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भारतीय संस्कृति में वन्य जीव संरक्षण की लोक परम्परा

आचार्य ललित मुनि

पृथ्वी पर जीवन केवल मनुष्य तक सीमित नहीं है, इस भूगोल में अन्य जीव भी बसते हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2013 में घोषित विश्व वन्य जीव दिवस (World Wildlife Day) केवल एक औपचारिक अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के आत्ममंथन का अवसर है। वर्ष 2026 की थीम “औषधीय एवं सुगंधित पौधे: स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का संरक्षण” इस सत्य को पुनः स्थापित करती है कि वनस्पति और वन्य जीव एक ही जीवन तंत्र के दो अभिन्न पक्ष हैं।

यदि भारतीय दृष्टि से देखा जाए तो वन्य जीव संरक्षण हमारे लिए कोई नई पर्यावरणीय नीति या आधुनिक वैज्ञानिक अवधारणा नहीं है। यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति, धार्मिक चेतना, लोक परंपराओं, उत्सवों, आस्थाओं और जीवन दर्शन में हजारों वर्षों से प्रवाहित होती रही है। भारतीय सभ्यता ने प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे चेतन सत्ता के रूप में स्वीकार किया। यही कारण है कि यहां वन केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि “वनदेवता” है और पशु केवल जीव नहीं, बल्कि सहजीवी अस्तित्व हैं।

भारतीय दर्शन का मूल भाव “सर्वे भवन्तु सुखिनः” केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त प्राणी जगत तक विस्तृत है। भारतीय संस्कृति की जड़ें वेदों में हैं। वेदों में प्रकृति और वन्य जीवों के प्रति जो दृष्टिकोण मिलता है, वह आधुनिक पर्यावरण विज्ञान से भी अधिक व्यापक और संवेदनशील है। अथर्ववेद के भूमि सूक्त का प्रसिद्ध मंत्र है:

माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः। पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।

यह मंत्र केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं है। इसमें सम्पूर्ण पर्यावरणीय नैतिकता समाहित है। जब पृथ्वी माता है तो उस पर रहने वाले सभी जीव हमारी सहोदर संतति हैं। बाघ, हाथी, हिरण, पक्षी, कीट, सर्प सभी उसी माता की संतान हैं। अतः किसी जीव का विनाश वस्तुतः पारिवारिक संतुलन को नष्ट करना है।

भूमि सूक्त में पृथ्वी को पर्वतों, वनों, औषधियों और जीवों की संरक्षिका बताया गया है। वैदिक समाज में वन आश्रम जीवन का केंद्र थे। ऋषि-मुनियों के आश्रमों में पशु-पक्षी निर्भय विचरण करते थे। यह उस समय की प्राकृतिक अभयारण्य व्यवस्था थी। ऋग्वेद में वृक्षों और वनस्पतियों को जीवनदाता कहा गया है। वृक्षों को काटने से बचने की चेतावनी इसलिए दी गई क्योंकि वे पशु-पक्षियों के आश्रय हैं। यह विचार आज के habitat conservation सिद्धांत से पूर्णतः मेल खाता है। यजुर्वेद में निर्देश मिलता है:

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“मा हिंसीः” अर्थात प्रकृति को क्षति मत पहुंचाओ।

यह संदेश वायु, जल और आकाश की शुद्धता से जुड़ा है। स्पष्ट है कि वैदिक ऋषि जानते थे कि पर्यावरण नष्ट होगा तो वन्य जीव स्वतः समाप्त हो जाएंगे।  ईशावास्य उपनिषद् का प्रथम मंत्र इस दर्शन को और गहराई देता है:

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥

अर्थात समस्त जगत ईश्वर से व्याप्त है, इसलिए त्यागपूर्वक उपभोग करो और लोभ मत करो। यहां उपभोग पर संयम की शिक्षा दी गई है। असीम लालच ही वन विनाश और वन्य जीव संकट का मूल कारण है। उपनिषद् मानव को उपभोक्ता नहीं, संरक्षक बनाते हैं। रामायण और महाभारत केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्यावरणशास्त्र के ग्रंथ भी हैं। महाभारत का अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है:

निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम्।
तस्माद् व्याघ्रो वनं रक्षेद् वनं व्याघ्रं च पालयेत्॥

अर्थात वन के बिना बाघ मारा जाता है और बाघ के बिना वन नष्ट हो जाता है।

यह श्लोक आधुनिक ecology का प्राचीन सूत्र है। आज वैज्ञानिक इसे food chain balance कहते हैं। शीर्ष शिकारी के समाप्त होते ही पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाता है। महाभारत का मूल संदेश:

अहिंसा परमो धर्मः।

अर्थात हिंसा से दूर रहना सर्वोच्च धर्म है। यह सिद्धांत शिकार संस्कृति पर नैतिक नियंत्रण स्थापित करता था।

रामायण में वन्य जीव सहयोगी के रूप में आते हैं। जटायु पक्षी धर्म की रक्षा के लिए प्राण त्यागता है। भगवान राम उसका अंतिम संस्कार स्वयं करते हैं। यह मनुष्य और पक्षी के बीच समान सम्मान का उदाहरण है। वानर, भालू, गिलहरी सभी रामकथा के नायक हैं। भारतीय लोक मानस में यह संदेश स्थापित हुआ कि वन्य जीव शत्रु नहीं, सहचर हैं। भारतीय देव परंपरा स्वयं वन्य जीव संरक्षण का सांस्कृतिक तंत्र है। भगवान विष्णु के अवतारों में मत्स्य, कूर्म और वराह सीधे पशु रूप हैं। इसका अर्थ है कि जीव मात्र में दिव्यता है। भगवद्गीता (5.18) में कहा गया:

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विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥

अर्थ:
अर्थात ज्ञानी व्यक्ति ब्राह्मण, गाय, हाथी और कुत्ते में समान आत्मा देखता है। यह समदृष्टि जैव नैतिकता की सर्वोच्च अवस्था है। जब सभी जीवों में आत्मा समान है, तब शोषण का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। देवी दुर्गा का वाहन सिंह, शिव का नंदी, गणेश का मूषक, कार्तिकेय का मयूर, सरस्वती का हंस यह दर्शाते हैं कि प्रत्येक जीव प्रकृति के संतुलन में आवश्यक है। नाग पंचमी जैसे पर्व विषैले सर्पों तक के संरक्षण का सामाजिक माध्यम बने। जैन दर्शन का सूत्र है:

परस्परोपग्रहो जीवानाम्।
अर्थात सभी जीव एक दूसरे के सहायक हैं।

जैन साधु सूक्ष्म जीवों की रक्षा हेतु मुखावरण धारण करते हैं। यह सूक्ष्म जैव विविधता के प्रति संवेदनशीलता का अद्वितीय उदाहरण है। बौद्ध जातक कथाओं में बुद्ध अनेक जन्मों में पशु रूप में आते हैं। इससे करुणा का विस्तार मानव से परे जाता है। सम्राट अशोक के शिलालेखों में पशु वध पर प्रतिबंध, पशु चिकित्सालय और प्रजाति संरक्षण का उल्लेख मिलता है। यह विश्व का पहला राज्य-प्रायोजित वन्य जीव संरक्षण प्रयास माना जा सकता है। भारत में संरक्षण केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रहा। गांवों ने इसे जीवन पद्धति बनाया।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति में वन्य जीव संरक्षण केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन व्यवहार का स्वाभाविक अंग रहा है। यहां की जनजातीय परंपराओं में जंगल को “जीवित सत्ता” माना जाता है और वन्य जीवों को वनदेव, बूढ़ादेव तथा ग्राम देवताओं का सहचर समझा जाता है। गोंड, मुरिया, हल्बा, बैगा और अन्य आदिवासी समुदायों में शिकार भी नियमबद्ध और सामुदायिक सहमति से किया जाता था, जिससे प्रजातियों का संतुलन बना रहे। कई गांवों में आज भी देवगुड़ी और सरना स्थल के आसपास के वन क्षेत्र पवित्र माने जाते हैं, जहां पशु-पक्षियों को मारना वर्जित होता है।

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‘हरियाली’, ‘नवाखाई’, ‘आमा जोगानी’ तथा ‘मड़ई’ जैसे लोक पर्व प्रकृति और जीव जगत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के अवसर होते हैं। बस्तर अंचल में पहाड़ी मैना, हिरण, सर्प और कुछ विशेष वृक्षों को कुलचिह्न (टोटम) मानने की परंपरा भी मिलती है, जिसके कारण संबंधित जीव या वनस्पति की रक्षा समुदाय का नैतिक दायित्व बन जाता है। इस प्रकार छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति सहअस्तित्व, सीमित उपभोग और प्रकृति सम्मान के माध्यम से सदियों से वन्य जीव संरक्षण की जीवंत सामाजिक व्यवस्था को बनाए हुए है।

राजस्थान के ओरण, महाराष्ट्र की देवराई, केरल के सरपा कावु पवित्र वन हैं जहां शिकार और वृक्ष कटाई निषिद्ध रही। ये क्षेत्र आज भी जैव विविधता के सुरक्षित द्वीप हैं। बिश्नोई समाज के गुरु जाम्भेश्वर के 29 नियमों में वन्य जीव और वृक्ष रक्षा अनिवार्य है। 1730 में अमृता देवी सहित 363 लोगों ने खेजड़ी वृक्ष बचाने हेतु बलिदान दिया। यह घटना आधुनिक पर्यावरण आंदोलनों से सदियों पूर्व की है। जनजातीय समाज आज भी वाघोबा, नाग देव, वनदेवी की पूजा के माध्यम से संरक्षण करता है।

महात्मा गांधी ने कहा था कि किसी राष्ट्र की नैतिकता इस बात से आंकी जा सकती है कि वह पशुओं के साथ कैसा व्यवहार करता है। गांधी की अहिंसा मानव केंद्रित नहीं थी, बल्कि समस्त जीव जगत तक विस्तृत थी। आज जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्रजातियों के विलुप्त होने का संकट सामने है, तब भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक हो उठती है।

विश्व वन्य जीव दिवस हमें केवल जागरूक नहीं करता, बल्कि स्मरण कराता है कि संरक्षण हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः” केवल मंत्र नहीं, बल्कि जीवन का अनुबंध है। यदि भारतीय लोक परंपराओं, पवित्र वनों, अहिंसा दर्शन और सहअस्तित्व की भावना को पुनर्जीवित किया जाए तो आधुनिक संरक्षण प्रयास अधिक प्रभावी बन सकते हैं। वन्य जीवों की रक्षा करना प्रकृति की रक्षा है और प्रकृति की रक्षा मानव अस्तित्व की रक्षा है।