भीमबैठका से सरस्वती तक: वाकणकर के शोध की अद्वितीय यात्रा
डाॅ. विष्णु श्रीधर वाकणकरजी ऐसी महाविभूति थे, जिन्हें सदैव अपने कार्य की धुन रहती थी; न समय की परवाह और न साधनों की। उनका पूरा जीवन भारत की पुरातत्वीय धरोहरों की खोज में बीता। उनका लक्ष्य भारत की उन सांस्कृतिक धरोहरों को पुनः प्रतिष्ठित करना था, जो समय की आँधी में ओझल हो गई थीं अथवा जिन्हें योजनापूर्वक छिपा दिया गया था।
इतिहास, सांस्कृतिक धरोहरों और चित्रकारी के प्रति उनकी रुचि बचपन से थी। अपनी शालेय शिक्षा के दौरान भी वे इतिहास के विषयों में विशेष रुचि लेते थे। घटनाएँ पढ़कर या दृश्य देखकर चित्र बनाने का प्रयास करते थे। छात्र जीवन में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए, तो उनके चिंतन को एक दिशा मिली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गोलवलकर जी भी उनकी प्रतिभा की प्रशंसा करते थे। वे संस्कार भारती के संस्थापकों में से एक थे।
उनके हाथ में काम कोई हो, उन्हें जो दायित्व मिला अथवा वे कहीं यात्रा पर निकले हों, तब भी उनका ध्यान अपने नियत कार्य के साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों की ओर जाता था। वे केवल पर्यटक के रूप में उन्हें देखने नहीं जाते थे, अपितु कला को समझने का प्रयास करते थे और उन पर शोध करते थे। वाकणकर जी अपनी अधिकांश यात्राओं में खुरपी, छोटी कुदाल और बोरी भी रखते थे। वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। कई बार तो लगता था कि पुरातात्विक धरोहरें स्वयं उन्हें अपनी ओर आमंत्रित कर रही हैं।
भोपाल के समीप भीमबैठका की खोज इसका उदाहरण है। वे रेल द्वारा कहीं यात्रा कर रहे थे। रेल की खिड़की से अचानक उनकी दृष्टि उस पहाड़ी पर पड़ी और वे उतर पड़े। उन्होंने वहाँ एक-एक गुफा और शिलाखंड को बारीकी से देखा। कहीं-कहीं खुरपी से कुछ उकेरा, गुफा के एक शिलाखंड पर कुछ देर बैठ गए, मानो प्रकृति से एकाकार हो रहे हों। उसके बाद उन्होंने जो प्रमाण एकत्र किए, वे आज पूरे संसार के सामने हैं।
भीमबैठका भोपाल से लगभग चालीस किलोमीटर दूर नर्मदापुरम मार्ग पर स्थित है। विंध्य पर्वतमाला की इस श्रृंखला में 500 से अधिक ऐसे शैलाश्रय हैं, जिन पर शैलचित्र अंकित हैं। वाकणकर जी ने इन गुफाओं की खोज 1957 में की थी। उसके बाद कई अंतरराष्ट्रीय पुरातत्ववेत्ता भारत आए, भीमबैठका गए और वहाँ की शिल्पकला देखकर सभी आश्चर्यचकित हुए। वर्ष 2003 में यूनेस्को ने भीमबैठका को विश्व धरोहर घोषित किया।
ऐसी अद्भुत और विलक्षण प्रतिभा के धनी विष्णु श्रीधर वाकणकरजी का जन्म मध्यप्रदेश के नीमच नगर में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा नीमच में ही हुई। उच्च शिक्षा के लिए पहले उज्जैन आए, फिर मुंबई गए। मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से ललित कला में डिप्लोमा प्राप्त किया और एम.ए. भी किया। यहाँ उनकी भेंट अंतरराष्ट्रीय पुरातत्वविद् फ्रांस के आंद्रे लेरू-गुएरन से हुई।
वे शोध और अनुसंधान कार्य के लिए यात्राएँ स्वयं अपना साधन जुटाकर करते थे। उन्होंने जीवन भर कोई सरकारी सहायता नहीं ली। कई बार अर्थसंकट भी आया, लेकिन अर्थाभाव उनकी अनुसंधान यात्रा में बाधक कभी नहीं बन पाया।
उन्होंने इतिहास के अनेक संदर्भों का यथार्थ संसार के सामने स्थापित किया। वाकणकर जी ने प्रमाणित किया कि वेदों का रचनाकाल कम-से-कम छह हजार वर्ष पुराना है। उन्होंने सरस्वती नदी के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए लगभग चार हजार किलोमीटर की यात्रा की और उसका पूरा प्रवाह मार्ग खोज निकाला।
उन्होंने महेश्वर, नवादा टोली, मनोटी, आवारा, इंद्रगढ़, कायथा, मंदसौर, आजादनगर, डांगवाड़ा आदि क्षेत्रों में खुदाई की और इस क्षेत्र को वैदिक कालीन सभ्यता का अंग प्रमाणित किया। उज्जैन क्षेत्र में पुरातात्विक प्रमाण खोजकर सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल की ऐतिहासिकता सिद्ध की।
वाकणकर जी ने उज्जैन में “वाकणकर इंडोलॉजिकल कल्चरल रिसर्च ट्रस्ट” की स्थापना की। उनके योगदान को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1975 में पद्मश्री से सम्मानित किया। उन्होंने हजारों शैलाश्रयों की खोज की और उनके चित्रांकन, विश्लेषण एवं प्रदर्शन भारत ही नहीं, विदेशों में भी किया।
3 अप्रैल 1988 को सिंगापुर में उनका निधन हुआ। उनकी स्मृति में मध्यप्रदेश सरकार ने उज्जैन में “वाकणकर शोध संस्थान” की स्थापना की। आज भी यह संस्थान उनके कार्यों को सहेजते हुए पुरातात्विक अनुसंधान को नई दिशा दे रहा है।
निस्संदेह, उनका व्यक्तित्व अत्यंत व्यापक और असाधारण था। उनके अनुसंधान ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के पुरातत्वविदों को नई दिशा प्रदान की। आज यह प्रमाणित हो चुका है कि मानव सभ्यता का इतिहास पश्चिमी मान्यताओं से कहीं अधिक प्राचीन है, और उसके प्रमाण भारत की धरती पर व्यापक रूप से विद्यमान हैं।

