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साहित्य, देशभक्ति और प्रकृति-प्रेम की प्रेरणा त्रयी : राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

स्वराज करुण 
(ब्लॉगर एवं पत्रकार )

अपनी कविताओं के माध्यम से देशभक्ति और प्रकृति-प्रेम की अलख जगाने वाले सुप्रसिद्ध कवि थे मैथिलीशरण गुप्त, जिनकी आज जयंती है। उन्हें विनम्र नमन। वे हिन्दी साहित्य के अनमोल रत्न थे। उन्होंने अपनी एक से बढ़कर एक अनमोल रचनाओं से हिन्दी साहित्य के संसार को सजाया और संवारा। महाकवि मैथिलीशरण गुप्त जी का जन्म 3 अगस्त 1886 को उत्तर प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में हुआ था। उन्होंने घर पर ही संस्कृत, हिन्दी और बांग्ला भाषाओं का गहन अध्ययन किया।

उन्होंने हिन्दी साहित्य को अपनी अनेक कालजयी रचनाओं से समृद्ध किया, जिनमें महाकाव्य ‘भारत-भारती’ और ‘साकेत’ भी शामिल हैं। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1953 में ‘पद्म-विभूषण’ और वर्ष 1954 में ‘पद्म-भूषण’ के राष्ट्रीय अलंकरणों से सम्मानित किया था। मैथिलीशरण गुप्त वर्ष 1952 से 1964 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। आज़ादी के आंदोलन में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। वर्ष 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था। उनका निधन 12 दिसम्बर 1964 को हुआ। भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया था।

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राष्ट्र-प्रेम से परिपूर्ण उनकी रचनाओं से प्रभावित होकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ का सम्मानजनक संबोधन दिया था। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में गुप्त जी ने अपनी रचनाओं से जनता में देशप्रेम और राष्ट्रीय चेतना जगाने का ऐतिहासिक कार्य किया। भारत-भूमि की महिमा गाते हुए वह कहते हैं—

सम्पूर्ण देशों से अधिक,
किस देश का उत्कर्ष है,
उसका कि जो ऋषि भूमि है,
वह कौन? भारतवर्ष है।

गुप्त जी द्वारा रचित खंड-काव्य ‘पंचवटी’ की इन पंक्तियों में शब्दालंकार की आकर्षक अनुगूंज को भला कौन भूल सकता है, जिसमें उन्होंने कल्पना की है कि भगवान श्रीराम वनवास के दौरान उनकी पर्णकुटीर के आसपास का रात्रिकालीन प्राकृतिक परिवेश कितना सुंदर रहा होगा? उनकी यह कल्पना शक्ति पाठकों को सम्मोहित कर लेती है—

चारुचंद्र की चंचल किरणें,
खेल रही हैं जल-थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है
अवनि और अम्बर तल में!

उनकी एक कविता का यह अंश हमें संदेश देता है कि जीवन-संघर्ष में मनुष्य को कभी निराश नहीं होना चाहिए। उनका संदेश बहुत स्पष्ट है—

नर हो, न निराश करो मन को,
कुछ काम करो, कुछ काम करो,
जग में रह के निज नाम करो!
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो,
समझो, जिसमें यह व्यर्थ न हो!

तत्कालीन भारतीय समाज में नारी जीवन की कारुणिक परिस्थितियों को उन्होंने ‘यशोधरा’ में कुछ इस तरह अपनी वाणी देकर जनमानस को झकझोरने का प्रयास किया—

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी!

मैंने और शायद आप में से बहुत-से मित्रों ने स्कूली जीवन में गुप्त जी की इन रचनाओं को कई बार पढ़ा और उनकी भावनाओं को हृदय की गहराइयों से महसूस भी किया है।

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महाकवि मैथिलीशरण गुप्त न केवल एक युगप्रवर्तक साहित्यकार थे, बल्कि वे राष्ट्र की आत्मा को स्वर देने वाले कवि भी थे। उनकी रचनाएँ आज भी हमें देशभक्ति, सामाजिक चेतना, और प्रकृति-प्रेम की प्रेरणा देती हैं। उनका साहित्य न केवल शृंगारिक और भावुक है, बल्कि उसमें एक ऐसा तेज है जो जनमानस को जाग्रत करता है। आज उनकी जयंती पर हम उन्हें नमन करते हैं।