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सनातन धर्म पुनर्जागरण के प्रमुख स्तंभ आदि शंकराचार्य

आचार्य ललित मुनि

भारत की प्राचीन भूमि पर जब सनातन धर्म की ज्योति मंद पड़ने लगी थी तब एक ऐसे महापुरुष का अवतरण हुआ जिन्होंने न केवल उस ज्योति को पुनः प्रज्वलित किया बल्कि उसे सदियों तक जलते रहने वाला दीपक बना दिया। यह महापुरुष थे आदि शंकराचार्य। आज हम जिस सनातन परंपरा को गर्व से अपनाते हैं उसकी नींव को मजबूत करने में उनका योगदान इतना गहरा और व्यापक है कि इसे शब्दों में समेटना कठिन लगता है। उनकी जयंती पर हम केवल किसी एक व्यक्ति का स्मरण नहीं कर रहे, बल्कि पूरे भारतीय चिंतन की पुनरुत्थान की कहानी स्मरण है जिसमें एक ब्राह्मण बालक ने ज्ञान की तलवार से अंधकार को चीर दिया।

कल्पना कीजिए आठवीं शताब्दी का भारत। चारों ओर बौद्ध और जैन मतों का प्रभुत्व था। मठ मंदिरों में वेदों की जगह तर्क और शास्त्रार्थ की बहसें हो रही थीं। सामान्य जनता भ्रमित थी। एक ओर भौतिक सुखों की ओर झुकाव बढ़ रहा था तो दूसरी ओर आत्मा की खोज छूटती जा रही थी। ऐसे समय में केरल के छोटे से गांव कालडी में वैशाख माह के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को एक बालक ने जन्म लिया। नाम था शंकर। पिता शिवगुरु और माता आर्याम्बा। बचपन से ही शंकर में असाधारण बुद्धि और आध्यात्मिक जिज्ञासा दिखाई देती थी।

मात्र पांच वर्ष की आयु में उन्होंने वेदों का अध्ययन शुरू कर दिया था। जब वे आठ वर्ष के हुए तो संन्यास की दीक्षा लेने का संकल्प किया। माता ने अनुमति नहीं दी पर एक घटना ने सब बदल दिया। नदी में स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने उन्हें पकड़ लिया। माता से वचन लिया कि यदि संन्यास की अनुमति मिले तो मगरमच्छ छोड़ देगा। माता ने विवश होकर हामी भर दी और शंकर संन्यासी बन गए। यह प्रारंभिक घटना ही उनके जीवन के संकल्प को दर्शाती है कि वे सनातन धर्म की रक्षा के लिए कितने दृढ़ थे।

संन्यास लेने के बाद शंकर उत्तर की ओर चले। वहां उन्हें गुरु गोविंदपाद मिले। गोविंदपाद अद्वैत वेदांत के ज्ञाता थे। उन्होंने शंकर को गहन ज्ञान प्रदान किया। शंकर ने गुरु की आज्ञा से पूरे भारत की यात्रा शुरू की जिसे हम शंकर दिग्विजय कहते हैं। यह यात्रा केवल भौतिक नहीं थी बल्कि ज्ञान की विजय यात्रा थी। वे जहां भी गए वहां स्थानीय विद्वानों से शास्त्रार्थ किया। उनकी वाणी इतनी तर्कपूर्ण और शास्त्र सम्मत थी कि विरोधी भी मुग्ध हो जाते थे। एक प्रसिद्ध घटना मंडन मिश्र से हुए शास्त्रार्थ की है। मंडन मिश्र मीमांसा मत के बड़े विद्वान थे। उनकी पत्नी उभय भारती भी विदुषी थीं। शंकर ने उनसे बहस की और विजयी हुए। इस विजय ने न केवल अद्वैत वेदांत को मजबूती दी बल्कि सनातन धर्म के विभिन्न मतों को एक सूत्र में पिरोने का मार्ग प्रशस्त किया।

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शंकराचार्य का मुख्य योगदान अद्वैत वेदांत की स्थापना में है। उन्होंने उपनिषदों ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता पर भाष्य लिखे। इन भाष्यों में उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। जगत माया है। आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं। यह विचार इतना गहरा था कि इससे व्यक्ति भ्रम से मुक्त होकर आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है। परंतु शंकराचार्य केवल दार्शनिक नहीं थे। वे कर्मकांड के भी पुनरुद्धारक थे। उन्होंने कहा कि ज्ञान और कर्म दोनों का समन्वय आवश्यक है। इसीलिए उन्होंने स्मार्त परंपरा को बढ़ावा दिया जिसमें पांच देवताओं की पूजा का प्रावधान है। शिव विष्णु शक्ति सूर्य और गणेश। इससे सनातन धर्म की एकता बनी रही और विभिन्न संप्रदायों में फूट नहीं पड़ी।

उनकी यात्रा के दौरान उन्होंने चार प्रमुख मठों की स्थापना की। ये मठ सनातन धर्म के चार स्तंभ बने। दक्षिण में श्रृंगेरी मठ जिसमें शारदा पीठ स्थापित हुई। पश्चिम में द्वारका मठ। पूर्व में पुरी का गोवर्धन मठ और उत्तर में बद्रीनाथ का जोशी मठ। इन मठों का उद्देश्य केवल पूजा पाठ नहीं था बल्कि ज्ञान की निरंतरता बनाए रखना था। प्रत्येक मठ में एक आचार्य नियुक्त किया गया जो सनातन की शिक्षा देकर परंपरा को आगे बढ़ाता रहे।

उनके द्वारा लिखित ग्रंथों की संख्या भी कम नहीं। विवेकचूड़ामणि उपदेश सहस्री और अनेक स्तोत्र। इनमें से कई स्तोत्र आज भी मंदिरों में गाए जाते हैं। भज गोविंदम जैसे लोकप्रिय स्तोत्र ने सामान्य जन को भी अद्वैत का संदेश दिया। उन्होंने बौद्ध मत के खिलाफ भी तर्क दिए। उन्होंने कहा कि बौद्ध मत ने भी सनातन से कुछ अच्छी बातें लीं परंतु मूल सत्य अद्वैत में है। इस सहिष्णुता ने सनातन धर्म को पुनः लोकप्रिय बनाया।

समाज पर उनका प्रभाव भी गहरा पड़ा। उन्होंने जाति व्यवस्था को मान्यता दी परंतु उसे ज्ञान आधारित बनाया। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण वही जो ब्रह्म को जानता है न कि जन्म से। इस विचार ने सामाजिक सुधार की नींव रखी। महिलाओं के लिए भी उन्होंने सम्मान व्यक्त किया। उनकी माता की सेवा और उभय भारती जैसी विदुषियों से बहस इस बात का प्रमाण है।

शंकराचार्य का जीवन मात्र छत्तीस वर्ष का था परंतु इसमें उन्होंने जो कार्य किया वह हजारों वर्षों तक याद रहेगा। उन्होंने वेदों को पुनः प्रतिष्ठित किया। पुराणों और आगमों को भी स्थान दिया। मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। काशी में ज्ञानवापी की परंपरा को मजबूत किया। उनके शिष्य पद्मपाद हस्तामलक तोटक और सुरेश्वर ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

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आज जब हम सनातन धर्म की बात करते हैं तो शंकराचार्य का नाम सबसे पहले आता है। स्वामी विवेकानंद ने उन्हें आधुनिक भारत का राष्ट्रीय चिंतक कहा। महात्मा गांधी ने उनके अद्वैत को प्रेरणा माना। आज भी जब कोई व्यक्ति आत्मा की खोज करता है तो शंकर के भाष्य पढ़ता है। उनके द्वारा स्थापित मठों में दीक्षा लेने वाले संन्यासी पूरे विश्व में सनातन का प्रचार करते हैं।

अब विस्तार से देखें कि कैसे उन्होंने पुनर्जागरण किया। बौद्ध मत के पतन का मुख्य कारण शंकराचार्य का शास्त्रार्थ था। उन्होंने दिखाया कि शून्यवाद से आगे ब्रह्मवाद है। जैन मत की बहुलता को एकता में बदला। वैष्णव शैव शाक्त मतों को एक सूत्र में बांधा। इससे सनातन धर्म बहुरूपी होकर भी एक रह गया।

उनकी मानवीयता भी अनुपम थी। यात्रा के दौरान वे पैदल चलते थे। भिक्षा मांगते थे। किसी राजा के महल में नहीं रुकते थे। केवल ज्ञान की तलाश में रहते थे। एक बार बद्रीनाथ में उन्होंने शिवलिंग स्थापित किया। वहां आज भी शंकराचार्य मंदिर है। पुरी में जगन्नाथ मंदिर की परंपरा को उन्होंने मजबूत किया।

दार्शनिक स्तर पर उनका योगदान अद्वैत की व्याख्या में है। उन्होंने माया को व्यावहारिक सत्य माना। इससे सांसारिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन का समन्वय हुआ। व्यक्ति न तो भोग में डूबता है न त्याग में भागता है। संतुलित जीवन जीता है। यह विचार आज भी प्रासंगिक है जब दुनिया तनाव और भौतिकता से जूझ रही है।

शंकराचार्य ने भाषा को भी सरल बनाया। संस्कृत में लिखा परंतु अर्थ इतने स्पष्ट कि सामान्य विद्वान भी समझ सकें। उनके शिष्यों ने स्थानीय भाषाओं में भी प्रचार किया जिससे आम जनता तक पहुंच बनी।

आज सनातन धर्म का पुनर्जागरण यदि विश्व स्तर पर हो रहा है तो उसकी जड़ शंकराचार्य में है। अमेरिका यूरोप में योग ध्यान और वेदांत के केंद्र उनके विचारों से प्रेरित हैं। रामकृष्ण मिशन अरविंद आश्रम सब कहीं उनकी छाप है।

अंत में कह सकते हैं कि शंकराचार्य केवल एक आचार्य नहीं थे। वे सनातन धर्म के पुनरुद्धारक थे। उन्होंने जो बीज बोया वह आज विशाल वृक्ष बन चुका है। हम सब उस वृक्ष की छाया में बैठकर सुख पाते हैं। उनकी यात्रा हमें सिखाती है कि ज्ञान से बड़ा कोई हथियार नहीं। प्रेम से बड़ा कोई धर्म नहीं। और सत्य से बड़ा कोई लक्ष्य नहीं।

यह योगदान केवल अतीत का नहीं है। वर्तमान में भी जब हम सनातन को जीवित रखना चाहते हैं तो शंकराचार्य की ओर देखते हैं। उनके मठों में होने वाले उत्सव उनके ग्रंथों का अध्ययन और उनके विचारों का चिंतन हमें निरंतर प्रेरित करता है। सनातन धर्म की निरंतरता का श्रेय इन्हीं महापुरुष को जाता है जिन्होंने अंधकार के समय में दीप जलाया।

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अब और गहराई से समझें उनके दर्शन को। अद्वैत में ब्रह्म निर्गुण है परंतु सगुण रूप में पूजा की जा सकती है। इससे भक्ति और ज्ञान का सुंदर मेल हुआ। भगवद्गीता के भाष्य में उन्होंने कर्मयोग भक्तियोग और ज्ञानयोग को एक किया। इससे व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सनातन मूल्यों को अपनाने लगा।

उनकी यात्रा में अनेक चमत्कारिक घटनाएं भी वर्णित हैं। परंतु हम तथ्यों पर आधारित रहेंगे। इतिहासकार मानते हैं कि उन्होंने लगभग पच्चीस हजार श्लोक लिखे। इनमें से कई आज भी उपलब्ध हैं।

समाज सुधार के क्षेत्र में उन्होंने मंदिरों को सभी वर्गों के लिए खोलने का मार्ग दिखाया। हालांकि पूर्ण समानता बाद में आई परंतु नींव उन्होंने रखी।

शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। मठों में गुरुकुल पद्धति चलाई गई। छात्र दूर दूर से आते थे। वहां वेद वेदांत व्याकरण और दर्शन पढ़ाए जाते थे। इससे ज्ञान की परंपरा अटूट रही।

आज जब हम देखते हैं कि युवा पीढ़ी सनातन की ओर लौट रही है तो शंकराचार्य का नाम सबसे आगे आता है। उनके विचार सोशल मीडिया पर चर्चित हैं। पुस्तकें लिखी जा रही हैं। फिल्में बन रही हैं। यह सब उनके अमर योगदान का प्रमाण है।

मानवीय दृष्टि से देखें तो शंकराचार्य एक संवेदनशील व्यक्ति भी थे। माता की मृत्यु पर उन्होंने अंतिम संस्कार किया जबकि संन्यासी होने के कारण यह वर्जित था। परंतु उन्होंने माता का सम्मान किया। यह दर्शाता है कि वे नियमों से ऊपर मानवता को रखते थे।

उनके द्वारा रचित अनेक स्तोत्र जैसे सौंदर्य लहरी में शक्ति की आराधना है। इससे शाक्त मत को भी बल मिला। इसी प्रकार विष्णु सहस्रनाम की व्याख्या से वैष्णव मत मजबूत हुआ।

सनातन धर्म का पुनर्जागरण इसलिए संभव हुआ क्योंकि शंकराचार्य ने केवल आलोचना नहीं की बल्कि निर्माण भी किया। उन्होंने पुरानी परंपराओं को नष्ट नहीं किया बल्कि उन्हें नई ऊर्जा दी।

आज भारत विश्व गुरु बनने का सपना देख रहा है तो उसकी प्रेरणा शंकराचार्य से ही आती है। क्योंकि उन्होंने दिखाया कि ज्ञान ही शक्ति है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि शंकराचार्य का योगदान अमर है। वे सनातन धर्म के पुनर्जागरण के प्रमुख स्तंभ हैं। उनकी ज्योति आज भी हमें मार्ग दिखाती है। यदि हम सच्चे अर्थों में सनातनी हैं तो उनके विचारों को अपनाएं और आगे बढ़ाएं। यही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोकसंस्कृति के जानकार हैं।