futuredधर्म-अध्यात्म

सनातन परम्परा में स्त्री शक्ति का प्रतीक पर्व वट सावित्री

आचार्य ललित मुनि

भारत की सांस्कृतिक परंपरा में कुछ पर्व ऐसे हैं जो केवल अनुष्ठान नहीं हैं, वे एक पूरी सभ्यता की भावनात्मक अभिव्यक्ति हैं। वट सावित्री व्रत ऐसा ही एक पर्व है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या को, जब आकाश में चंद्रमा नहीं होता और धरती पर ग्रीष्म का प्रताप चरम पर होता है, उस दिन भारत की लाखों सुहागिन स्त्रियाँ वट वृक्ष के नीचे बैठकर अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं। यह व्रत महाभारत की उस अमर नायिका सावित्री को समर्पित है जिसने अपने प्रेम और बुद्धि के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लिए थे।

वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है। इसमें स्त्री की शक्ति का उद्घोष है, दांपत्य प्रेम की गहराई है और उस अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति है जो भारतीय नारी की पहचान रही है। यही कारण है कि यह व्रत सदियों से न केवल जीवित है बल्कि आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है।

वट सावित्री व्रत का पौराणिक आधार महाभारत के वन पर्व में मिलता है। मार्कंडेय ऋषि ने युधिष्ठिर को यह कथा सुनाई थी। स्कंद पुराण और भविष्योत्तर पुराण में भी इस कथा का विस्तृत वर्णन है। कथा इस प्रकार है कि मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत तेजस्विनी और विदुषी थी। उसने स्वयं वर चुनने का निर्णय किया और वन में जाकर साल्व देश के राजकुमार सत्यवान को अपना पति स्वीकार किया। नारद मुनि ने बताया कि सत्यवान की मृत्यु एक वर्ष के भीतर निश्चित है, किंतु सावित्री ने अपना निर्णय नहीं बदला।

निर्धारित दिन जब सत्यवान वन में वृक्ष काटने गए और अचानक उनके प्राण निकलने लगे, तब यमराज स्वयं आए। सावित्री अपने पति के पीछे यमराज के साथ चलती रही। उसकी तर्कशक्ति, ज्ञान और समर्पण से प्रसन्न होकर यमराज ने तीन वरदान दिए किंतु सत्यवान के प्राण देने से इनकार किया। अंत में सावित्री ने चतुराई से ऐसा वर माँगा कि यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने ही पड़े। इस कथा में सावित्री केवल एक आज्ञाकारी पत्नी नहीं है, वह एक बुद्धिमान, साहसी और संकल्पशील स्त्री है जो मृत्यु से भी नहीं घबराती।

यह कथा भारतीय साहित्य की अनमोल धरोहर है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘सावित्री’ नामक एक काव्य नाटक लिखा जो 1939 में प्रकाशित हुआ। श्री अरविंद ने भी ‘सावित्री’ नाम से एक विशाल महाकाव्य की रचना की जो अंग्रेजी साहित्य की अमूल्य कृति मानी जाती है। इन रचनाओं ने सावित्री की कथा को विश्व साहित्य में प्रतिष्ठित किया।

यह भी पढ़ें  व्रत, दान और तप की त्रिवेणी अचला एकादशी

वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष अर्थात बरगद का केंद्रीय स्थान है। बरगद को भारतीय संस्कृति में सर्वाधिक पूजनीय वृक्षों में गिना जाता है। इसका संस्कृत नाम ‘वट’ है और इसे ‘न्यग्रोध’ भी कहते हैं। पुराणों में वट वृक्ष को त्रिमूर्ति का प्रतीक माना गया है। मान्यता के अनुसार इसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में महेश का वास होता है।

वट वृक्ष की सबसे बड़ी विशेषता उसकी दीर्घायुता और अपराजेय जीवनशक्ति है। इसकी शाखाएँ धरती की ओर झुककर जड़ें पकड़ लेती हैं और एक नया वृक्ष बन जाती हैं। इस प्रकार एक वट वृक्ष एक विशाल वन बन सकता है। यही कारण है कि इसे दीर्घायु और अखंडता का प्रतीक माना गया। पत्नियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए उस वृक्ष की पूजा करती हैं जो स्वयं युगों से जीवित है। आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले में ‘थिम्मम्मा मर्रिमानु’ नामक एक वट वृक्ष है जिसका फैलाव लगभग पाँच एकड़ में है और इसे विश्व के सबसे बड़े वट वृक्षों में गिना जाता है। ऐसे विशाल वृक्षों को देखकर पूर्वजों ने इनमें दैवीय शक्ति का अनुभव किया होगा, यह स्वाभाविक है।

बौद्ध परंपरा में भी वट वृक्ष का विशेष स्थान है। भगवान बुद्ध ने बोधगया में पीपल के नीचे ज्ञान प्राप्त किया था और वट वृक्ष के नीचे भी ध्यान लगाते थे। इस प्रकार वट वृक्ष केवल हिंदू परंपरा ही नहीं, समग्र भारतीय सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।

वट सावित्री व्रत की विधि विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रचलित है, किंतु इसका मूल भाव एक ही है। उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को मनाया जाता है जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाने की परंपरा है। स्कंद पुराण के अनुसार अमावस्या को यह व्रत करने का विशेष महत्व है।

व्रत के दिन स्त्रियाँ प्रातःकाल स्नान करके नए वस्त्र और श्रृंगार धारण करती हैं। सोलह श्रृंगार का विशेष महत्व है। सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, मंगलसूत्र आदि सौभाग्य के प्रतीक चिह्नों को धारण करना इस व्रत का अनिवार्य अंग है। वट वृक्ष के नीचे पहुँचकर उसकी जड़ में जल चढ़ाया जाता है, पुष्प, अक्षत, रोली, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद कच्चे सूत से वट वृक्ष की परिक्रमा की जाती है। परिक्रमा की संख्या सात, ग्यारह या एक सौ आठ होती है जो परंपरा और श्रद्धा के अनुसार निर्धारित होती है।

परिक्रमा के समय सावित्री और सत्यवान की कथा सुनी और सुनाई जाती है। यह कथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं बल्कि एक प्रेरक जीवन संदेश है। पूजन के बाद व्रत की कथा सुनकर आशीर्वाद लिया जाता है और प्रसाद वितरित किया जाता है। अनेक क्षेत्रों में बाँस की टोकरी में सत्यवान और सावित्री की मूर्तियाँ रखकर उनकी पूजा की जाती है।

यह भी पढ़ें  आंतरिक जागरण : अप्प दीपो भवः से उपनिषदों तक एक सनातन यात्रा

उत्तरप्रदेश और बिहार के गाँवों में इस दिन स्त्रियाँ समूह में जाती हैं। गीत गाते हुए वट वृक्ष तक जाना, पूजन करना और फिर एक साथ बैठकर कथा सुनना, यह सामूहिकता इस व्रत को एक सामाजिक उत्सव बनाती है। महाराष्ट्र में इस दिन ‘वडाची पूजा’ के नाम से जाना जाता है और वहाँ पाँच प्रकार के फलों का प्रसाद चढ़ाने की परंपरा है।

वट सावित्री व्रत की नायिका सावित्री को केवल एक पतिव्रता स्त्री के रूप में देखना उसकी व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। सावित्री एक ऐसी स्त्री है जिसने स्वयं अपना वर चुना, जो विद्वान और तर्कशील थी, जिसने मृत्यु के देवता से भी वाद-विवाद में जीत हासिल की। वह भारतीय नारी की उस अदम्य शक्ति का प्रतीक है जो कोमलता और दृढ़ता दोनों को साथ लेकर चलती है।

महाभारत में सावित्री के उपाख्यान में उसकी बुद्धिमत्ता का विस्तार से चित्रण है। यमराज ने जब उसे वापस लौटने के लिए कहा, तब उसने जो उत्तर दिए वे किसी कुशल दार्शनिक के उत्तर थे। नारद पुराण में कहा गया है कि सावित्री की भक्ति, ज्ञान और पतिनिष्ठा का संयोग ही उसकी शक्ति था। आधुनिक नारीवादी दृष्टि से भी सावित्री का चरित्र प्रासंगिक है क्योंकि उसने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी, बल्कि अपनी बुद्धि का उपयोग करके भाग्य को भी बदल दिया।

सावित्री की इस कथा ने भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है। कालिदास से लेकर रवींद्रनाथ तक, अनेक कवियों और लेखकों ने सावित्री के चरित्र को अपनी रचनाओं में अमर किया। भारतीय लोककला में सावित्री और यमराज के दृश्य को चित्रित किया जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि सावित्री की कथा भारत की सामूहिक चेतना में गहरी पैठ बना चुकी है।

वट सावित्री व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक ही रूप में नहीं मनाया जाता। भारत की विविधता इस पर्व में भी झलकती है। राजस्थान में इस व्रत में ‘बायने’ की परंपरा है। व्रत के बाद सास को बायना दिया जाता है जिसमें फल, मिठाई और सुहाग की वस्तुएँ होती हैं। यह परंपरा पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने का एक अनौपचारिक तरीका है।

यह भी पढ़ें  पश्चिम बंगाल 'शपथ ग्रहण' में प्रतीकों के ज़रिए वैचारिक संदेश

बंगाल में ‘सावित्री व्रत’ को ‘सत्यसावित्री व्रत’ कहा जाता है और वहाँ इसे ज्येष्ठ मास के आखिरी दिन मनाने की परंपरा है। बंगाली महिलाएँ इस दिन उपवास रखकर सावित्री देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजती हैं। ओडिशा में इस व्रत को ‘सावित्री अमावस्या’ कहा जाता है और वहाँ वट वृक्ष की पूजा के साथ ‘सत्यनारायण कथा’ सुनने की भी परंपरा है।

गुजरात और महाराष्ट्र में इस व्रत का रूप थोड़ा अलग है। वहाँ महिलाएँ बाँस की टोकरी में सत्यवान और सावित्री की प्रतिमाएँ रखती हैं और उन्हें घर ले जाकर भी पूजती हैं। दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में यह व्रत ‘वट पूर्णिमा’ के नाम से जाना जाता है और यहाँ इसे पूर्णिमा को मनाया जाता है। तमिलनाडु में ‘आनि तिरुमंजनम’ उत्सव के आसपास इस व्रत की परंपरा है।

इन सभी क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद एक तत्व सर्वत्र समान है और वह है पति के प्रति प्रेम और उनकी दीर्घायु की कामना। यह भावनात्मक एकता ही भारत की सांस्कृतिक अखंडता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

प्रत्येक भारतीय परंपरा के पीछे एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टि भी होती है। वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष की पूजा का पर्यावरणीय महत्व अत्यंत गहरा है। बरगद का वृक्ष सर्वाधिक ऑक्सीजन उत्पन्न करने वाले वृक्षों में से एक है। इसकी विशाल छाया तपती गर्मी में राहत देती है। इसकी जड़ें भूमिगत जल को संरक्षित करती हैं और मृदा अपरदन को रोकती हैं।

ज्येष्ठ मास में जब ग्रीष्म की तपन चरम पर होती है, उस समय वट वृक्ष की पूजा के बहाने गाँव की महिलाएँ उस वृक्ष की देखभाल करती थीं, उसे जल देती थीं। यह परंपरा वृक्षों के प्रति कृतज्ञता और प्रकृति के प्रति सम्मान का एक व्यावहारिक रूप था। भारत में वृक्ष पूजा की परंपरा ने हजारों वर्षों तक वनों की रक्षा की। आज जब वन कट रहे हैं और पर्यावरण संकट गहरा रहा है, तब इस परंपरा की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।

वट सावित्री व्रत उस प्रेम की कथा है जो मृत्यु को भी झुका देता है। यह उस स्त्री की गाथा है जिसने अपने संकल्प से असंभव को संभव किया। इस व्रत में भारत की आत्मा है, उसकी सांस्कृतिक स्मृति है और उसके जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति है। वट वृक्ष की शाखाएँ जिस प्रकार धरती से मिलकर नई जड़ें पकड़ती हैं, उसी प्रकार यह परंपरा भी हर पीढ़ी में नई जड़ें पकड़ती है और अपने को जीवित रखती है।