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ट्रांसजेंडर कानून में संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, कई प्रावधानों पर उठे सवाल

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से जुड़े नए संशोधित कानून को चुनौती दी गई है। याचिका में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण से संबंधित संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न उठाए गए हैं। इस कानून के माध्यम से ट्रांसजेंडर समुदाय की पहचान, अधिकारों और संरक्षण से जुड़े नियमों में व्यापक बदलाव किए गए हैं।

यह याचिका राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद की अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और सदस्य जैनब पटेल द्वारा दायर की गई है। इस कानून को 31 मार्च को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है।

क्या है विवाद का कारण

यह संशोधन वर्ष 2019 के ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण अधिनियम में बदलाव करता है। नए प्रावधानों के तहत “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा में परिवर्तन किया गया है और कुछ गंभीर अपराधों—जैसे जबरन पहचान थोपना और शारीरिक नुकसान—के लिए सख्त दंड का प्रावधान जोड़ा गया है।

हालांकि, इस कानून को लेकर विपक्षी दलों और एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि विधेयक लाने से पहले संबंधित पक्षों से पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया।

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इस्तीफे और विरोध

राज्यसभा में विधेयक पारित होने के दिन ही राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद के दो सदस्यों—कल्कि सुब्रमण्यम और ऋतुपर्णा निओग—ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसे इस कानून के खिलाफ असंतोष का संकेत माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट समिति ने भी जताई चिंता

ट्रांसजेंडर अधिकारों की समीक्षा के लिए गठित सर्वोच्च न्यायालय की एक समिति ने भी इस कानून पर आपत्ति जताई थी। सेवानिवृत्त दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश आशा मेनन की अध्यक्षता वाली इस समिति ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को पत्र लिखकर कानून के कुछ प्रावधानों पर पुनर्विचार करने और विधेयक वापस लेने की सिफारिश की थी।

मुख्य आपत्तियां क्या हैं

इस कानून की सबसे ज्यादा आलोचना आत्म-पहचान के अधिकार को सीमित करने और चिकित्सीय प्रमाणन को अनिवार्य बनाने को लेकर हो रही है। आलोचकों का कहना है कि यह प्रावधान वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय के राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण फैसले में तय सिद्धांतों के खिलाफ है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी पहचान स्वयं तय करने का अधिकार दिया गया था।

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अन्य न्यायालयों की प्रतिक्रिया

राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी इस संशोधन को लेकर चिंता जताई थी और कहा था कि इससे व्यक्ति की पहचान जैसे मूल अधिकार को राज्य के नियंत्रण में लाया जा सकता है। हालांकि बाद में अदालत ने अपनी इस टिप्पणी को हटा लिया।

अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां यह तय किया जाएगा कि नया संशोधन संविधान के अनुरूप है या नहीं।