ते प्रदूषण ने इनके आवासों को नष्ट कर दिया है। मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगें और जलवायु परिवर्तन इनके दिशा बोध को प्रभावित कर रहे हैं जिससे कोलोनी कोलैप्स डिसऑर्डर जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं।

जब हम मधुमक्खी के जीवन का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं तो हमें प्रकृति की बुद्धिमत्ता के दर्शन होते हैं। वे न केवल मेहनती हैं बल्कि अत्यंत बुद्धिमान संचार प्रणाली का भी उपयोग करती हैं। वैगल डांस के माध्यम से वे अपनी सहेलियों को फूलों की दूरी और दिशा के बारे में सटीक जानकारी देती हैं। यह संचार व्यवस्था बिना किसी कृत्रिम यंत्र के हजारों वर्षों से सफलतापूर्वक चल रही है। मानवीय समाज में जहाँ संवाद की कमी के कारण अक्सर संघर्ष होता है वहाँ इन जीवों का आपसी सामंजस्य एक महान सीख है।

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मधुमक्खियाँ हमें धैर्य की शिक्षा भी देती हैं। एक चम्मच शहद बनाने के लिए उन्हें लाखों फूलों का चक्कर लगाना पड़ता है। उनकी यह निष्ठा हमें बताती है कि महान कार्यों की सिद्धि छोटी छोटी बूंदों के संचय से ही होती है। वे कभी भी किसी फूल को नुकसान नहीं पहुँचातीं बल्कि वे उसे फल देने के योग्य बनाकर ही वहां से विदा लेती हैं। यह प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का वह पाठ है जिसे आज के मानव को सीखने की सबसे अधिक आवश्यकता है।

इतिहास और संस्कृति में भी मधुमक्खियों का स्थान अत्यंत आदरणीय रहा है। प्राचीन सभ्यताओं में मधुमक्खी को पवित्रता और उर्वरता का प्रतीक माना जाता था। ऋग्वेद में मधु को देवताओं का भोजन कहा गया है और मधुमक्खियों के संरक्षण की कामना की गई है। विभिन्न लोक कथाओं और कविताओं में इन्हें निरंतर कर्म और मधुर वाणी का संदेशवाहक माना गया है।

परंतु वर्तमान समय की चुनौतियां भयभीत करने वाली हैं। यदि मधुमक्खियाँ कम होती गईं तो सबसे पहले हमारे भोजन की थाली से विविधता गायब हो जाएगी। इसके बाद जंगलों की हरियाली कम होने लगेगी और अंततः पूरा पारिस्थितिकी तंत्र चरमरा जाएगा। यह केवल एक जीव के विलुप्त होने का प्रश्न नहीं है बल्कि यह जीवन की उस डोरी के टूटने का प्रश्न है जिससे हम सब बंधे हुए हैं।

संग्रहालयों की तरह प्रकृति भी अपने आप में एक जीवंत विद्यालय है जहाँ मधुमक्खी जैसे जीव मुख्य अध्यापक की भूमिका में हैं। वे हमें सिखाते हैं कि कैसे प्रकृति के संसाधनों का दोहन किए बिना भी जीवन को समृद्ध बनाया जा सकता है। मधुमक्खी फूल से रस लेती है लेकिन वह फूल की पंखुड़ियों को खरोंच तक नहीं आने देती। इसके विपरीत मनुष्य ने विकास के नाम पर प्रकृति का जो हाल किया है वह चिंतनीय है। हमें अपनी कृषि पद्धतियों में बदलाव लाना होगा और जैविक खेती को बढ़ावा देना होगा ताकि ये नन्हीं परागणकर्ता सुरक्षित रह सकें। शहरों में भी हम अपने घरों की बालकनी या बगीचों में ऐसे फूल लगा सकते हैं जो मधुमक्खियों को आकर्षित करें। यह हमारी छोटी सी पहल उन्हें बड़ा सहारा दे सकती है।

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पृथ्वी पर जीवन का आधार केवल बड़ी नदियाँ पहाड़ या घने जंगल ही नहीं हैं बल्कि वे छोटे छोटे जीव भी हैं जो अदृश्य रहकर अपनी भूमिका निभाते हैं। मधुमक्खी इसी श्रेणी में सबसे ऊपर है। वह एक वैज्ञानिक है जो फूलों के रसायन को समझती है वह एक गणितज्ञ है जो अपने छत्ते का सटीक माप जानती है और वह एक समाजशास्त्री है जो सामुदायिक जीवन के नियमों का पालन करती है। मानवीय दृष्टि से उनका संघर्ष हमें यह प्रेरणा देता है कि चाहे हम कितने ही छोटे क्यों न हों हमारा योगदान संसार के लिए बहुत बड़ा हो सकता है। मधुमक्खियों के गुनगुनाने की आवाज दरअसल प्रकृति की धड़कन है। यदि यह गुनगुनाहट शांत हो गई तो संसार में एक ऐसा सन्नाटा पसर जाएगा जिसे फिर कभी भरा नहीं जा सकेगा। ॠग्वेद कहता है मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधिः॥ अर्थात वायु हमारे लिए मधुर और कल्याणकारी बहे, नदियाँ मधुर रस प्रवाहित करें तथा औषधियाँ हमारे लिए कल्याणकारी हों।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के जानकार हैं।