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कहाँ चली गई वह दाई?

आचार्य ललित मुनि

पुरानी बात है, मैं छठवीं में पढता था। बारिश का मौसम याने जुलाई का महीना था, रात को दादी ने कहा कि ‘जा, रामकली को बुलाकर ला।’ रामकली दाई थी, उसका काम जचकी करवाना था, वही गांव की डॉक्टर थी, जब किसी के यहां भी बच्चा होने वाला होता था तो आस पास के गांव के लोग भी इसे ही बुलाते थे। वह प्रसव कराने में पारंगत थी, कोई कभी भी बुलाए, तुरंत अपना झोला उठाकर चल पड़ती थी, न दिन देखती न रात।

ऐसी ही दाई भारत के हर गांव में होती थी, तब न अस्पताल, न डॉक्टर, न एम्बुलेंस। वह दाई ही होती थी, जिसके हाथों में वर्षों का अनुभव है, आँखों में धैर्य, और होठों पर भगवान का नाम होता था। जिसे देखकर घर के बड़े बुजुर्गों के माथे की चिंता की लकीरें हट जाती थीं। वह सिर्फ बच्चा पैदा नहीं कराती थी, वह नवजीवन को धरती पर उतारती थी और वंशबेल को बढाने में सहायक होती थी।

आज वह दाई माँ लुप्त हो रही है। अब गांव में दाई दिखाई नहीं देती। उसका झोला कहीं धूल खा रहा है और उसका नाम भी धीरे धीरे स्मृति से मिटता जा रहा है। यह केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, यह एक पूरी सभ्यता की स्मृति का क्षरण है। दाई शब्द सुनते ही मन में एक वृद्धा का चित्र उभरता है जिसकी झुर्रीदार हथेलियों में नवजीवन  को धरती पर लाने की क्षमता है। भारत के ग्रामीण और अर्धशहरी समाज में दाई वह स्त्री होती थी जो प्रसव के समय घर में आती थी और माँ व नवजात दोनों की देखभाल करती थी। यह कोई औपचारिक पद नहीं था, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होने वाला एक पवित्र दायित्व था।

दाई का काम केवल प्रसव कराना नहीं था। वह गर्भावस्था के दौरान माँ की स्थिति की जाँच करती थी, उसे पोषण संबंधी सलाह देती थी, जड़ी बूटियों से बने काढ़े पिलाती थी, और प्रसव के बाद जच्चा की मालिश करती थी। नवजात शिशु को नहलाना, उसकी नाभि की देखभाल करना, उसे पहली बार माँ के स्तन से लगाना, ये सब दाई के अनुभव के दायरे में आते थे। इतना ही नहीं, कई दाइयाँ प्रसव के बाद चालीस दिन तक जच्चा के घर आती रहती थीं।

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यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय से नहीं मिलता था। उन्हें बिना किसी सोनोग्राफ़ी एम आर आई के जच्चा के परीक्षण मात्र से मालूम हो जाता था कि बच्चा कैसा है, कहीं नाल तो नहीं लिपटी हुई, आड़ा-तिरछा तो नहीं है, कहीं उल्टा तो नहीं है। बच्चे को सीधा करना उसकी नाल को ठीक करना तथा सुरक्षित प्रसव कराना एवं बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। उसने यह ज्ञान किसी पढाई से नहीं प्राप्त किया, बल्कि यह ज्ञान उसे पीढी दर पीढी एवं अनुभव से ज्ञात हुआ। यह माँ से बेटी को, नानी से नातिन को, और गाँव की बड़ी दाई से छोटी दाई को यह ज्ञान सौंपा जाता था। हर क्षेत्र की दाई के अपने तरीके थे, अपनी जड़ी बूटियाँ थीं, अपने मंत्र थे। यह एक जीवित, साँस लेता हुआ स्त्री चिकित्सा का ज्ञान भंडार था।

भारत में दाई परम्परा का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव सभ्यता का। वेदों में सूतिकागृह का उल्लेख है। आयुर्वेद के ग्रंथों में प्रसव सहायिका की भूमिका का विस्तृत वर्णन है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी ऐसी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है जो प्रसव कार्य में निपुण होती थीं।

स्वतंत्रता से पहले और स्वतंत्रता के बाद के कई दशकों तक, जब देश में अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र नाम मात्र के थे, तब यह दाइयाँ ही थीं जो करोड़ों माताओं और शिशुओं की रक्षा करती थीं। एक अनुमान के अनुसार 1950 के दशक में भारत में 90 प्रतिशत से अधिक प्रसव घर पर ही होते थे और उनमें से अधिकांश दाइयों की सहायता से। देश की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा किसी न किसी दाई के हाथों धरती पर उतरा है।

सामाजिक दृष्टि से दाई केवल एक सेवा प्रदाता नहीं थी। वह समाज की धरोहर थी। वह जानती थी कि किस घर में कौन पैदा हुआ, किसकी कितनी संतानें हुईं, कौन जीया और कौन नहीं बचा। वह घर की स्त्रियों की गुप्त व्यथाओं की अमानतदार थी। प्रसव जैसे अत्यंत निजी और संवेदनशील क्षण में उसकी उपस्थिति एक डॉक्टर की नहीं, एक विश्वस्त परिजन की होती थी।

मेरी माँ कहती है- दाई के आते ही लगता था कि सब ठीक हो जाएगा। उसका हाथ थामना ही दवा थी और उसका आना ही सकुशल प्रसव की गारंटी था। 

1990 के दशक से और विशेषकर 2005 में जननी सुरक्षा योजना के बाद संस्थागत प्रसव यानी अस्पताल में बच्चे को जन्म देने को सरकारी नीति का अनिवार्य हिस्सा बना दिया गया। इस नीति के पीछे मंशा अच्छी थी क्योंकि मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करना एक वास्तविक और गंभीर समस्या थी। लेकिन इस नीतिगत बदलाव के एक अनचाहे परिणाम के रूप में दाई प्राचीन परम्परा एवं सदियों के ज्ञान को हाशिए पर धकेल दिया गया।

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धीरे धीरे दाई को अनपढ़, अप्रशिक्षित और खतरनाक के रूप में बताया जाने लगा। उसका पारम्परिक ज्ञान अंधविश्वास की श्रेणी में रख दिया गया। समाज में यह संदेश फैला कि घर पर प्रसव कराना मतलब जोखिम मोल लेना है। नई पीढ़ी की माताओं ने अस्पताल को सुरक्षित और दाई को पुराना मान लिया। ज्ञान का प्रसार अगली पीढी में नहीं हुआ और इस प्रकार वह अटूट ज्ञान की श्रृंखला एक के बाद एक कड़ी टूटती गई। शहरीकरण ने भी बड़ी भूमिका निभाई। जब परिवार गाँव से शहर आए तो वे अपनी दाई को साथ नहीं ले जा सके। शहर में तो अस्पताल था, नर्सिंग होम था, प्रशिक्षित दाई यानी नर्स थी लेकिन भावनात्मक लगाव नहीं था, व्यावसायिकता थी।

कहा जाता है कि हर बुजुर्ग के जाने से एक पुस्तकालय जलता है। दाई के जाने से तो एक पूरा परम्परागत चिकित्सा विश्वविद्यालय जलता है। उनके पास जो ज्ञान था वह सैकड़ों वर्षों के अनुभव, प्रयोग और परिशोधन का निचोड़ था।

आधुनिक विज्ञान अब धीरे धीरे यह मान रहा है कि प्राकृतिक प्रसव, माँ और बच्चे दोनों के लिए बेहतर होता है। उपले की आँच पर गर्म किया गया सरसों का तेल जो दाई मालिश के लिए उपयोग करती थी, उसके गुण आधुनिक शोध में सिद्ध हो रहे हैं। जड़ी बूटियों से बने काढ़े जो वह जच्चा को पिलाती थी, उनमें से कई की औषधीय क्षमता अब वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो रही है। लेकिन जब तक हम यह समझे, तब तक वह ज्ञान की बहुत बड़ी विरासत नष्ट हो चुकी थी।

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इससे भी बड़ी क्षति भावनात्मक और सांस्कृतिक है। दाई माँ केवल प्रसव नहीं कराती थी, वह उस पल को एक पवित्र अनुभव बनाती थी। उसके मंत्र, उसकी दुआएँ, उसका आश्वासन, ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते थे जिसमें माँ स्वयं को अकेला नहीं महसूस करती थी। आज के अस्पतालों में प्रसव एक चिकित्सीय प्रक्रिया है, लेकिन दाई के साथ वह एक जीवन उत्सव था।

सरकार सुरक्षित प्रसव कराने के लिए संस्थागत प्रसव पर जोर देती है। जिससे जच्चा बच्चा दोनों स्वस्थ रहें और मृत्यु दर कम हो। लेकिन इसके दुष्परिणाम भी सामने दिखाई दे रही है। आज भारत में 2024-25 में सिजेरियन (C-section) प्रसव की दर 27% से अधिक हो गई है, जो पिछले 16 वर्षों में चार गुना से अधिक की वृद्धि है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार, यह दर 21.5% थी। निजी अस्पतालों में यह दर 47.4% तक है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह केवल 14.3% है।

दाई माँ का न होना केवल एक परम्परा का समाप्त होना नहीं है बल्कि यह एक पूरे दर्शन का, एक जीवन दृष्टि का, एक मानवीय संवेदना का क्षरण है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ तकनीक और विज्ञान ने जीवन को बेहतर बनाया है, यह सच है। लेकिन बेहतर बनाने की इस दौड़ में हम बहुत कुछ खो भी रहे हैं। जब हम दाई माँ को बिसराते हैं तो हम अपनी उस स्मृति और संस्कृति को बिसराते हैं जो हमें बताती थी कि जन्म एक उत्सव है जो पीढियों को आगे बढाता है।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के जानकार हैं।