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जनजातीय समाज की दिल्ली में होगी गर्जना : आखिर क्यों उठी डीलिस्टिंग की मांग?

आचार्य ललित मुनि

दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में 24 मई 2026 को एक असाधारण जनसैलाब उमड़ने की तैयारी है। झारखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा और देश के कोने कोने से जनजातीय समाज के लोग एक साझे उद्देश्य के साथ दिल्ली पहुँचेंगे। इस महागर्जना रैली का आयोजन जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा किया जा रहा है और इसमें लगभग 10 लाख आदिवासियों की भागीदारी का लक्ष्य रखा गया है। रैली की केन्द्रीय माँग है ‘डीलिस्टिंग’ अर्थात् उन व्यक्तियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर किया जाए जिन्होंने अपनी मूल जनजातीय संस्कृति, परम्परा और धर्म को त्यागकर धर्मांतरण कर लिया है।

यह रैली करने का निर्णय एकाएक नहीं हुआ है। जनजाति सुरक्षा मंच 2006 से इस माँग को लेकर निरन्तर आन्दोलन कर रहा है। अब तक 221 जिलों में जिला स्तरीय रैलियाँ हो चुकी हैं, 8 राज्यों में प्रान्त स्तरीय रैलियाँ आयोजित की जा चुकी हैं और लगभग 50 हजार ग्रामों में जनसम्पर्क किया जा चुका है। इन सब कार्यक्रमों में सात लाख से अधिक लोगों की भागीदारी रही है। यह डीलिस्टिंग आन्दोलन जनजातीय समाज के लिए केवल एक राजनीतिक माँग नहीं है, यह उनके अस्तित्व, उनकी संस्कृति और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का संघर्ष है।

यहाँ डीलिस्टिंग का अर्थ है उन व्यक्तियों को अनुसूचित जनजाति (ST) की सरकारी सूची से बाहर करना जिन्होंने अपनी मूल जनजातीय पहचान को त्यागकर ईसाई या इस्लाम धर्म को अपना लिया है। इस आन्दोलन का संवैधानिक आधार है अनुच्छेद 341 और 342 की भिन्न व्यवस्थाएँ।

संविधान के अनुच्छेद 341 में अनुसूचित जातियों (SC) के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रावधान है। राष्ट्रपति के संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 की धारा 3 स्पष्ट रूप से कहती है कि केवल हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म के लोग ही अनुसूचित जाति के रूप में मान्य हैं। इसका सीधा अर्थ है कि यदि कोई SC व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म अपना लेता है तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी मार्च 2026 में इसे स्पष्ट किया कि धर्मांतरण के बाद SC का दर्जा और उससे जुड़े संरक्षण समाप्त हो जाते हैं।

किन्तु अनुच्छेद 342 जो अनुसूचित जनजातियों से सम्बन्धित है, में इस प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं है। संविधान निर्माताओं की मंशा यह थी कि जनजाति की पहचान मूलतः नृजातीय (ethnic) है, धार्मिक नहीं। इसी का परिणाम है कि धर्मांतरित जनजातीय कानूनी रूप से अनुसूचित जनजाति का दर्जा बनाए रख सकते हैं। डीलिस्टिंग आन्दोलन की माँग यही है कि जैसा अनुच्छेद 341 में SC के लिए प्रावधान है, वैसा ही संवैधानिक संशोधन अनुच्छेद 342 में भी हो।

जनजातीय समाज का यह आन्दोलन किसी एक घटना की प्रतिक्रिया नहीं है। यह दशकों के अनुभव से उपजी एक गहरी पीड़ा की अभिव्यक्ति है। जनजातीय समाज की विशिष्ट पहचान उनकी अपनी भाषा, उनके पारम्परिक देवता और प्रकृति आधारित उपासना पद्धति, उनकी रूढ़ि और परम्परा में निहित है। सरना, गोंडी, डोंगरी जैसी पूजा पद्धतियाँ उनकी सांस्कृतिक धरोहर हैं। जब कोई व्यक्ति धर्मांतरण करता है तो वह केवल अपना धर्म नहीं बदलता, वह अपनी पूर्ण जीवनशैली, उपासना पद्धति और सांस्कृतिक आचरण से अलग हो जाता है।

डीलिस्टिंग आन्दोलन के समर्थकों का तर्क है कि जो व्यक्ति अपनी जनजातीय संस्कृति, रूढ़ि और पुरखों के जीवन मूल्यों को छोड़ चुका है, वह भारत सरकार के स्थापित मापदंडों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की भावना के अनुरूप अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना जाना चाहिए। इस माँग का केन्द्र बिन्दु यह है कि मूल आदिवासियों के लिए बनाए गए संवैधानिक संरक्षण का लाभ केवल उन्हीं को मिले जो वास्तव में उस समुदाय का जीवन जी रहे हैं।

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जनजाति सुरक्षा मंच के लोगों का कहना है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी जनजाति समाज अपने अधिकारों को लेकर खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। उनकी चिन्ता यह है कि कई मामलों में जनजातियों के लिए बनाई गई योजनाओं और सुविधाओं का लाभ ऐसे लोग उठा रहे हैं जो धर्म परिवर्तन कर चुके हैं। शिक्षा में आरक्षण, सरकारी नौकरियों में आरक्षण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण और विभिन्न सरकारी कल्याण योजनाओं का लाभ उन व्यक्तियों को मिल रहा है जो अब जनजातीय जीवनशैली नहीं जीते।

संविधान के अनुच्छेद 342 के अन्तर्गत 700 से अधिक अनुसूचित जनजातियाँ अधिसूचित हैं जिन्हें शिक्षा, नौकरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में विशेष आरक्षण प्राप्त है। यह आरक्षण उन समुदायों के लिए है जो ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर रहे हैं। डीलिस्टिंग आन्दोलन के समर्थकों का कहना है कि यह आरक्षण जब उन लोगों तक पहुँचता है जो अब उस वंचित परिस्थिति में नहीं हैं अथवा जो अपनी जनजातीय पहचान से अलग हो चुके हैं, तो वास्तव में जरूरतमंद मूल आदिवासियों का हक कम होता है।

इसके अतिरिक्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है। ST के लिए आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों से यदि धर्मांतरित व्यक्ति उम्मीदवार बन सकते हैं तो मूल जनजातीय समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व पतला पड़ जाता है। जनजाति सुरक्षा मंच इसी विन्दु को उठाते हुए माँग करता है कि ST के लिए आरक्षित सीट से केवल वही व्यक्ति उम्मीदवार बने जो वास्तव में उस जनजातीय जीवनशैली और संस्कृति का अंग हो।

राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत कहते हैं कि यह केवल अधिकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व की भी लड़ाई है। इससे वास्तविक और मूल आदिवासियों को उनके अधिकारों का संरक्षण मिल सकेगा। रैली में प्रधानमंत्री को एक विशेष ज्ञापन सौंपा जाएगा जिसमें मुख्य रूप से दो माँगें होंगी। पहली, धर्मांतरण पर अंकुश लगाने के लिए कठोर कानून बनाए जाएँ। दूसरी, संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन करके अनुच्छेद 341 की भाँति प्रावधान किया जाए जिसके अन्तर्गत मूल संस्कृति और परम्परा छोड़ चुके धर्मांतरित व्यक्तियों को ST सूची से बाहर किया जाए।

डीलिस्टिंग की माँग यदि संसद में विधायी संशोधन के रूप में स्वीकार की जाती है तो इसके कई सकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं। पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण लाभ होगा मूल आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का सशक्त संरक्षण। जो शिक्षा, नौकरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण का अधिकार संविधान निर्माताओं ने उन वंचित जनजातीय समुदायों के लिए दिया था, वह उन्हीं तक अधिक प्रभावी रूप से पहुँच सकेगा। वास्तव में जंगलों में जीवन जीने वाले, अपनी पारम्परिक जीवनशैली और पूजा पद्धति को बनाए रखने वाले आदिवासियों को सरकारी योजनाओं और अवसरों का पूरा लाभ मिलेगा।

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दूसरा लाभ होगा जनजातीय संस्कृति और भाषाओं का संरक्षण। जब जनजातीय पहचान का कानूनी ढाँचा स्पष्ट होगा और उसमें सांस्कृतिक जीवन्तता की अनिवार्यता होगी, तो समुदाय को अपनी भाषा, कला, नृत्य, गीत और परम्परागत ज्ञान को जीवित रखने की प्रेरणा मिलेगी। भारत में लगभग 15 करोड़ आदिवासी हैं जिनकी सैकड़ों जनजातीय भाषाएँ और सांस्कृतिक परम्पराएँ हैं। इनका संरक्षण राष्ट्रीय विरासत के लिए भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

तीसरा लाभ यह होगा कि आरक्षण के वास्तविक लक्ष्यों की प्राप्ति अधिक प्रभावी होगी। संविधान के अनुच्छेद 46 में राज्यों को अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों की अभिवृद्धि का और सामाजिक अन्याय से संरक्षण का निर्देश है। जब लाभार्थी स्पष्ट रूप से परिभाषित होंगे, तो इन लक्ष्यों की प्राप्ति भी अधिक निश्चित होगी।

चौथा लाभ होगा जनजातीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व की प्रामाणिकता। ST के लिए आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों पर यदि वास्तव में उस समुदाय की जीवनशैली जीने वाले प्रतिनिधि चुने जाएँगे तो वे उस समुदाय की असली समस्याओं को संसद और विधानसभाओं में अधिक प्रभावी ढंग से उठा सकेंगे। जल, जंगल, जमीन के अधिकार, वन अधिकार अधिनियम का क्रियान्वयन और पाँचवीं अनुसूची के प्रावधानों का पालन जैसे मुद्दे अधिक सशक्त रूप से उठाए जा सकेंगे।

मार्च 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने SC और ST के मामले में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया जो इस पूरे विमर्श को नई दिशा देता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि SC के मामले में धर्मांतरण के बाद आरक्षण का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है क्योंकि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 में यह प्रावधान है। किन्तु ST के सन्दर्भ में धर्म परिवर्तन अकेला निर्णायक कारक नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि यह देखना होगा कि व्यक्ति ने जनजातीय जीवनशैली, परम्पराएँ और रीति रिवाज बनाए रखे हैं या नहीं।

जनजाति सुरक्षा मंच इस निर्णय को अपनी माँग के पक्ष में एक महत्त्वपूर्ण आधार मानता है। यदि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं यह कह रहा है कि जनजातीय जीवनशैली से पूरी तरह अलग हो चुका व्यक्ति उस जनजाति का अंग नहीं माना जाएगा, तो संसद को चाहिए कि वह अनुच्छेद 342 में स्पष्ट प्रावधान करे जिससे यह निर्धारण प्रक्रिया पारदर्शी और कानूनी रूप से बाध्यकारी हो। इस विधायी स्पष्टता से अदालतों पर मामलों का बोझ भी कम होगा और मूल आदिवासियों को त्वरित न्याय मिलेगा।

यह आन्दोलन केवल आरक्षण के आर्थिक लाभों तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें जनजातीय अस्मिता के उस गहरे प्रश्न में हैं जो संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1994 में विश्व जनजातीय दिवस की स्थापना करते समय उठाया था। जनजातीय समाज एक ‘एथनिक ग्रुप’ है जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान, संस्कृति, भाषा, रीति रिवाज और परम्पराएँ हैं। यह पहचान उन्हें मुख्यधारा के समाज से अलग बनाती है और यही उनकी शक्ति भी है।

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जनजातीय समाज के एक वर्ग का यह भी कहना है कि जब प्रकृति के साथ उनका सम्बन्ध, उनके पवित्र स्थल और उनकी समग्र जीवनदृष्टि बाह्य धर्मों के प्रभाव से बदल जाती है, तो वनों के संरक्षण और जैव विविधता की रक्षा का वह परम्परागत ज्ञान भी लुप्त होने लगता है जो पीढ़ियों से जनजातीय समाज ने सँजोया है। इस दृष्टि से डीलिस्टिंग की माँग पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।

24 मई 2026 की दिल्ली रैली केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं है। यह उस समाज का आत्मसाक्ष्य है जो कहना चाहता है कि हम अपनी पहचान के साथ जीते हैं, अपनी संस्कृति को बचाना चाहते हैं और चाहते हैं कि हमारे लिए बनाए गए संवैधानिक प्रावधानों का लाभ केवल हमें मिले। राजस्थान के जनजातीय नेता, झारखंड के उराँव और मुंडा समुदाय के प्रतिनिधि, छत्तीसगढ़ के गोंड और बैगा समाज के लोग, मध्य प्रदेश और ओडिशा के जनजातीय क्षेत्रों से हजारों लोग एक साझे स्वर में बोलेंगे।

जनजाति सुरक्षा मंच ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ हजारीबाग के जनजाति संवाद में डीलिस्टिंग का विषय प्रमुखता से रखा था। अब 24 मई को यह माँग और अधिक तेज और संगठित रूप में राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत होगी। यह रैली संसद और सरकार के लिए एक स्पष्ट संदेश होगी कि जनजातीय समाज जागरूक है, संगठित है और अपनी माँगों के प्रति दृढ़ है।

डीलिस्टिंग की माँग का समर्थन करने वाले जनजातीय समाज के लोगों की पीड़ा वास्तविक है। वे अपनी पहचान खोते नहीं देखना चाहते। वे चाहते हैं कि जो संवैधानिक सुरक्षा कवच उनके पूर्वजों के लिए बनाया गया था, वह उनके बच्चों और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचे। यह माँग किसी को नुकसान पहुँचाने की नहीं, अपने अधिकारों को सुरक्षित करने की है।

भारत का संविधान सभी नागरिकों को अपना धर्म चुनने की स्वतंत्रता देता है। कोई भी इस स्वतंत्रता पर प्रश्न नहीं उठा रहा। डीलिस्टिंग की माँग का सार यह है कि धर्म बदलने की स्वतंत्रता और जनजाति की संवैधानिक सुरक्षा, ये दोनों एक साथ नहीं चल सकते। जिसने अपनी जनजातीय जीवनशैली छोड़ दी है, उसे एक ओर धर्मांतरण के लाभ मिलें और दूसरी ओर जनजाति के संवैधानिक अधिकार भी मिलते रहें, यह मूल आदिवासियों के साथ अन्याय है।

24 मई की दिल्ली गर्जना रैली उस आवाज को राष्ट्रीय फलक पर लाने का अवसर है जो दशकों से जंगलों और पहाड़ों में गूँजती रही है। आशा है कि संसद और सरकार इस आवाज को सुनेंगे और संविधान के अनुच्छेद 342 में वह स्पष्टता लाएँगे जो मूल जनजातीय समाज के संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित करे।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।