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सरबजीत से अभिनंदन तक : भारत की विदेश नीति और नेतृत्व की दो तस्वीरें

सरबजीत सिंह वह निर्दोष भारतीय नागरिक था, जो नशे की हालत में धोखे से पाकिस्तान की सीमा में चला गया। जेल में कठोर यातनाएँ देकर कैदियों ने उसकी हत्या कर दी, और जब शव भारत आया तो उसके शरीर के सभी आंतरिक अंग गायब थे।

किसी भी सरकार की विदेश नीति और नेतृत्व कैसा होना चाहिए, कहाँ मानवीय पक्ष को प्राथमिकता दी जाए और कहाँ सख्त तेवर दिखाए जाएँ, ये दोनों उदाहरण भारत की विभिन्न सरकारों की कार्यशैली में देखने को मिलते हैं। एक उदाहरण निर्दोष नागरिक सरबजीत सिंह का है, जो धोखे से पाकिस्तान चला गया। उसे बंदी बनाकर जेल भेज दिया गया, जहाँ तेइस वर्षों तक कठोर यातनाएँ देकर कैदियों ने मार डाला, और भारत सरकार केवल विरोध पत्र लिखने के अतिरिक्त कुछ न कर सकी।

भारत का ही दूसरा उदाहरण विंग कमांडर अभिनंदन का है, जो एयर स्ट्राइक के लिए विमान लेकर पाकिस्तान सीमा में गए थे। उन्हें बंदी बनाया गया, लेकिन भारतीय नेतृत्व के दबाव में केवल 60 घंटों में ही पाकिस्तान ने अभिनंदन को सम्मान सहित भारत वापस भेज दिया।

जिन दिनों सरबजीत पाकिस्तान की जेल में था, तब भारत में हर दल की सरकार रही। सबसे लंबी दो सरकारें कांग्रेस की रहीं—पहले प्रधानमंत्री नरसिंहराव की और फिर दस वर्ष मनमोहन सिंह की सरकार रही। पर सरबजीत का भाग्य न बदला। पाकिस्तानी जेल में उसे सतत यातनाएँ मिलती रहीं।

सरबजीत सिंह का जन्म पंजाब के तरनतारन जिला अंतर्गत गाँव भीखीविंद में हुआ था। यह एक किसान परिवार था, लेकिन पिता सुलक्षण सिंह ढिल्लो अपने गाँव से दूर उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग में नौकरी करने लगे। मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर सरबजीत गाँव लौट आए और खेती करने लगे। अपनी आय बढ़ाने के लिए एक ट्रैक्टर खरीदकर भाड़े पर दूसरे गाँवों में भी खेती करने लगे।

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1984 में विवाह हुआ और वे दो बेटियों के पिता बने। जीवन खुशी से बीतने लगा, पर समय के साथ उन्हें शराब पीने की आदत लग गई, और यही आदत पूरे घर का सुख-चैन और उनकी जान ले बैठी।

वह 28 अगस्त 1990 का दिन था। वे पाकिस्तान सीमा से लगे गाँव में भाड़े पर ट्रैक्टर चला रहे थे। शाम को काम समाप्त कर शराब पी, भोजन किया और लौटने लगे। तब सीमा पर तार की बाड़ नहीं लगी थी। सरबजीत नशे में रास्ता भटक गए और पाकिस्तान सीमा में घुस गए। पाकिस्तानी सेना ने उन्हें पकड़ लिया। उन पर जासूसी का आरोप लगाकर सात दिन तक प्रताड़नाएँ दी गईं।

उन पर आरोप लगाया गया कि वे सरबजीत सिंह नहीं, मंजीत सिंह हैं। पाकिस्तान में इस नाम से एक एफआईआर दर्ज थी। सेना ने इसी नाम से अदालत में पेश किया और आरोप लगाया कि आरोपी सही नाम नहीं बता रहा। सेना ने सरबजीत सिंह को अदालत में मंजीत सिंह के नाम से पेश किया।

अदालत में उन्हें भारतीय गुप्तचर संस्था रॉ का एजेंट बताकर लाहौर, मुल्तान और फैसलाबाद बम धमाकों का आरोपी भी बनाया गया। इन आरोपों पर अदालत ने अक्टूबर 1991 में उन्हें फाँसी की सजा सुना दी।

सरबजीत सिंह के परिवार ने भारत सरकार से भी संपर्क किया और मानवाधिकार संगठनों से भी। प्रमाण के रूप में बताया गया कि वे मंजीत सिंह नहीं, सरबजीत सिंह हैं। लिखापढ़ी आरंभ हुई। भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने पत्र भी लिखे। इससे फाँसी की सजा टलती रही, पर सरबजीत रिहा न हो सके।

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1990 से 2013 तक, यद्यपि भारत में विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारें रहीं—कांग्रेस के नेतृत्व में नरसिंहराव सरकार, मनमोहन सिंह सरकार और भाजपा नेतृत्व में अटल जी की सरकार—लेकिन ये सभी सरकारें राजनीतिक अस्थिरता के दौर में रहीं और पाकिस्तान सरकार पर कोई दबाव नहीं बना सकीं। इसका पूरा लाभ पाकिस्तान ने उठाया।

1990 से लेकर 2013 तक भारत में न केवल निर्दोष सरबजीत सिंह पर क्रूरता हुई, अपितु पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी घटनाएँ भी बढ़ीं। पाकिस्तान ने अनेक झूठ रचे, फर्जी दस्तावेज तैयार किए, ऐसे गवाह भी खड़े किए कि सरबजीत सिंह ही असली मंजीत सिंह है और वह खुशी मोहम्मद के नाम से पाकिस्तान में आया था।

2005 में एक दावा यह भी किया गया कि सरबजीत सिंह उर्फ मंजीत सिंह ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। इस खींचतान और लिखापढ़ी के बीच फाँसी की सजा तो टली, पर सरबजीत सिंह को रिहाई न मिली।

रिहाई की उम्मीद और फाँसी की आशंका के बीच सरबजीत सिंह लाहौर सेंट्रल जेल में यातनाएँ सहते रहे, लेकिन रिहाई की उम्मीद कमजोर हो गई।

26 अप्रैल 2013 को लाहौर जेल के कुछ कैदियों ने सरबजीत सिंह पर हमला कर दिया। रीढ़ की हड्डी सहित उनके शरीर की कई हड्डियाँ टूट गईं। गंभीर स्थिति में उन्हें अस्पताल लाया गया। वे कोमा में थे और उनकी रीढ़ की हड्डी भी टूट चुकी थी। फिर भी उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया।

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29 अप्रैल 2013 को भारत सरकार ने एक बार फिर पाकिस्तान से रिहा करने की अपील की, जिसे पाकिस्तान सरकार ने खारिज कर दिया।

1 मई 2013 को जिन्ना अस्पताल के डॉक्टरों ने सरबजीत सिंह को ब्रेन डेड घोषित किया और 2 मई 2013 को मृत घोषित कर दिया। उनका शव भारत लाया गया। भारत में पोस्टमार्टम हुआ। भारतीय डॉक्टर यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि उनके शरीर के अधिकांश मुख्य अंग निकाल लिए गए थे। क्यों निकाले गए, इसका उत्तर कभी न मिला और न ही पाकिस्तान ने स्वीकार किया।

सरबजीत सिंह के परिवार को पंजाब और केंद्र सरकार ने आर्थिक सहायता दी और पंजाब में तीन दिन का शोक घोषित हुआ, पर सरबजीत सिंह के प्राण के साथ भारत की प्रतिष्ठा भी न बच सकी।

इस संदर्भ में वर्ष 2019 की उस घटना का उल्लेख उचित होगा, जब एयर स्ट्राइक के दौरान विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान में गिरफ्तार हो गए। तब भारत सरकार के दबाव में पाकिस्तान ने केवल साठ घंटे के भीतर उन्हें सम्मान सहित वापस किया।

बाद में अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में कहा गया कि यदि पाकिस्तान विंग कमांडर अभिनंदन को रिहा न करता, तो भारत ने पाकिस्तान पर आक्रमण की तैयारी कर ली थी।

पाकिस्तान की जेल में जब सरबजीत सिंह की क्रूरता पूर्वक हत्या हुई, तब भारत में मनमोहन सिंह की सरकार थी, और जब विंग कमांडर अभिनंदन भारत लौटे, तब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार थी।