रंगों में रचा भारतीय जीवन, भक्ति और वसंतोत्सव : रंग पंचमी

हिंदू धर्म की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा में रंगों का पर्व केवल आनंद और उत्साह का अवसर नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और मानवीय अर्थों से जुड़ा हुआ उत्सव है। होली के व्यापक पर्व का अंतिम चरण मानी जाने वाली रंग पंचमी इसी परंपरा का जीवंत विस्तार है। फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन और उसके अगले दिन धुलेंडी के बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाने वाली रंग पंचमी, होली के रंगोत्सव का समापन मानी जाती है। प्राचीन काल में होली कई दिनों तक चलती थी और पंचमी का दिन अंतिम उत्सव के रूप में जाना जाता था, जिसके बाद रंग खेलने की परंपरा समाप्त हो जाती थी।
“रंग” शब्द जहां उल्लास, प्रेम और जीवन की विविधता का प्रतीक है, वहीं “पंचमी” तिथि का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व इसे और पवित्र बनाता है। इस दिन के लिए देव पंचमी, श्री पंचमी और कृष्ण पंचमी जैसे नाम भी प्रचलित हैं। लोकमान्यता है कि इस दिन देवता भी पृथ्वी पर अवतरित होकर मनुष्यों के साथ रंग खेलते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।
शास्त्रों में पंचमी तिथि को अत्यंत शुभ माना गया है। स्कंद पुराण और अग्नि पुराण में पंचमी तिथियों को देवताओं की प्रसन्नता से जोड़ा गया है। रंग पंचमी भी उसी परंपरा का विस्तार है। विष्णु पुराण में होलिका दहन की कथा आती है, जिसमें भक्त प्रह्लाद की रक्षा और होलिका के दहन का प्रसंग वर्णित है। लोकप्रचलित श्लोक में कहा गया है:
“होलिकायां जले दग्धे सर्वपापं विनश्यति।
नरः सौख्यं समाप्नोति सततं धर्मसंयुतः॥”
अर्थात यह है कि जब होलिका दहन में अग्नि प्रज्वलित होती है, तब मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति को सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। यह श्लोक प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि होलिका दहन के बाद रंग पंचमी पर रंग खेलना नकारात्मक ऊर्जा के नाश और सकारात्मकता के विस्तार का संकेत है। रंगों के माध्यम से रजोगुण और तमोगुण का शमन तथा सत्त्वगुण की स्थापना का भाव प्रकट होता है।
इतिहास की दृष्टि से देखें तो वसंत ऋतु का आगमन प्राचीन भारत में उत्सवों से जुड़ा रहा है। वैदिक काल में फाल्गुन और चैत्र मास में वसंतोत्सव का उल्लेख तांड्य ब्राह्मण में मिलता है। समय के साथ यह परंपरा पुराण काल में होलिका दहन से जुड़ी और मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने इसे अधिक समृद्ध बनाया। सूरदास, जयदेव और कालिदास जैसे महान कवियों ने अपने काव्य में वसंत, राधा-कृष्ण लीला और रंगोत्सव का अत्यंत सुंदर वर्णन किया। स्वतंत्रता के बाद भी यह परंपरा सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जीवित रही और आज भी समाज में समान उत्साह से मनाई जाती है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रंग पंचमी का उत्सव अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। मध्य और पश्चिम भारत में इसका विशेष महत्व है। महाराष्ट्र में इसे शिमगा के रूप में सूखे गुलाल से मनाया जाता है। मध्य प्रदेश के इंदौर और उज्जैन में गेर के भव्य जुलूस निकलते हैं, जहां हजारों लोग गुलाल उड़ाते हुए उत्सव मनाते हैं। ब्रज क्षेत्र, विशेषकर मथुरा और वृंदावन में पांच दिवसीय होली का समापन रंग पंचमी पर होता है। राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ में भी यह पर्व उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद इसका मूल भाव समान है, रंगों के माध्यम से बंधनों से मुक्ति और प्रेम का प्रसार।
रंग पंचमी के पीछे अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं। उनमें प्रमुख श्रीकृष्ण और राधा की रंग लीला है। भागवत पुराण के दशम स्कंध में कृष्ण की रासलीला और वसंतोत्सव का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि चैत्र कृष्ण पंचमी को राधा और कृष्ण ने ब्रज में रंग खेला और देवताओं ने पुष्पवर्षा की। यह कथा भक्ति और प्रेम के समन्वय का प्रतीक है।
दूसरी कथा कामदेव के पुनर्जन्म से जुड़ी है। भगवान शिव की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव ने पुष्पबाण चलाए, जिसके परिणामस्वरूप शिव ने उन्हें भस्म कर दिया। रति की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने वरदान दिया कि वे अशरीरी रूप में रहेंगे और बाद में शरीर प्राप्त करेंगे। महाकवि कालिदास ने कुमारसंभवम् में इस प्रसंग का अत्यंत सजीव चित्रण किया है। एक प्रसिद्ध श्लोक है:
“सद्यः प्रवालोद्गमचारुपत्रे नीते समाप्तिम् नवचूतबाणे।
निवेशयामास मधुद्विरेफान्नामाक्षराणीव मनोभवस्य॥”
अर्थात आम्र-बौर और नवपल्लव कामदेव के बाण बन गए हैं और उन पर बैठे भ्रमर मानो उनके नाम के अक्षर अंकित कर रहे हैं। यह वसंत की सजीवता और प्रेम की ऊर्जा का प्रतीक है।
कुमारसंभवम् का एक अन्य श्लोक है:
“प्रतिर्ग्रहीतुं प्रणयीर्प्रियत्वात् त्रिलोचनस्तामुप चक्रमे च।
सम्मोहनं नाम च पुष्पधन्वा धनुष्यमोघं समधत्त बाणं॥”
अर्थात जब शिव पार्वती के समीप आए, तब कामदेव ने सम्मोहन बाण चलाया। इन श्लोकों में वसंत और प्रेम की शक्ति का सुंदर चित्रण है, जो रंग पंचमी के आध्यात्मिक आधार को स्पष्ट करता है।
साहित्यिक परंपरा में जयदेव के गीत गोविंद का भी विशेष महत्व है। उनके श्लोकों में वसंत और राधा-कृष्ण के प्रेम का सूक्ष्म चित्रण मिलता है:
“श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए।
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे॥”
अर्थात जो लक्ष्मीजी के आलिंगन में हैं, कानों में कुण्डल धारण किए हुए हैं और वनमाल से अलंकृत हैं, ऐसे प्रभु की जय हो। यह श्लोक भक्ति और सौंदर्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
ब्रजभाषा के कवि सूरदास ने होली और रंगोत्सव का अत्यंत जीवंत चित्र खींचा है:
“खेलत हरि निकसे ब्रज खोरी।
गई चली नँद-भवन अचानक, निकसीं आय किसोरी॥
काहु के हाथ कनक-पिचकारी, काहु के अबीर-झोरी।
लाल-गुलाल भई सब कुंजन, बरसत रंग झकोरी॥”
इस पद में रंग पंचमी की मस्ती, भक्ति और सामाजिक आनंद का सुंदर चित्रण मिलता है। यह केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक अनुभव का भी द्योतक है।

रंग पंचमी का महत्व अनेक स्तरों पर देखा जा सकता है। धार्मिक दृष्टि से यह देवताओं की प्रसन्नता और मनोकामना पूर्ति का दिन माना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह मन की शुद्धि और सत्त्वगुण की स्थापना का प्रतीक है। सामाजिक रूप से यह भेदभाव मिटाकर समानता और एकता का संदेश देता है। सांस्कृतिक रूप से यह वसंत ऋतु का स्वागत और पर्यावरण संतुलन का संदेश देता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से रंग और उत्सव मानसिक प्रसन्नता बढ़ाते हैं।
रंग पंचमी का उत्सव सामान्यतः सुबह पूजा और गुलाल अर्पण से शुरू होता है। इसके बाद लोग सूखे गुलाल और अबीर से रंग खेलते हैं। कई स्थानों पर जुलूस, भजन, नृत्य और लोकगीत होते हैं। पारंपरिक व्यंजन जैसे पूरनपोली, गुजिया और ठंडाई इस उत्सव का हिस्सा होते हैं। शाम को आरती और मिलन समारोह के साथ उत्सव का समापन होता है।
आज के समय में रंग पंचमी केवल परंपरा का पालन नहीं बल्कि आधुनिक जीवन में भी प्रासंगिक है। यह मानसिक स्वास्थ्य, पर्यावरण जागरूकता और सामाजिक एकता का संदेश देती है। प्राकृतिक रंगों का उपयोग और संयमित उत्सव इसकी आधुनिक व्याख्या को और समृद्ध बनाते हैं।
अतः रंग पंचमी भारतीय चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह बताती है कि रंग केवल उत्सव का माध्यम नहीं बल्कि प्रेम, भक्ति और जीवन की ऊर्जा का प्रतीक हैं। कालिदास, जयदेव और सूरदास की काव्य परंपरा हमें यह सिखाती है कि रंग तभी सार्थक हैं जब वे मन की शुद्धि और प्रेम की भावना से जुड़े हों। आज के विभाजित विश्व में रंग पंचमी हमें एकजुट होने, सकारात्मकता फैलाने और जीवन की विविधता को स्वीकार करने का संदेश देती है।
