futuredलोक-संस्कृति

यदि वन न रहें तो…वन से आत्मसंवाद

आचार्य ललित मुनि

आज सुबह जल्दी आँख खुल गई, जहाँ मैं ठहरा हुआ था वह वनांचल का वन आवास था। छोटी सी डोंगरी पर बना हुआ, पुराना, अंग्रेजों के समय का। सामने सूर्योदय की लालिमा छाई हुई थी। सामने डोंगरी से उतर कर साल के वृक्षों से किरणे धरती पर उतरकर अपनी उपस्थिति का आभास करा रही थी। विभिन्न फ़ूलों एवं वनौषधियों की महक वातावरण को गमका रही थी। मैं उसे गहरी सांस लेकर फ़ेफ़ड़ों में भर रहा था, जैसे सारी महक को आज ही सांसों में भर लूं, कल हो न हो।

वातावरण अद्भुत था। मेरे कदम धीरे धीरे पगडंडी की ओर अग्रसर हो रहे थे। वसंत के मौसम में पगड़ंडी पर सूखे हुए पत्ते बिखरे हुए थे। पैरों के नीचे सूखे पत्तों की हल्की आवाज और दूर से आती पक्षियों का चहचहाहट वातावरण में एक अद्भुत ऊर्जा भर रही थी। हवा में एक ऐसी ठंडक थी, जो केवल वन ही दे सकता है। चलते-चलते अचानक मन में प्रश्न उठा, यदि वन न रहें तो…?

मैं ठिठककर खड़ा हो गया। सामने फैला घना जंगल जैसे मुझसे ही उत्तर मांग रहा था। मैंने चारों ओर देखा। पेड़ों की छांव, ठंडी हवा, मिट्टी की सोंधी गंध, पक्षियों का संगीत, ये सब केवल दृश्य नहीं, जीवन का आधार हैं। उस क्षण लगा कि जंगल केवल वृक्षों का समूह नहीं, बल्कि मनुष्य के अस्तित्व का सहचर है। मैने जैसे स्वयं से ही कहा, यदि ये सब न हों, तो जीवन कितना रिक्त, कितना सूना हो जाएगा।

मैं आगे बढ़ा तो रास्ता थोड़ा ढलान की ओर उतरता गया। शबरी नदी की जलधारा अपने वेग बह रही थी। मनुष्य में सहज प्रवृत्ति है कि जल उसे हमेशा अपनी ओर खींचता है। मेरा मन नदी के किनारे बैठकर उसे अविरल प्रवाहित जल को देखने का हुआ और उसके किनारे बैठ गया। मैने नदी का जल अंजुरी में भर लिया और अपने चेहरे को धोया। जल निर्मल, ठंडा और ताजा था। उसने मेरे भीतर स्फ़ूर्ति भर दी, उसी क्षण विचार आया कि शहरों में हम पानी खरीदते हैं, पर वन हमें बिना किसी मूल्य के जीवन देता है। यह नदियों और झरनों का जन्मस्थान है। यदि वन न रहें, तो नदियां सूख जाएंगी, खेत बंजर हो जाएंगे और जीवन की धारा थम जाएगी।

See also  मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का सरगुजा-सूरजपुर दौरा: सरगुजा ओलंपिक, किसान मेला और कुदरगढ़ महोत्सव का होगा शुभारंभ

वहाँ बैठे बैठे मन में चलचित्र सा चलने लगने लगा। मुझे अपने बचपन की याद आई। गांव के बुजुर्ग कहते थे कि वन धरती का प्राण है। तब यह बात केवल एक कहावत लगती थी, पर आज महसूस हो रहा था कि सचमुच वन सांस लेते हैं और हमें भी सांस देते हैं। पेड़ कार्बन को सोखकर हमें प्राणवायु देते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं और धरती को ठंडक प्रदान करते हैं। यदि वन न रहें तो हवा का संतुलन बिगड़ जाएगा, वर्षा का क्रम बदल जाएगा, मिट्टी का क्षरण बढ़ेगा और जीवन की लय टूट जाएगी।

मन में अनेक विचार उमड़ते घुमड़ते रहे। आज मनुष्य की बढ़ती आबादी ने प्रकृति पर भारी बोझ डाल दिया है। शहर फैल रहे हैं, सड़कें जंगलों को चीरती चली जा रही हैं, खनन और औद्योगिक गतिविधियां वनों को निगल रही हैं। विकास की दौड़ में हम भूलते जा रहे हैं कि जिस धरती पर हम खड़े हैं, उसकी जड़ें इन्हीं वनों में हैं। जब जनसंख्या बढ़ती है, तो भूमि, जल, ऊर्जा और संसाधनों की मांग भी बढ़ती है, और इसका सीधा दबाव जंगलों पर पड़ता है।

सामने कुछ कटे हुए ठूंठ दिख रहे थे। वे चुपचाप खड़े थे, जैसे कोई पीड़ा कह नहीं पा रहे हों। लगा जैसे वे पूछ रहे हों—हमने क्या बिगाड़ा था? हमने तो केवल छांव दी, फल दिए, जीवन दिया। उस क्षण मन भारी हो गया। सोचने लगा कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाली पीढ़ियां जंगलों को केवल किताबों और चित्रों में ही देखेंगी। वे शायद पक्षियों का वास्तविक संगीत न सुन सकें, न ही मिट्टी की सोंधी गंध को महसूस कर सकें।

सुबह का समय था तो वन के प्राणी अपनी अपनी राह से जल स्रोतों तक पानी पीने आते हैं, नदी के पार हिरण भी पानी पीने आए थे, अल्फ़ा चौकन्ना होकर पानी पीते हुए साथियों की सुरक्षा कर रहा था। थोड़ी देर में सभी पानी पीकर वन में ओझल हो गया। उसनी तेज चाल और चंचल आंखों ने मुझे आगाह किया कि यह वन केवल मनुष्यों का नहीं, असंख्य जीवों का घर है। यहां हर प्राणी की अपनी भूमिका है। यदि वन न रहें, तो यह पूरा जैविक संतुलन बिगड़ जाएगा। प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी और प्रकृति का चक्र टूट जाएगा।

See also  नक्सलवाद पर नियंत्रण से विकास को मिली नई गति: राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय दल से बोले मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

सुबह की ठंडी बयार ने मन को शांत कर दिया और चेतना में चिंतन चल रहा था। वन केवल प्रकृति का क्षेत्र नहीं, बल्कि मनुष्य के आत्मचिंतन का स्थान भी है। यहां आकर मनुष्य अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों को समझ सकता है। शहरों के शोर और भागदौड़ में हम स्वयं से दूर हो जाते हैं, पर वन में कदम रखते ही मन शांत हो जाता है। यहां हर पेड़, हर पत्ता, हर ध्वनि जैसे हमें जीवन का पाठ पढ़ाती है।

मनुष्य के जीवन को मनीषियों ने चार आश्रमों, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास विभाजित किया। इन चारों आश्रमों का निर्वहन वन से ही होता है, बिना वनों के इन आश्रमों की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इनमें से एक आश्रम का नाम ही वानप्रस्थ है, वन की ओर गमन। मनुष्य का अस्तित्व बिना वनों के नहीं है। वैसे भी मनुष्य जन्म से ही वनवासी है और उसे विश्राम भी वन में ही मिलता है। दोनों को एक दूसरे का संरक्षण करना है, यह सह अस्तित्व ही इस पृथ्वी में जीवन का आधार है।

अब थोड़ी उषा की किरणे धूप में परिवर्तित हो चुकी थी, जल में पड़ती हुई किरणें परावर्तित होकर आंखों में चमकने लगी थी। लगा कि अब यहां से चला जाए, एक बार पुन अंजुरी में जल लेकर पान किया और मुंह धोया और चल पड़ा, धूप पूरी तरह धरती पर उतर आई थी। वहां छोटे-छोटे पौधे उग रहे थे। उनकी कोमल पत्तियों में जीवन का विश्वास झलक रहा था। लगा जैसे वे कह रहे हों कि यदि मनुष्य चाहे तो बहुत कुछ बचाया जा सकता है। वन संरक्षण केवल पेड़ बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि जीवन के संतुलन को बनाए रखने का संकल्प है।

See also  पौराणिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है नवरात्र

मैंने सोचा, यदि हम सचमुच वनों को बचाना चाहते हैं, तो केवल वृक्षारोपण ही नहीं, बल्कि अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना होगा। संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, जल संरक्षण, भूमि का संतुलित उपयोग और जनसंख्या नियंत्रण जैसे विषय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती है।

वनों के संरक्षण से भविष्य में अनेक लाभ संभव हैं। वन जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करते हैं, कार्बन को अवशोषित कर वातावरण को संतुलित रखते हैं। वे नदियों और जलस्रोतों को जीवित रखते हैं, जिससे कृषि और मानव जीवन सुरक्षित रहता है। जैवविविधता का संरक्षण भी इन्हीं वनों से संभव है, जहां असंख्य जीव-जंतु और वनस्पतियां जीवन का चक्र बनाए रखते हैं। साथ ही, वनों से जुड़े समुदायों की संस्कृति, आजीविका और परंपराएं भी इन्हीं पर निर्भर हैं।

मुझे याद आया कि हमारे देश की परंपराओं में भी वनों का विशेष महत्व रहा है। ऋषि-मुनि वनों में ही साधना करते थे। लोकजीवन में वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति का सम्मान करना ही सच्चा धर्म है। इसी उधेड़ बुन में चलते-चलते समय का ध्यान ही नहीं रहा। जब मैं अपने वन आवास की लौट रहा था, तो पीछे मुड़कर देखा। हरे-भरे पेड़, सुनहरी धूप और शांत वातावरण जैसे मुझे रोकना चाह रहे थे। कह रहे थे कि वानप्रस्थी फ़िर कब आओगे, यदि वन न रहे तो जीवन अधूरा रह जाएगा।

जंगलों को बचाना केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य का प्रश्न है। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही विकास संभव है। यदि हम आज सजग हो जाएं, तो आने वाली पीढ़ियां भी इन हरियाली भरे रास्तों पर चल सकेंगी, पक्षियों का संगीत सुन सकेंगी और वही प्रश्न पूछते हुए उत्तर भी पा सकेंगी—यदि वन न रहें तो…?