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बदलती जीवनशैली और बढ़ता कैंसर संकट

भारत में कैंसर की कहानी केवल अस्पतालों, दवाइयों और चिकित्सा रिपोर्टों तक सीमित नहीं है। यह उन घरों की कहानी है जहां अचानक जीवन की गति बदल जाती है। जहां एक सामान्य दिन की शुरुआत खेत, काम और परिवार की जिम्मेदारियों से होती है, लेकिन कुछ महीनों बाद वही परिवार अस्पताल की लंबी कतारों, जांच रिपोर्टों और अनिश्चित भविष्य के बीच खड़ा दिखाई देता है।

देश के किसी छोटे से गांव की एक महिला जब गले में दर्द या छोटी गांठ को सामान्य बीमारी समझकर टाल देती है, तब उसे अंदाजा भी नहीं होता कि यह लापरवाही पूरे परिवार की दिशा बदल सकती है। जब तक जांच होती है, बीमारी अक्सर तीसरे या चौथे चरण में पहुंच चुकी होती है। इलाज शुरू होते ही घर की बचत खत्म होती है, जमीन गिरवी रखी जाती है और बच्चों के सपनों पर विराम लग जाता है। यही आज भारत में कैंसर की सबसे सच्ची तस्वीर है।

कभी शहरी जीवनशैली से जुड़ी मानी जाने वाली यह बीमारी अब गांवों तक गहराई से पहुंच चुकी है। कैंसर अब किसी वर्ग, क्षेत्र या आयु तक सीमित नहीं रहा। यह धीरे-धीरे भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल होता जा रहा है।

राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े इस चिंता को और स्पष्ट करते हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के अनुसार वर्ष 2022 में देश में 14.61 लाख नए कैंसर मरीज दर्ज किए गए थे। केवल दो वर्षों के भीतर यह संख्या 2024 में बढ़कर 15.62 लाख तक पहुंच गई। अनुमान है कि 2025 में यह आंकड़ा 15.7 लाख से अधिक हो सकता है। इसका अर्थ है कि भारत में कैंसर का बोझ लगातार बढ़ रहा है और हर वर्ष लाखों नए परिवार इस संघर्ष से जुड़ रहे हैं।

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मौतों की संख्या भी कम चिंताजनक नहीं है। लगभग 8.7 लाख लोगों की मृत्यु कैंसर से होने का अनुमान दर्शाता है कि बीमारी की पहचान अब भी देर से हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में हर नौ व्यक्तियों में से एक को जीवनकाल में कैंसर होने का जोखिम है। पुरुषों में मुंह, फेफड़े और प्रोस्टेट कैंसर प्रमुख हैं, जबकि महिलाओं में स्तन और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर तेजी से बढ़ रहे हैं। बच्चों में रक्त संबंधी कैंसर के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।

यह वृद्धि अचानक नहीं हुई। बदलती जीवनशैली, प्रदूषण, तंबाकू और गुटखा सेवन, असंतुलित भोजन, मानसिक तनाव और बढ़ती आयु जैसे कई कारण मिलकर इस बीमारी को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत में ओरल कैंसर की अधिकता सीधे तंबाकू संस्कृति से जुड़ी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आदत सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन चुकी है, जिसके परिणाम वर्षों बाद दिखाई देते हैं।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में कैंसर का स्वरूप भी अलग-अलग दिखाई देता है। उत्तर-पूर्व भारत विशेष रूप से प्रभावित क्षेत्र बनकर उभरा है। मिजोरम के आइजोल जिले में कैंसर की दर देश में सबसे अधिक दर्ज की गई है। वहीं उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में कुल मरीजों की संख्या अधिक है क्योंकि आबादी विशाल है। महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु भी उच्च कैंसर बोझ वाले राज्यों में शामिल हैं।

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यदि छत्तीसगढ़ की बात करें तो यहां की स्थिति भी तेजी से बदल रही है। राज्य में स्वतंत्र कैंसर रजिस्ट्री के अभाव के बावजूद उपलब्ध आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि बीमारी का प्रसार बढ़ रहा है। वर्ष 2020 में जहां लगभग 27 हजार कैंसर मरीज अनुमानित थे, वहीं 2024 तक यह संख्या 30 हजार से अधिक हो गई।

रायपुर स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर मेमोरियल अस्पताल के क्षेत्रीय कैंसर केंद्र के आंकड़े इस बदलाव को प्रत्यक्ष रूप से दिखाते हैं। दो दशक पहले जहां मरीजों की संख्या सीमित थी, आज हजारों नए मरीज हर वर्ष उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी मामलों में कई गुना वृद्धि हो चुकी है।

छत्तीसगढ़ में मुंह का कैंसर सबसे अधिक पाया जा रहा है, जिसका मुख्य कारण तंबाकू और गुटखा सेवन है। महिलाओं में स्तन कैंसर के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अधिकांश मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब बीमारी काफी फैल चुकी होती है।

कैंसर का प्रभाव केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता। यह परिवार की आर्थिक, मानसिक और सामाजिक संरचना को प्रभावित करता है। गांवों में अब भी कैंसर को लेकर भ्रम मौजूद हैं। कई लोग इसे संक्रामक मानते हैं या भाग्य से जोड़ देते हैं। महिलाएं जांच कराने में संकोच करती हैं और पुरुष शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करते रहते हैं। यही देरी उपचार को कठिन बना देती है।

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हालांकि इस गंभीर स्थिति के बीच स्वास्थ्य ढांचे में सकारात्मक परिवर्तन भी दिखाई दे रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा गैर संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत देशभर में स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट और टर्शियरी कैंसर सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। जिला स्तर पर डे-केयर कैंसर सेंटर शुरू होने से मरीजों को बार-बार महानगरों की यात्रा से राहत मिल रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार प्रारंभिक जांच है। यदि बीमारी पहले या दूसरे चरण में पकड़ में आ जाए तो अधिकांश मामलों में मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं। HPV टीकाकरण, नियमित स्क्रीनिंग और तंबाकू नियंत्रण लाखों जीवन बचा सकते हैं। आज आवश्यकता केवल अस्पताल बढ़ाने की नहीं, बल्कि जागरूक समाज बनाने की है। आशा कार्यकर्ता, स्वास्थ्य शिविर और सामुदायिक जांच अभियान ग्रामीण भारत में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

भारत में कैंसर का बढ़ना एक चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि जीवनशैली और पर्यावरणीय जोखिम बढ़ रहे हैं, और अवसर इसलिए कि चिकित्सा विज्ञान और नीतिगत प्रयास पहले से अधिक मजबूत हो रहे हैं। हर वह व्यक्ति जो समय पर जांच कराता है, हर परिवार जो तंबाकू छोड़ने का निर्णय लेता है और हर स्वास्थ्य कार्यकर्ता जो जागरूकता फैलाता है, वह इस राष्ट्रीय लड़ाई को मजबूत बनाता है।

न्यूज डेस्क न्यूज एक्सप्रेस