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लोककलाऋषि दाऊ कोदूराम वर्मा की 102वीं जयंती पर भिलाई में विशेष समारोह, छत्तीसगढ़ी लोकमंच के पुरोधाओं को किया गया नमन

भिलाई नगर, 2 अप्रैल 2026। साहित्यिक संस्था अगासदिया द्वारा आमदीनगर (भिलाई) में 1 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक कलाकार स्वर्गीय दाऊ कोदूराम वर्मा की 102वीं जयंती पर उनकी स्मृति में एक विशेष समारोह का आयोजन किया गया। छत्तीसगढ़ी लोककला, विशेष रूप से लोकनाट्य ‘नाचा’ के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा वर्ष 2007 में उन्हें दाऊ मंदराजी सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है।

अगासदिया के संस्थापक एवं अध्यक्ष डॉ. परदेशीराम वर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ी लोककलाओं के लिए आजीवन समर्पित रहे स्वर्गीय कोदूराम वर्मा शब्दभेदी बाण और कर्मा नृत्य के भी सिद्धहस्त कलाकार थे। वे तत्कालीन मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद के सदस्य भी रहे। स्वर्गीय वर्मा दुर्ग जिले में संचालित साक्षरता अभियान के प्रमुख कलाकारों में शामिल थे। लगभग तीन दशक पूर्व नई दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय समारोह में उन्होंने अपनी नृत्य मंडली के साथ तत्कालीन राष्ट्रपति के समक्ष छत्तीसगढ़ी कर्मा नृत्य की प्रभावशाली प्रस्तुति दी थी, जिसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया था।

102वीं जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण में साहित्य, कला और सांस्कृतिक लोकमंचों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अगासदिया जैसी संस्थाएं ऐसे पुरोधाओं की स्मृति को जीवंत बनाए रखने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाना हमारा सपना और संकल्प है, क्योंकि छत्तीसगढ़ी भाषा का सम्मान ही छत्तीसगढ़ का सम्मान है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के रचनाकार प्रतिभासम्पन्न और यशस्वी हैं तथा साहित्य की प्रत्येक विधा में उल्लेखनीय लेखन हो रहा है। मंचीय पुरोधाओं ने छत्तीसगढ़ी लोकमंच के विस्तृत आकाश को आलोकित कर विश्व का ध्यान आकर्षित किया है और समाज को स्वाभिमान के साथ जीना सिखाया है।

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कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए रायपुर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुधीर शर्मा ने कहा कि ऐसे बहुआयामी आयोजनों से जुड़कर हम सभी सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होते हैं। कलाकारों और साहित्यकारों के बीच अगासदिया के संस्थापक डॉ. परदेशीराम वर्मा समान रूप से लोकप्रिय हैं तथा वे लेखन के माध्यम से संस्कृति क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।

विशेष अतिथि डॉ. सोनाली चक्रवर्ती ने अपने वक्तव्य में कहा कि पहचान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए हम सभी को मिलकर कार्य करना होगा। कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. रजनी नेलसन ने बताया कि 1 अप्रैल को वरिष्ठ साहित्यकार संतोष झांझी, रंगोली कलाकार एवं शिक्षाविद् स्मिता वर्मा तथा रामचरित मानस गायिका ललिता साहू का जन्मदिन भी है। अतिथियों ने तीनों को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। इस अवसर पर स्मिता वर्मा की चयनित रंगोली कलाकृतियों का प्रदर्शन भी किया गया। अतिथियों ने विभिन्न पर्वों और महापुरुषों पर आधारित उनकी रंगोली कला की सराहना की।

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पत्रकार राजेन्द्र सोनबोईर, मोहम्मद जाकिर हुसैन और पुनीत कौशिक विशेष अतिथि के रूप में कार्यक्रम में उपस्थित रहे। कलाकार महेश वर्मा ने कोदूराम वर्मा के मंचीय योगदान पर प्रकाश डालते हुए उन्हें कलाऋषि के रूप में स्मरण किया। अगासदिया के अध्यक्ष डॉ. परदेशीराम वर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ के मंचीय पुरोधा एवं सूत्रधार दुलारसिंह साव मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर सहित कोदूराम वर्मा जैसे महान व्यक्तित्वों ने लोककला और मंच को समृद्ध बनाने के लिए अपनी पैतृक संपत्ति तक समर्पित कर दी। ऐसे परोपकारी पुरोधाओं के कारण ही छत्तीसगढ़ी लोकमंच का उज्ज्वल आकाश आज सभी को आकर्षित करता है।

आयोजन में महासमुंद के साहित्यकार राजेश्वर बन्धु खरे, रायपुर के साहित्यकार डॉ. सुखदेवे, भिलाई की पद्मश्री कलाकार उषा बारले तथा समाजसेवी रामसेवक वर्मा ने अतिथियों को सम्मानित किया। कोदूराम वर्मा के पुत्र प्रेमलाल वर्मा सपरिवार कार्यक्रम में उपस्थित रहे। उषा बारले ने मंगलगान प्रस्तुत किया, वहीं संतोष झांझी ने अपना प्रसिद्ध गीत “नमन है जिंदगी” प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

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वरिष्ठ नागरिक संघ आमदीनगर के अध्यक्ष अरुण अग्रवाल ने आभार प्रदर्शन किया। समारोह में अतिथियों एवं विशिष्ट प्रतिभागियों को स्मृति चिन्ह एवं शाल भेंट कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में विनायक अग्रवाल, संतोष अग्रवाल, अब्दुल कलाम, नीतिश कुमार, खड़ानंद वर्मा, प्रहलाद वर्मा, उषा वर्मा, मधु वर्मा तथा प्रेमलाल बबला सहित साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

यह आयोजन छत्तीसगढ़ी लोककला परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया गया।