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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश समेत न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ 2016 की आपराधिक शिकायत रद्द की

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 2016 में दायर एक आपराधिक शिकायत को रद्द करते हुए कहा है कि इसमें लगाए गए आरोप ठोस आधार और पर्याप्त तथ्यों से रहित हैं। यह शिकायत एक पूर्व न्यायिक अधिकारी की पत्नी द्वारा तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सहित कई न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ दर्ज कराई गई थी।

मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता प्रतिभा ग्वाल ने आरोप लगाया था कि उनके पति और उस समय के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) प्रभाकर ग्वाल के साथ अक्टूबर 2015 में एक टोल प्लाजा पर कुछ लोगों ने दुर्व्यवहार किया था। इस घटना को लेकर मामला दर्ज हुआ, लेकिन उनका दावा था कि पुलिस ने एक कथित साजिश के तहत आरोपपत्र दाखिल नहीं किया। शिकायत में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस साजिश में पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ राज्य की न्यायिक सेवा के कुछ सदस्य और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश भी शामिल थे।

इस शिकायत को रायपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने प्रारंभिक साक्ष्य दर्ज करने के लिए स्वीकार कर लिया था। इसके बाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए याचिका दायर की और शिकायत को रद्द करने की मांग की।

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28 फरवरी को दिए गए फैसले में मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने कहा कि शिकायत में किसी भी संज्ञेय अपराध के आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से नहीं बताए गए हैं। अदालत ने कहा कि आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं तथा इनमें किसी ठोस सामग्री का अभाव है।

पीठ ने टिप्पणी की कि यह मामला प्रशासनिक या व्यक्तिगत शिकायतों को आपराधिक मुकदमे में बदलने की कोशिश जैसा प्रतीत होता है। अदालत के अनुसार, यदि इस तरह की कार्यवाही को जारी रहने दिया जाए तो यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और संबंधित व्यक्तियों को बिना पर्याप्त आधार के आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ेगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत में जिन न्यायिक अधिकारियों और पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आरोप लगाए गए हैं, उनके विरुद्ध कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है। ऐसे में उनके खिलाफ कार्यवाही जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा।

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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायत मुख्य रूप से उस समय के न्यायिक अधिकारी प्रभाकर ग्वाल से जुड़े प्रशासनिक और सेवा संबंधी मामलों से जुड़ी है, जिन्हें आपराधिक साजिश का रूप नहीं दिया जा सकता।

फैसले में अदालत ने कहा कि संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों या वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों को समन करना गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है और इससे न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए बिना पर्याप्त तथ्यों के ऐसे आरोपों को आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

इन्हीं कारणों से अदालत ने रायपुर की अदालत में लंबित शिकायत को संबंधित न्यायिक अधिकारियों के संबंध में रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि यदि शिकायत में अन्य किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप हैं तो उनके संबंध में कार्यवाही कानून के अनुसार जारी रह सकती है।

प्रभाकर ग्वाल ने वर्ष 2005 में सिविल जज (क्लास-II) के रूप में न्यायिक सेवा में प्रवेश किया था। बाद में उन्हें पदोन्नत कर सिविल जज (क्लास-I) बनाया गया और 2015 में रायपुर में अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में तैनात किया गया।

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सेवा के दौरान उनके खिलाफ कई प्रशासनिक कार्रवाइयाँ हुईं और अंततः वर्ष 2016 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के इस निर्णय को बरकरार रखा।