अजमेर का ‘लाल्या-काल्या मेला’ : नृसिंह जयंती पर जीवंत होती आस्था और परंपरा

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान नृसिंह जयंति के रूप में मनाया जाता है, इसे नृसिंह चतुर्दशी कहते हैं। इस अवसर पर नया बाजार होलीदड़ा स्थित श्रीनृसिंह मंदिर में सांयकाल भरने वाला लाल्या-काल्या का मेला अजमेर की सांस्कृतिक धरोहर है। यह मेला श्रीविष्णु के 24 अवतारों में से तृतीय वराह तथा चतुर्थ नृसिंह अवतार की कथा से जुड़ा है।
यक्षपुत्री दिति के दोनों पुत्र हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप दैत्य प्रवृत्ति के थे। हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को गहरे समुद्र में ले जाकर छुपा दिया था, तब श्रीविष्णु ने अर्धमानव व अर्धशूकर के रूप में वराह अवतार लिया और भूदेवी पृथ्वी को समुद्र से निकालकर दैत्य हिरण्याक्ष का वध किया। भाई के वध से रूष्ट होकर हिरण्यकश्यप ने तपस्या कर ब्रह्माजी से मानव-पशु, दिन-रात, भीतर-बाहर, अस्त्र-शस्त्र से न मारे जाने का वरदान प्राप्त किया।
श्रीविष्णु के विरुद्ध होने के कारण हिरण्यकश्यप ने विष्णुभक्त अपने पुत्र प्रहलाद पर भी घोर अत्याचार किए। कुछ न बिगाड़ पाया, तब दरबार में बुलाकर चुनौती दी कि तेरा भगवान सर्वत्र है, तो इस खम्भे में क्यों नहीं दिखता। यह कहते हुए उसने जैसे ही खम्भे पर घूंसा मारा, तत्क्षण ही खम्भा फाड़कर अर्धमानव व अर्धसिंह के रूप में भगवान श्रीनृसिंह प्रकट हुए और देहरी पर बैठकर हिरण्यकश्यप को जंघा पर लेकर नाखूनों से वध कर दिया।
लाल्या-काल्या के मेले में भी इसी कथा की प्रस्तुति की जाती है। 350 से अधिक वर्ष पूर्व सेठ रामप्रसाद बंसल द्वारा इस मंदिर के निर्माण के साथ ही मेले की परंपरा भी जुड़ गई थी। इस दिन प्रातःकाल भगवान नृसिंह का श्रृंगार कर पूजा और उत्सव आरती होती है।
सांयकाल मेले में वराह रूप में ‘लाल्या’ बना कलाकार हाथ में सोटा लिए श्रद्धालुओं पर घुमाता है, तो लोगों में सोटे की मार का प्रसाद ग्रहण करने की होड़ मच जाती है। वहीं हिरण्याक्ष के रूप में ‘काल्या’ बने कलाकार के प्रहार से लोग बचने का प्रयत्न करते हैं। बीच-बीच में उनकी बहन ‘नकटी’ भी प्रजा रूपी श्रद्धालुओं को सताने का प्रयास करती है।
फिर अंततः लाल्या अपने वार से काल्या का वध कर देता है। इससे रूष्ट होकर हिरण्यकश्यप प्रजाजन पर आतंक मचाने लगता है, तो श्रद्धालु श्रीविष्णु को सहायता के लिए पुकारते हैं। भक्तों की पुकार सुनकर भगवान श्रीनृसिंह खम्भा फाड़कर प्रकट होते हैं और हिरण्यकश्यप का वध कर देते हैं। श्रद्धालु जय-जयकार करने लगते हैं।
जिस खम्भे से श्रीनृसिंह प्रकट होते हैं, उसे कागज आदि विविध सामग्री से बनाया जाता है। श्रद्धालु अपने साथ उस खम्भे के कागज आदि सामग्री के टुकड़े भी शुभ प्रतीक के रूप में ले जाते हैं। मेला समाप्त होने पर मंदिर में भजन और आरती होती है, फिर प्रसाद बांटने के उपरांत आयोजन पूर्ण होता है।
इस पूरे दृश्य को साकार करने वाला यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मेला राजस्थान ही नहीं, संपूर्ण भारत में आस्था और श्रद्धा का अनूठा संगम स्थल है। दूर-दूर से हजारों लोग इस मेले के साक्षी बनने आते हैं और सोटे का प्रसाद पाकर धन्य हो जाते हैं।
अजमेर निवासी लेखक साहित्यकार एवं रंगकर्मी हैं।

