दया, प्रेम और समन्वय के प्रतीक संत दादू दयाल

भारतीय संत परंपरा में कुछ ऐसे नाम हैं जिनकी उपस्थिति केवल इतिहास की पंक्तियों में सीमित नहीं रहती, बल्कि लोकमानस की धड़कनों में बस जाती है। संत दादू दयाल उन्हीं दिव्य व्यक्तित्वों में से एक हैं। वे केवल एक संत नहीं थे, वे एक विचार थे, एक चेतना थे, एक ऐसी करुणा की धारा थे जिसने समाज के कठोर पत्थरों को भी पिघला दिया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची भक्ति किसी संप्रदाय की सीमा में नहीं बंधती, वह सीधे मनुष्य के हृदय से ईश्वर तक जाती है।
सोलहवीं शताब्दी का भारत अनेक सामाजिक और धार्मिक परिवर्तनों से गुजर रहा था। एक ओर मुगल शासन का विस्तार हो रहा था, दूसरी ओर भक्ति आंदोलन की मधुर लहर गांव गांव में फैल रही थी। इसी कालखंड में गुजरात के अहमदाबाद नगर में एक अलौकिक घटना घटित हुई। कहा जाता है कि साबरमती नदी की लहरों पर एक नवजात शिशु तैरता हुआ मिला। नगर के नागर ब्राह्मण लोदीराम और उनकी पत्नी बसी बाई ने उस बालक को अपनाया। वही बालक आगे चलकर संत दादू दयाल के नाम से विख्यात हुआ। विक्रम संवत 1601 की फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को उनका जन्म दिवस माना जाता है और आज भी उसी तिथि को उनकी जयंती श्रद्धा से मनाई जाती है।
बाल्यकाल से ही दादू जी का मन साधारण खेलों में नहीं लगता था। वे शांत स्वभाव के थे और अक्सर एकांत में बैठकर ईश्वर का स्मरण करते थे। लोककथाओं में वर्णन मिलता है कि ग्यारह वर्ष की आयु में उन्हें एक वृद्ध संत के रूप में ईश्वर के दर्शन हुए। इस दिव्य अनुभव ने उनके भीतर वैराग्य का बीज बो दिया। परिवार ने उन्हें सांसारिक जीवन में बांधने का प्रयास किया, विवाह भी हुआ, संतानें भी हुईं, लेकिन उनका मन संसार की सीमाओं में टिक नहीं पाया। अंततः वे घर छोड़कर साधना पथ पर निकल पड़े।
राजस्थान की धरती ने उनके तप को स्वीकार किया। आबू पर्वत, पुष्कर और करडाला जैसे स्थानों पर उन्होंने कठोर साधना की। वर्षों तक एकांत में तप करते रहे। कथाओं में आता है कि इंद्र की माया ने उन्हें विचलित करने का प्रयास किया, किंतु उन्होंने हर प्रलोभन को सहज दृष्टि से स्वीकार कर उसे निरस्त कर दिया। उनके लिए स्त्री पुरुष का भेद नहीं था, सब आत्मा के स्तर पर समान थे। यही दृष्टि आगे चलकर उनकी शिक्षाओं का आधार बनी।
सांभर में उन्होंने बारह वर्षों तक साधना और सत्संग का कार्य किया। वहां का अलख दरीबा स्थल आज भी उनकी स्मृतियों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने जनसाधारण को सरल भाषा में समझाया कि ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है। जाति, पंथ और बाहरी आडंबर से ऊपर उठकर मन को निर्मल करना ही सच्ची साधना है। उनका संदेश था कि सभी मनुष्य एक ही परम तत्व की संतान हैं। यह विचार उस समय के समाज के लिए क्रांतिकारी था।
आमेर और फतेहपुर सीकरी में उनका प्रभाव दूर तक फैला। मुगल बादशाह अकबर ने भी उनके सत्संग का लाभ लिया। जब अकबर ने उनसे ईश्वर के स्वरूप के बारे में प्रश्न किया तो दादू जी ने प्रेम के स्वर में उत्तर दिया कि ईश्वर का असली रूप प्रेम है। यह उत्तर किसी दार्शनिक ग्रंथ का उद्धरण नहीं था, बल्कि अनुभूति का सार था। अकबर उनके विचारों से प्रभावित हुआ। यह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि दादू जी का व्यक्तित्व केवल साधकों तक सीमित नहीं था, बल्कि शासकों को भी प्रभावित करता था।
नरैना धाम उनके जीवन का अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव बना। जयपुर के निकट स्थित इस स्थान पर उन्होंने खेजड़े के वृक्ष के नीचे साधना की और ब्रह्मधाम की स्थापना की। आज भी नरैना दादू पंथ का प्रमुख केंद्र है। उनकी समाधि वहीं स्थित है, जहां लाखों भक्त श्रद्धा से पहुंचते हैं। उनकी जयंती पर यहां भव्य मेला लगता है, जिसमें विभिन्न वर्गों के लोग बिना किसी भेदभाव के सम्मिलित होते हैं।
दादू जी की शिक्षाएं अत्यंत सरल थीं, परंतु उनमें गहरी आध्यात्मिकता समाहित थी। उन्होंने मूर्तिपूजा, जाति व्यवस्था और बाहरी कर्मकांडों का विरोध किया। उनका जोर नाम स्मरण, सहज समाधि और आत्मबोध पर था। वे कहते थे कि सच्चा गुरु बाहर नहीं, भीतर है। यदि मन निर्मल हो जाए तो परमात्मा का साक्षात्कार संभव है। उनकी साखियों में पाखंड पर तीखा प्रहार मिलता है, लेकिन भाषा में कटुता नहीं, करुणा होती है।
दादू वाणी उनकी अमूल्य धरोहर है। लगभग पांच हजार पदों और साखियों का यह संग्रह उनके शिष्यों ने संकलित किया। भाषा ब्रज, राजस्थानी और गुजराती का मिश्रण है। फारसी शब्दों का प्रयोग भी मिलता है, जो उनकी समन्वय दृष्टि को दर्शाता है। वे कबीर की निर्गुण परंपरा के उत्तराधिकारी माने जाते हैं, किंतु उनकी अनुभूति स्वतंत्र और मौलिक थी। प्रेम और विरह के माध्यम से उन्होंने आत्मा और परमात्मा के मिलन का चित्र खींचा।
उनके अनेक शिष्य हुए। कुल 152 शिष्यों में 52 प्रमुख माने जाते हैं। गरीबदास, रज्जब, सुंदरदास, बखना जैसे नाम आज भी सम्मान से लिए जाते हैं। दादू पंथ की स्थापना उनके जीवनकाल में ही हो चुकी थी। बाद में इसे ब्रह्म संप्रदाय और परब्रह्म संप्रदाय के नाम से भी जाना गया। नरैना, सांभर, आमेर, करडाला और भैरानाजी पंथ के प्रमुख केंद्र बने।
दादू पंथ की एक विशेष परंपरा नागा संतों की है। इन संतों ने समय समय पर समाज और धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष भी किया। इतिहास में कई युद्धों का उल्लेख मिलता है, जिनमें उन्होंने साहस का परिचय दिया। यह बताता है कि दादू जी की शिक्षाएं केवल ध्यान और भजन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि आत्मसम्मान और रक्षा की भावना भी उनमें निहित थी।
सामाजिक सुधार के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने छुआछूत, सती प्रथा और पर्दा प्रथा का विरोध किया। उनके लिए हर मनुष्य ईश्वर का अंश था। वे दया, क्षमा और सेवा को सच्ची भक्ति मानते थे। उनके अनुयायी सादगीपूर्ण जीवन जीते, शाकाहार अपनाते और मद्यपान से दूर रहते। यह जीवन शैली केवल नियम नहीं, आत्मसंयम का अभ्यास थी।
उनकी जयंती आज भी नरैना में अत्यंत श्रद्धा से मनाई जाती है। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को लाखों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। भजन कीर्तन, सत्संग और अखंड पाठ का आयोजन होता है। 2026 में 482वां दादू मेला महोत्सव आयोजित होगा, जिसमें देशभर से भक्त पहुंचेंगे। नरैना स्टेशन पर विशेष व्यवस्था की जाती है। दादूद्वारा में समाधि के दर्शन करते हुए भक्त सत्यराम और दादूराम का जाप करते हैं। यह दृश्य केवल धार्मिक आयोजन नहीं, सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
दादू जी की मृत्यु ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी संवत 1660 को हुई। कहा जाता है कि उन्होंने ध्यानमग्न अवस्था में सत्यराम कहते हुए देह त्यागी। उनका अंतिम संस्कार परंपरागत रीति से नहीं हुआ। यह उनकी निर्गुण विचारधारा का प्रतीक था। उनकी समाधि आज भी साधकों को शांति देती है।
आज दादू पंथ शिक्षा, सेवा और सामाजिक कार्यों में सक्रिय है। जयपुर के रामगंज में मुख्य पीठ स्थित है। अनुयायी सुमरनी लेकर सत्तराम का उच्चारण करते हैं। साधु विवाह नहीं करते और परंपरा को गोद लेकर आगे बढ़ाते हैं। दादूद्वारा सेवा और साधना का केंद्र बना हुआ है।
दादू दयाल का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, व्यवहार में होती है। प्रेम ही ईश्वर का स्वरूप है। जब समाज में विभाजन और असहिष्णुता बढ़ती है, तब उनकी वाणी मार्गदर्शन देती है। वे कहते हैं कि जो सबका भला चाहता है, वही सच्चा भक्त है। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पांच सौ वर्ष पहले था।
उनकी विरासत केवल ग्रंथों और मंदिरों में नहीं, बल्कि उन लोगों के हृदय में है जो दया और प्रेम का मार्ग अपनाते हैं। राजस्थान की धरती पर उनका प्रभाव इतना व्यापक है कि गांव गांव में दादूद्वारा मिल जाता है। लोकगीतों में उनका नाम गूंजता है। उनकी वाणी आज भी शांति देती है।
जब हम उनकी जयंती मनाते हैं तो केवल स्मरण नहीं करते, बल्कि संकल्प लेते हैं कि उनके दिखाए मार्ग पर चलें। दया, क्षमा, संतोष और सेवा को जीवन का आधार बनाएं। संत दादू दयाल का जीवन इस बात का प्रमाण है कि साधारण जन्म भी असाधारण बन सकता है यदि उसमें प्रेम और सत्य की साधना हो। ब्रह्मर्षि संत दादू दयाल को शत शत नमन। उनकी करुणा की ज्योति समाज को सदैव आलोकित करती रहे। सत्यराम।
