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बस्तर के बच्चों को अनाथ करने वाले राक्षसों को नायक बताना बंद करो!

प्रियंका कौशल, रायपुर

बस्तर में हजारों बच्चे ऐसे हैं जिनके माता-पिता नक्सल क्रूरता के शिकार हुए हैं। सैकड़ो बच्चों ने अपने पिता या माता, या फिर दोनों को ही नक्सल हिंसा में खो दिया है। एक वर्ष से लेकर पन्द्रह सोलह वर्ष के ये बच्चे रिश्तेदारों के या फिर सरकार के भरोसे ही पल रहे हैं। जब इन बच्चों से बात की जाए तो ये अपनी पीड़ा तक व्यक्त नहीं कर पाते हैं। कई तो हिंदी या छत्तीसगढ़ी बोलना भी नहीं जानते क्योंकि उनकी मातृभाषा गोंडी या फिर हल्बी है। इन बच्चों को देखकर नक्सलवाद का घिनौना चेहरा सामने आता है।

वर्ष 2000 से 2026 तक नक्सलियों ने 4,766 से अधिक आम नागरिकों की जान ली है। इनमें ज्यादातर बस्तर में रहने वाले जनजातीय समाज के लोग मारे गए हैं। नक्सलियों ने कभी मुखबिरी का आरोप लगाकर स्थानीय लोगों को मारा तो कभी आईईडी ब्लास्ट करके हत्याएं की। एक समय ऐसा भी था कि बस्तर के चप्पे चप्पे में विस्फोटक लगाए गए थे, ताकि इनपर पैर रखते ही सेना या पुलिस के जवान मारे जाएं। लेकिन अक्सर आम आदमी, बच्चे, महिलाएं और गौ वंश इन विस्फोटों की चपेट में आने से मर जाते थे।

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नक्सली कमांडर और जन मिलिशिया के सदस्य ये अच्छी तरह जानते थे कि इन आईईडी, प्रेशर बम, कुकर बम या टिफिन बम से स्थानीय निर्दोष नागरिक भी मारे जाएंगे, तब भी उनका दिल कभी नहीं पसीजा। कभी स्कूल के लिये निकले बच्चे इनपर पैर रखते ही चिथड़े चिथड़े हो गए, तो कभी बकरी चराती माताएं इनका शिकार हुई। कभी किसी पेड़ की छांव में बैठने को आतुर वृद्ध विस्फोटक के कारण जान से हाथ धो बैठे। पिछले दो-ढाई दशकों में 12,177 कुल मौतों में 5,064 (41.6%) नक्सली, 4,138 (34%) आम नागरिक और 2,723 (22.4%) सुरक्षाबल शामिल हैं। वर्ष 2000 से 2026 के बीच यह आंकड़े भारत में वामपंथी उग्रवाद के व्यापक प्रभाव को दर्शाते हैं।

आज जब हिड़मा का महिमा मंडन करते गाने बस्तर से लेकर पुणे तक गूंजते हैं, तो एक ही प्रश्न मन में आता है कि जिन हत्यारों ने अपने ही लोगों को ही मारा, उन्हें कौन लोग नायक बनाने पर आमादा हैं? आखिर इनका उद्देश्य क्या है?

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क्या वे नहीं जानते कि नक्सलियों ने बस्तर के हजारों बच्चों को अनाथ कर दिया? उनके स्कूल तोड़कर शिक्षा से वंचित कर दिया? अस्पताल उजाड़कर स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर कर दिया? हिड़मा को हीरो बनाकर प्रस्तुत करने वाले वास्तविकता से कोसों दूर हैं या फिर ये सब जानबूझकर देश में अस्थिरता उत्पन्न करना चाहते हैं? क्या ये आंख पर पट्टी बांधकर देश के साथ आंख मिचौनी खेल रहे हैं?

नक्सलियों ने कई दशकों तक योजनाबद्ध तरीके से देश में रक्तपात किया है। लोकतंत्र को नकारा है। बैलेट को बुलेट से रोका है। बन्दूक और बम के बल पर, छल-कपट के साथ गुरिल्ला युद्ध लड़कर छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, ओडिशा में आतंक फैलाया है। रायपुर, हैदराबाद और रांची जैसे स्टेट कैपिटल से लेकर देश की राजधानी नई दिल्ली तक ये बहुरूपिये मानवता को चुनौती देते रहे हैं। नेपाल के पशुपतिनाथ से आंध्र के तिरुपति तक कभी इनके रेड कॉरिडोर बनाने के लिए इनका अर्बन यानी शहरी नेटवर्क भी इनकी मदद करता रहा है। विदेशी दुश्मनों से इनकी साठगांठ के लिंक उजागर हुए हैं। बस्तर के जंगलों में विदेशी हथियार, वॉकी टॉकी और साहित्य मिला है। इन्हें मसीहा बनाने और बताने वालों पर कठोर कार्रवाई होना चाहिए।

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-प्रियंका कौशल
(लेखिका छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

आलेख में लेखक के अपने विचार हैं।