क्या है ग्रेट निकोबार परियोजना भारत की समुद्री शक्ति का भविष्य?

हिन्द महासागर के नीले विस्तार में एक द्वीप है जो स्वतंत्रता के पश्चात भी दशकों से अपनी अपार सम्भावनाओं के बावजूद उपेक्षित रहा। ग्रेट निकोबार द्वीप, भारत की भूमि का वह दक्षिणतम छोर, जो इण्डोनेशिया के सुमात्रा द्वीप से मात्र 90 किलोमीटर और मलाक्का जलडमरूमध्य से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अब इस द्वीप का भाग्य बदलने वाला है और इसके साथ बदलेगी हिन्द महासागर में भारत की उपस्थिति की पूरी कहानी।
राहुल गांधी हाल ही में ग्रेट निकोबार द्वीप के दौरे पर गए थे। वहाँ जाकर इस प्रोजेक्ट का विरोध किया और उनका कहना है कि इस परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर घने वर्षावनों की कटाई होगी, जिससे जैव विविधता को गंभीर क्षति पहुँचेगी। इसके साथ ही वहाँ रहने वाले आदिवासी समुदायों, विशेष रूप से शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों, पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई। राहुल गांधी ने इस परियोजना को “विकास के नाम पर विनाश” करार दिया। उनका आरोप है कि सरकार आर्थिक और रणनीतिक लाभों का हवाला देकर इस परियोजना को आगे बढ़ा रही है, जबकि इसके पर्यावरणीय और सामाजिक दुष्परिणामों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
ये तो रहा राहुल गांधी का विरोध, अब सैन्य विशेषज्ञ भारत के पूर्व एयरचीफ़ आर के एस भदौरिया ने इसे मिलेट्री फ़ुटप्रिंट के लिए बहुत ही आवश्यक बताया है। हम देख रहे हैं अब लड़ाईयां हथियारों से अधिक स्ट्रेटजिक तौर पर लड़ी जा रही हैं। देख ही रहे हैं होर्मुज जलडमरु मध्य में ईरान सारी दुनिया पर नकेल कस रखी है। भारत सरकार ने अनेक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इस द्वीप पर लगभग 72,000 करोड़ रुपये की एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना की आधारशिला रखी है जिसमें एक ट्रांसशिपमेण्ट बन्दरगाह, अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और ऊर्जा संयन्त्र प्रस्तावित हैं। यह केवल एक निर्माण कार्य नहीं है, यह भारत की समुद्री रणनीति का एक ऐतिहासिक अध्याय है।
ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति को समझे बिना इस परियोजना का महत्त्व नहीं समझा जा सकता। यह द्वीप उस स्थान पर है जहाँ हिन्द महासागर और प्रशान्त महासागर आपस में मिलते हैं। विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक मलाक्का जलडमरूमध्य से प्रतिदिन वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 30 प्रतिशत माल गुजरता है। सिंगापुर इसी मार्ग के पूर्वी छोर पर बैठकर वर्षों से अरबों डॉलर कमाता आया है। ग्रेट निकोबार उसी मार्ग के पश्चिमी प्रवेश द्वार पर खड़ा है। यह स्थिति प्रकृति का वह वरदान है जिसे भारत ने आज तक पूरी तरह नहीं भुनाया था।
परियोजना की प्रमुख जानकारियों के अनुसार इसकी अनुमानित लागत लगभग 72,000 करोड़ रुपये है। यह बंदरगाह प्रतिवर्ष लगभग 16 मिलियन टीईयू (कंटेनर इकाइयों) के ट्रांसशिपमेंट की क्षमता रखेगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को नई गति मिलेगी। इसकी भौगोलिक स्थिति भी रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मलक्का जलडमरूमध्य से लगभग 150 किलोमीटर और सुमात्रा से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
परियोजना के अंतर्गत 450 मेगावाट क्षमता का ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया जाएगा, जो इसके संचालन को ऊर्जा उपलब्ध कराएगा। साथ ही, लगभग 3.5 लाख लोगों के लिए एक आधुनिक टाउनशिप विकसित करने का भी प्रस्ताव है, जिससे क्षेत्र में शहरी विकास और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।
पिछले दो दशकों में चीन ने हिन्द महासागर में अपनी उपस्थिति तेजी से बढ़ाई है। श्रीलंका में हम्बनटोटा, पाकिस्तान में ग्वादर और म्यांमार में क्योकप्यू, इन बन्दरगाहों के माध्यम से चीन ने जो रणनीतिक घेरेबन्दी बनाई है उसे विशेषज्ञ ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ कहते हैं। ग्रेट निकोबार में एक सक्रिय नौसैनिक अड्डे और ट्रांसशिपमेण्ट हब की स्थापना इस असन्तुलन को सुधारने की दिशा में भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण कदम है।
भारतीय नौसेना पहले से ही यहाँ INS बाज नामक अग्रिम अड्डा संचालित करती है। इस परियोजना के पूर्ण होने पर यह एक पूर्ण विकसित नौसैनिक केन्द्र बनेगा जहाँ से भारतीय नौसेना मलाक्का जलडमरूमध्य और पूरे पूर्वी हिन्द महासागर पर सतत दृष्टि रख सकेगी। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि चीन का 80 प्रतिशत से अधिक तेल आयात इसी मलाक्का मार्ग से होता है और भारत की यहाँ उपस्थिति एक निर्णायक रणनीतिक सन्देश है।
आज भारत का 75 प्रतिशत से अधिक ट्रांसशिपमेण्ट माल कोलम्बो, सिंगापुर और दुबई के बन्दरगाहों से होकर गुजरता है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय व्यापारी अपने ही माल के लिए प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये विदेशी बन्दरगाहों को शुल्क के रूप में देते हैं। ग्रेट निकोबार का प्रस्तावित ट्रांसशिपमेण्ट पोर्ट इस निर्भरता को समाप्त करने का अवसर है। 16 मिलियन TEU की वार्षिक क्षमता के साथ यह बन्दरगाह सिंगापुर और कोलम्बो के लिए एक वास्तविक प्रतिस्पर्धी बन सकता है।
भारत और आसियान देशों के बीच व्यापार 130 अरब डॉलर से ऊपर पहुँच चुका है। इस व्यापार का बड़ा हिस्सा उन्हीं समुद्री मार्गों से होकर जाता है जिन पर ग्रेट निकोबार की नजर है। जब यहाँ एक विकसित बन्दरगाह होगा तो इस व्यापार की लागत घटेगी, समय कम होगा और भारतीय व्यापारियों का लाभ बढ़ेगा। यह परियोजना भारत की एक्ट ईस्ट पालिसी का सबसे ठोस भौतिक आधार बनेगी।
450 मेगावाट का ऊर्जा संयन्त्र, अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और 3.5 लाख लोगों की टाउनशिप मिलकर इस द्वीप को एक आत्मनिर्भर आर्थिक केन्द्र बनाएँगे। परियोजना से 2 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार की सम्भावना है। बन्दरगाह संचालन, हवाई अड्डा प्रबन्धन, पर्यटन और सेवा क्षेत्र मिलकर अण्डमान और निकोबार के उन युवाओं को उनकी धरती पर ही अवसर देंगे जो आज रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन करते हैं।
चाणक्य ने कहा था कि समुद्र ही वास्तविक मार्ग है और जो समुद्र को नियन्त्रित करता है वह व्यापार को नियन्त्रित करता है। ग्रेट निकोबार परियोजना उसी चाणक्य नीति का आधुनिक अवतार है। यह परियोजना पूर्ण होने में दशकों लगेंगे परन्तु जिस भौगोलिक वास्तविकता पर यह खड़ी है, जिस सामरिक दृष्टि से इसे बनाया गया है और जिस आर्थिक सम्भावना को यह साकार कर सकती है, वह इसे भारत के समुद्री इतिहास का एक निर्णायक अध्याय बनाती है।
तो हाँ, ग्रेट निकोबार परियोजना भारत की समुद्री शक्ति का भविष्य है। यह भविष्य अभी निर्माणाधीन है, अभी इसकी नींव पड़ रही है, परन्तु जब यह पूर्ण होगा तो भारत का तिरंगा हिन्द महासागर की उन लहरों पर और भी ऊँचा लहराएगा जिन पर आज सारी दुनिया की नजर है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

