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जब निहत्थों पर अंधाधुंध चलाई गई गोलियाँ : जालियांवाला बाग

आचार्य ललित मुनि

अमृतसर के जालियांवाला बाग में 3 अप्रैल 1919 को बैसाखी का त्योहार मनाया जा रहा था। वसंत की हल्की धूप में हजारों लोग, पुरुष, महिलाएं और बच्चे एकत्र हुए थे। कुछ लोग फसल कटाई के उत्सव की खुशी में आए थे, कुछ को यह जानकारी मिली थी कि डॉक्टर सत्यपाल और डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में एक शांतिपूर्ण सभा आयोजित की जा रही है। न कोई हथियार था और न ही हिंसा का कोई संकेत था। केवल एक खुले मैदान में एकत्र लोग अपनी बात शांतिपूर्वक रखना चाहते थे। लेकिन ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने इस भीड़ को विद्रोह के रूप में देखा। बिना किसी चेतावनी के और बिना लोगों को तितर-बितर होने का अवसर दिए उसने अपने लगभग पचास सिपाहियों को आदेश दिया कि गोली चलाई जाए।

लगभग दस मिनट तक गोलियां चलती रहीं। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार 1,650 गोलियां चलाई गईं। निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाई गईं। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं कोई भी सुरक्षित नहीं था। भीड़ घबराकर भागने लगी, परंतु बाग चारों ओर से ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था और बाहर निकलने का केवल एक संकरा मार्ग था। भगदड़ में अनेक लोग कुएं में कूद गए। कई लोग एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े। जब गोलियां रुकीं, तब मैदान में सैकड़ों शव बिखरे पड़े थे।

ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 379 लोगों की मृत्यु हुई और लगभग 1,200 लोग घायल हुए, जबकि भारतीय स्रोतों के अनुसार मृतकों की संख्या एक हजार से अधिक और घायलों की संख्या डेढ़ हजार से अधिक थी। कहा जाता है कि सबसे कम आयु का शहीद केवल छह सप्ताह का शिशु था। यह घटना केवल एक हिंसक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश शासन की कठोरता और औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक बन गई।

1919 का समय भारत के लिए राजनीतिक असंतोष का काल था। प्रथम विश्व युद्ध में भारत ने ब्रिटेन का भरपूर सहयोग किया था। लाखों भारतीय सैनिकों ने युद्ध में भाग लिया और देश ने आर्थिक रूप से भी सहायता प्रदान की। भारतीयों को आशा थी कि युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार भारत को अधिक राजनीतिक अधिकार देगी। परंतु इसके विपरीत मार्च 1919 में रौलट एक्ट लागू किया गया, जिसे भारतीयों ने काला कानून कहा।

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इस कानून के अंतर्गत बिना मुकदमा चलाए किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर लंबे समय तक जेल में रखा जा सकता था। न अपील का अधिकार था और न ही वकील की सुविधा थी। इससे जनता में गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ। पंजाब में स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील थी। उस समय पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओडायर कठोर नीतियों के समर्थक थे।

अमृतसर में डॉक्टर सत्यपाल और डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू लोकप्रिय नेता थे, जो हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक माने जाते थे। 10 अप्रैल 1919 को दोनों नेताओं को गिरफ्तार कर अमृतसर से बाहर भेज दिया गया। इस घटना से लोगों में रोष फैल गया। विरोध प्रदर्शन हुए और कुछ स्थानों पर हिंसक घटनाएं भी हुईं, जिसके बाद प्रशासन ने कठोर कदम उठाए। शहर में मार्शल लॉ जैसी स्थिति बना दी गई और सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

13 अप्रैल बैसाखी का पर्व था। पंजाब में यह दिन विशेष महत्व रखता है। फसल कटाई के बाद लोग उत्सव मनाने के लिए अमृतसर आते थे। स्वर्ण मंदिर में दर्शन करने और मेले में भाग लेने के लिए बड़ी संख्या में लोग शहर पहुंचे थे। जालियांवाला बाग एक खुला मैदान था, जो चारों ओर से मकानों से घिरा हुआ था और वहां जाने के लिए केवल एक संकरा प्रवेश मार्ग था। लगभग दस हजार से बीस हजार लोग वहां एकत्र थे। कुछ लोग सभा में शामिल होने आए थे, जबकि अनेक लोग बैसाखी मेले के कारण वहां पहुंचे थे। अधिकांश लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि सभा पर प्रतिबंध लगाया गया है।

दोपहर लगभग पांच बजे जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंचे। उनके साथ गोरखा और बलूची सैनिक थे। उन्होंने बिना किसी पूर्व सूचना के सैनिकों को पंक्ति में खड़ा किया और गोली चलाने का आदेश दे दिया। लोगों में भगदड़ मच गई। कई लोग दीवारों पर चढ़ने का प्रयास करने लगे, परंतु गोलियों का निशाना बन गए। कुएं में कूदने वाले लोगों की संख्या इतनी अधिक थी कि बाद में वहां से सौ से अधिक शव निकाले गए। अनेक लोग अपने परिजनों के साथ वहीं मारे गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार घायल लोग घंटों तक सहायता के लिए तड़पते रहे, परंतु किसी प्रकार की चिकित्सा व्यवस्था नहीं की गई।

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दोपहर करीब पांच बजे डायर पहुंचे। उनके साथ 50 सिपाही—गोरखा और बलूची राइफलमैन। दो आर्मर्ड कार भी थीं, लेकिन संकरे रास्ते से नहीं गुजर सकीं। डायर ने सिपाहियों को मैदान में लाइन में खड़ा किया। बिना कोई चेतावनी, बिना कोई घोषणा—आदेश दिया: “फायर!” गोलियां चलने लगीं। पहले तो लोग समझ नहीं पाए। फिर चीखें उठीं। “भगो! भागो!” लेकिन भागने की जगह कहां? दरवाजा सिपाहियों ने घेर लिया था। लोग दीवार चढ़ने की कोशिश करते, गोली लग जाती। कुछ कुएं में कूद पड़े—उस कुएं में बाद में 120 लाशें निकाली गईं। बच्चे मां-बाप की गोद में छिपने की कोशिश करते। एक गवाह ने बताया, “12 साल का लड़का तीन साल के भाई को गोद में लिए मरा पड़ा था।”

रतन देवी नाम की एक महिला अपने पति की लाश के पास पूरी रात बैठी रही। चारों तरफ लाशों के ढेर। कुत्ते भौंक रहे थे। गधे रें रहे थे। उसने बाद में कांग्रेस जांच समिति को बताया: “मैंने सैकड़ों लाशों को उलट-पुलट कर अपना पति ढूंढा। रात भर रोती रही। एक भी जीवित इंसान नहीं दिखा।” डॉक्टर मणि राम का 13 साल का बेटा मदन मोहन खेलने गया था। वह बाग के पास ही रहते थे। गोलीबारी शुरू हुई तो बच्चा घर नहीं लौटा। पिता ने लाश ढूंढी—सिर में गोली लगी थी। नानक सिंह, जो बाद में “खूनी वैसाखी” कविता लिखेंगे, लाशों के ढेर के नीचे दबे थे। जब होश आया तो दोस्तों की लाशें बगल में पड़ी थीं। उनके कान का एक हिस्सा हमेशा के लिए खराब हो गया।

गवाहों की गवाही (कांग्रेस पंजाब जांच रिपोर्ट, 1919-20) में एक स्वर है—भय, अविश्वास और गुस्सा। एक दुकानदार लाला बुद्ध मल ने बताया कि वह अपने बेटे के साथ था। दोनों जमीन पर लेट गए। गोलियां सिर के ऊपर से गुजर रही थीं। एक और गवाह ने देखा—सैनिक घुटनों के बल बैठकर जमीन पर पड़े घायलों पर भी निशाना लगा रहे थे। दस मिनट बाद डायर ने “सीज फायर” का आदेश दिया। सिपाहियों ने करीब एक तिहाई गोला-बारूद खर्च कर दिया था। वे चुपचाप वापस चले गए। घायलों को छोड़कर। मरने वालों को छोड़कर। कोई एम्बुलेंस नहीं। कोई मदद नहीं।

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बाद में हंटर कमीशन के सामने डायर ने कहा कि उसका उद्देश्य भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि भारतीयों को सबक सिखाना था। उसने स्वीकार किया कि यदि अधिक गोलियां होतीं, तो वह और अधिक गोली चलाता। इस बयान ने ब्रिटिश शासन की मानसिकता को उजागर कर दिया। हंटर कमीशन ने गोलीबारी को अनुचित बताया, परंतु डायर को कोई कठोर दंड नहीं दिया गया। उसे केवल सेवा से हटाकर इंग्लैंड भेज दिया गया। कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने उसका समर्थन भी किया, जिससे भारतीयों में आक्रोश और बढ़ गया।

जालियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इससे पहले कांग्रेस संवैधानिक तरीकों से सुधार की मांग कर रही थी, परंतु इस घटना ने लोगों का विश्वास हिला दिया। महात्मा गांधी ने इसे नैतिक आघात बताया और 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। लाखों भारतीयों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध शांतिपूर्ण विरोध शुरू किया। रवींद्रनाथ टैगोर ने इस घटना के विरोध में अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी। यह कदम केवल व्यक्तिगत विरोध नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन की नैतिकता पर प्रश्नचिह्न था। उधम सिंह, जिन्होंने बाद में 1940 में माइकल ओडायर की हत्या की, इस घटना से गहराई से प्रभावित थे। जालियांवाला बाग की स्मृति ने अनेक युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया।

जालियांवाला बाग हत्याकांड ने भारतीयों और ब्रिटिश शासन के संबंधों को हमेशा के लिए बदल दिया। इस घटना के बाद स्वतंत्रता आंदोलन अधिक व्यापक और संगठित हो गया। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे महत्वपूर्ण चरणों की प्रेरणा कहीं न कहीं इस घटना से जुड़ी थी। आज जालियांवाला बाग एक राष्ट्रीय स्मारक है। वहां शहीदों की स्मृति में स्मारक बनाया गया है और उस कुएं को संरक्षित रखा गया है, जिसमें अनेक लोगों ने अपने प्राण गंवाए थे। हर वर्ष 13 अप्रैल को लोग वहां जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।