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जहाँ सुमति तहँ संपति नाना : हमारी कुटुम्ब व्यवस्था

आचार्य ललित मुनि

कुटुम्ब व्यवस्था की आवश्यकता पर चिंतन करने से बीते दिनों की कुछ स्मृतियां झलकती हैं, जिन्हें हमने देखा है और लोगों ने भोगा है।  शहर के दड़बानुमा फ़्लैट में एक युवा दंपती और उनका छोटा बच्चा रहते हैं। कोरोना की लहर आती है, पति को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है और पत्नी चार वर्ष के बच्चे के साथ अकेली है। न कोई पड़ोसी दरवाजा खोलता है, न कोई सहारा देने वाला। दूसरी स्मृति एक संयुक्त परिवार की है जहाँ दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन सब एक छत के नीचे हैं। परिवार का एक सदस्य बीमार पड़ता है तो दूसरे उसकी जगह लेते हैं। बच्चों की देखभाल होती है, रसोई चलती है, हिम्मत बनी रहती है। यही दो चित्र भारत में एकल परिवार और संयुक्त परिवार के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हैं।

भारत की कुटुम्ब व्यवस्था विश्व की सर्वाधिक परिष्कृत और मानवीय सामाजिक संरचनाओं में से एक है। किंतु पिछले कुछ दशकों में यह व्यवस्था तेजी से टूट रही है। शहरीकरण, औद्योगीकरण और पश्चिमी जीवनशैली के प्रभाव में परिवार सिकुड़ते जा रहे हैं और संस्कार विलुप्त होते जा रहे हैं। हमको यह जानने और  समझने का प्रयास करना चाहिए कि भारतीय संस्कृति में कुटुम्ब व्यवस्था की अनिवार्यता क्यों है।

‘कुटुम्ब’ शब्द संस्कृत की ‘कुट’ धातु से बना है जिसका अर्थ है एकत्र होना, एक स्थान पर निवास करना। मनुस्मृति में कुटुम्ब को उस इकाई के रूप में परिभाषित किया गया है जहाँ एक ही अग्नि में भोजन पकता हो और एक ही पूर्वज के वंशज एक साथ रहते हों। पाणिनि के ‘अष्टाध्यायी’ में परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उठाने वाले व्यक्ति ‘कुटुम्बिन्’ शब्द का उल्लेख है।

भारत में कुटुम्ब व्यवस्था का इतिहास वैदिक काल से मिलता है। ऋग्वेद में ‘गृह’ और ‘कुल’ की अवधारणा स्पष्ट रूप से उपस्थित है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में परिवार के सुखी जीवन की कामना करते हुए कहा गया है कि ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्’ अर्थात मिलकर चलो, मिलकर बोलो और मिलकर जानो। यह एकता का मंत्र ही कुटुम्ब व्यवस्था की नींव है। महाकाव्य काल में रामायण में राम का परिवार और महाभारत में पांडव परिवार संयुक्त कुटुम्ब के आदर्श उदाहरण हैं।

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भारतीय कुटुम्ब व्यवस्था तीन स्तंभों पर टिकी है। पहला स्तंभ है संस्कार, दूसरा है सेवा और तीसरा है सहभागिता। संस्कार वे जीवन मूल्य हैं जो बच्चा अपने परिवार में रहकर स्वाभाविक रूप से सीखता है। भारतीय कुटुम्ब एक प्राकृतिक देखभाल केंद्र है। वृद्ध माता-पिता, बीमार सदस्य, छोटे बच्चे और दिव्यांग व्यक्ति सब कुटुम्ब की छत्रछाया में सुरक्षित रहते हैं।

पश्चिमी देशों में इस कार्य के लिए ‘नर्सिंग होम’, ‘ओल्ड एज होम’ और ‘डे केयर सेंटर’ जैसी संस्थाओं की आवश्यकता पड़ती है। भारतीय कुटुम्ब ये सब कार्य निःशुल्क और प्रेमपूर्वक करता है। यहां कुटुम्ब में सुख और दुख दोनों बाँटे जाते हैं। किसी के घर में विवाह हो तो पूरा कुटुम्ब उत्सव मनाता है और किसी की मृत्यु हो तो पूरा कुटुम्ब शोक में डूब जाता है। यह भावनात्मक सहभागिता व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक स्थिरता देती है।

वर्ष 2020 और 2021 में कोरोना महामारी ने भारत और विश्व को एक ऐसी परीक्षा में डाला जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। इस महामारी ने एकल परिवार और संयुक्त परिवार के बीच के अंतर को बहुत निर्मम तरीके से उजागर कर दिया। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में अनेक ऐसे मामले सामने आए जहाँ एकल परिवारों में माता या पिता की मृत्यु हो गई और छोटे बच्चे घर में अकेले रहे। कुछ मामलों में तो पड़ोसियों ने दिनों बाद शव की सूचना दी। इसके विपरीत संयुक्त परिवारों में रहने वाले लोग इस संकट से बेहतर तरीके से निपटे। कोरोना ने सिद्ध कर दिया कि कुटुम्ब व्यवस्था व्यक्ति के लिए कितनी आवश्यक है।

प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़, भूकंप, सूखा और चक्रवात में संयुक्त परिवार की शक्ति और स्पष्ट हो जाती है। 2001 के गुजरात भूकंप, 2004 की सुनामी और 2013 की उत्तराखंड आपदा में यह देखा गया कि जिन परिवारों में एकता थी, वे तेजी से उबर गए। जिन एकल परिवारों के मुखिया की मृत्यु हो गई, उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। कुटुम्ब की उपस्थिति में ऐसे संकट का बोझ बँट जाता है।

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बुजुर्गों का संकट तो सबसे गहरा है। भारत में वृद्ध जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। ‘हेल्पेज इंडिया’ की रिपोर्ट 2021 के अनुसार भारत में सत्तर प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग अवसाद, अकेलेपन और उपेक्षा से पीड़ित हैं। इनमें से अधिकांश वे हैं जिनके बच्चे एकल परिवार बनाकर दूर रहते हैं। संयुक्त परिवार में बुजुर्ग न केवल देखभाल पाते हैं, बल्कि वे परिवार में एक सक्रिय और सम्मानित भूमिका निभाते हैं। उनका अनुभव और ज्ञान परिवार की थाती बनता है।

शहरीकरण ने परिवारों को भौगोलिक रूप से बिखेर दिया। जब युवा रोजगार के लिए दूसरे शहरों में जाते हैं तो परिवार स्वतः विभाजित हो जाता है। औद्योगिक समाज में व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन मिला और सामूहिकता को कमजोरी माना जाने लगा। पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण ने ‘प्राइवेसी’ और ‘स्वतंत्रता’ के नाम पर परिवार से अलगाव को प्रेरित किया। इसके परिणाम भयावह हुए हैं।  बच्चों में असुरक्षा, आक्रामकता और एकाकीपन बढ़ रहा है। किशोरों में नशे की लत, अपराध और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। वृद्ध माता-पिता वृद्धाश्रमों में जीवन काट रहे हैं। विवाह विच्छेद की दर बढ़ रही है।

हमारे संस्कृति में बच्चे का व्यक्तित्व उसके परिवार में उसकी स्थिति से निर्मित होता है। संयुक्त परिवार में बच्चे को अपने से छोटों की देखभाल और बड़ों का आदर करने का स्वाभाविक अवसर मिलता है। वह सहयोग, समझौता और सहनशीलता सीखता है जो उसे भविष्य में एक जिम्मेदार नागरिक बनाती है। दादा-दादी और नाना-नानी से सुनी कहानियाँ, लोकगीत और जीवन के अनुभव बच्चे की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते हैं। भारतीय कुटुम्ब व्यवस्था यही प्रदान करती है। यहाँ बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सब के पास जीवनभर के घनिष्ठ संबंध होते हैं।

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कुटुम्ब व्यवस्था की रक्षा के लिए व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर प्रयास आवश्यक हैं। व्यक्तिगत स्तर पर प्रत्येक परिवार को यह समझना होगा कि एकजुट रहना कमजोरी नहीं, शक्ति है। परिवार के बड़े सदस्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि घर में स्त्री और पुरुष दोनों के साथ समान व्यवहार हो, क्योंकि बहुत बार स्त्रियों के साथ अन्याय ही परिवार टूटने का कारण बनता है।

सामाजिक स्तर पर शिक्षा व्यवस्था में परिवार के मूल्यों को सम्मिलित करना आवश्यक है। आज के पाठ्यक्रम में परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराना अनिवार्य है। सामाजिक संगठनों को ऐसे मंच बनाने चाहिए जहाँ पारिवारिक विवादों का सौहार्दपूर्ण समाधान हो सके। ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के ‘कुटुम्ब प्रबोधन’ जैसे कार्यक्रम इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास हैं।

राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर सरकार को ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जो संयुक्त परिवारों को प्रोत्साहित करें। आयकर में संयुक्त परिवारों को विशेष छूट, वृद्ध माता-पिता की देखभाल करने वाले परिवारों को अतिरिक्त लाभ और ऐसी आवास नीतियाँ जो बड़े परिवारों के रहने की सुविधा दें, इस दिशा में कारगर कदम हो सकते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम कुटुम्ब को केवल एक पुरानी परंपरा के रूप में न देखें, बल्कि उसे भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत के रूप में पहचानें। एक सशक्त कुटुम्ब ही एक सशक्त समाज और एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करता है। तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहा था ‘जहाँ सुमति तहँ संपति नाना, जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना’। जहाँ परिवार में सद्बुद्धि और प्रेम है, वहाँ समृद्धि है और जहाँ परिवार टूट रहा है, वहाँ विपत्ति का बीज बोया जा रहा है।

 

आचार्य ललित मुनि

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।