लोक कल्याण के संवाहक पत्रकार थे देवर्षि नारद

ब्रह्मा के मानस पुत्र, सप्तऋषियों में एक, गंधर्वों के प्रमुख और जगत के प्रथम पत्रकार देवर्षि नारदमुनि यथार्थ में लोककल्याण के परम संवाहक ही थे। नारायण के प्रति असीम श्रद्धा रखने वाले नारद बिना किसी पूर्वाग्रह, पक्षपात, स्वार्थ और आडंबर के जनहित व न्याय के प्रति स्वयं सदैव सजग रहते, तथा देव, दानव और मनुष्यों को भी सावचेत करते थे। वे सभी को सद्कार्य के लिए प्रेरित करते थे।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, ब्रह्मा के कंठ से प्रकट हुए वीणा के जनक देव नारद को तीनों लोकों में विचरण का वरदान प्राप्त था। सभी जगह भ्रमण करते हुए, पल-पल की खबर रखते हुए, वे सत्य का पता लगाते और सत्य को स्थापित करने का प्रयत्न करते।
सम्पूर्ण एवं आदर्श पत्रकार की भांति वे केवल सूचनाएँ देने का कार्य नहीं करते, वरन् मध्यस्थ की भूमिका में परस्पर सार्थक संवाद का सृजन भी करते। उन्होंने कंस और रावण को भी दुष्कर्म छोड़ने हेतु चेताया, और समय-समय पर इन्द्र, चन्द्र, हनुमान, युधिष्ठिर आदि को कर्तव्यपथ पर चलने हेतु प्रेरित किया।
नारदमुनि के कृतित्व से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि, “मैं देव-ऋषियों में नारद हूँ।” महाभारत के सभापर्व के पाँचवें अध्याय में कहा है कि, “वेद-उपनिषदों के मर्मज्ञ, पुराणों के विशेषज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष, खगोल व भूगोल विज्ञान के विद्वान, संगीतज्ञ, वाकपटु, प्रभावी वक्ता, कुशल राजनीतिज्ञ और तीनों लोकों में मन की गति से विचरण करने वाले देवर्षि नारद सर्वत्र वंदनीय हैं।”
शास्त्रों के अनुसार, नारद ने ही महर्षि व्यास को श्रीमद्भागवत और महर्षि वाल्मीकि को रामायण रचना की प्रेरणा दी। महर्षि वेदव्यास को भी वेदों के संपादन में सहयोग किया। ध्रुव को भक्तिमार्ग का उपदेश भी दिया, और शिव-पार्वति, लक्ष्मी-विष्णु एवं उर्वशी-पुरूरवा के विवाह में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कहते हैं कि भगवान सत्यनारायण की कथा का शुभारंभ भी इन्हीं की प्रेरणा से हुआ। नारद ने 18 पुराणों में प्रमुख नारद पुराण, नारद पांचरात्र, भक्तिसूत्र, बृहन्नारदीय उपपुराण संहिता, परिव्राजकोपनिषद इत्यादि की रचना भी की।
अजमेर निवासी लेखक साहित्यकार एवं रंगकर्मी हैं।

