डॉ. बलदेव साव का साहित्यिक प्रदेय : जयंती विशेष

27 मई डाँ. बलदेव जी की 82 वीं जयंती पर विशेष आलेख

बिमला नायक

साहित्य मनुष्य के भावों और विचारों का मौखिक एवं लिखित समुच्चय है। साहित्य और मानव का अन्योन्य संबंध रहा है। मानव साहित्य का सर्जक है और साहित्य मानव जीवन का प्रदर्शक। साहित्य को समय, परिवेश, पर्यावरण, परिस्थिति आदि सभी चीजें प्रभावित करती हैं। इन्हीं के प्रभाववश प्रत्येक समाज के साहित्य का अपना अपना अलग स्वरूप होता है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश अपनी आंचलिक संस्कृति के लिए स्थापित है, यहां के जन – जीवन में व्याप्त अपनी लोक – संस्कृति, रीति – रिवाज रहन सहन सभी यहां की साहित्य परंपरा को पुष्ट करती है। भाषा का प्रभाव अपना अलग महत्व रखता है, एक साहित्यकार इसके प्रभाव से अलग नहीं रह सकता। छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों का सदैव से अपनी भाषा को अग्रेषित करने का प्रयास रहा है, अपनी भाषा व बोली के प्रति उनका प्रेम दृष्टव्य है यही कारण है कि आज छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा के तर्ज पर लाने का अत्यंत प्रयास हो रहा है। जिसमें हमारे प्रदेश के सभी साहित्यकारों का महत्वपूर्ण प्रयास सराहनीय है।

इन्हीं प्रयासरत साहित्यकारों में से एक साहित्यकार हैं- डॉ . बलदेव साव, जिन्होंने न केवल छत्तीसगढ़ी में बल्कि हिंदी और असमिया भाषा में भी अपनी लेखनी से अनेक प्रयास किए हैं, जो उनके भाषा प्रेमी होने का उत्कृष्ट उदाहरण है। समग्र तौर पर यदि डॉ. बलदेव साव के प्रयासों को देखा जाए तो उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से अपने छत्तीसगढ़ प्रदेश की संस्कृति, कला, इतिहास, जनजाति आदि को प्रचारित करने उनका प्रवर्तन करने का प्रयास किया है। छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक सौंदर्य को अपनी कविता में चित्रित किया है जो उनके प्रकृति प्रेमी होने का अच्छा उदाहरण है। भाषा प्रेमी, प्रकृति प्रेमी, कला प्रेमी डॉ. बलदेव साहित्यिक प्रदेय को हम निम्न रूपों में विभाजित कर सकते हैं-
1 डॉ . बलदेव साव का व्यक्तित्व एवं कृतित्व
2 डॉ . बलदेव साव का रचनात्मक वैशिष्ट्य
3 डॉ . बलदेव साव की समीक्षा दृष्टि
उपर्युक्त बिंदुओं के आधार पर डॉ . बलदेव के प्रदेय को विश्लेषित करने प्रयास किया जा रहा है –

1 डॉ . बलदेव का व्यक्तित्व एवं कृतित्व:-
बलदेव जी का जन्म 27 मई 1942 को जांजगीर जिला ग्राम नरियारा में हुआ। पिता श्री हरा लाल साव, माता श्रीमती बीसाहीन देवी धार्मिक और श्रद्धालु प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। डॉ. बलदेव ने बी.ए. और एम.ए. की शिक्षा बैकुंठपुर में ग्रहण की एवं बी . टी.आई. का प्रशिक्षण भी वही पूर्ण किया। इन्होंने असमिया भाषा में डिप्लोमा एवं हिंदी के श्रेष्ठ आख्यानक प्रगीत शीर्षक शोध कार्य को पूर्ण कर पी – एच.डी की उपाधि ग्रहण की । बतौर शिक्षक अपने सभी दायित्वों को पूरी निष्ठा एवं लगन से पूर्ण करते हुए भी अपने लेखन कार्य को जारी रखा, शिक्षक के रूप में एवं पारिवारिक जिम्मेदारी के उपरांत भी उन्होंने कभी साहित्य सेवा से मुंह नहीं मोड़ा।

एक लेखक, कवि, रचनाकार से कहीं अधिक एक समीक्षा के तौर पर डॉ. बलदेव साव हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं। एक लेखक जितना साहित्य को दे सकता है उससे कहीं अधिक डॉ. बलदेव ने एक समीक्षा के तौर पर साहित्य को दिया है। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, समीक्षा, संपादन आदि के रूप में कई रचनाएं समाज को दी है, जिसमें छत्तीसगढ़ की संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, कला के साथ ही साथ एक व्यक्ति विशेष को केंद्र में रखकर की गई रचनाएं भी सम्मिलित हैं।

2 डॉ . बलदेव साव का रचनात्मक वैशिष्ट्य :-
1-जीवन मूल्य- डॉ . बलदेव साव की रचनाओं में विशेष रूप से आध्यात्मिक मूल्य, भौतिक मूल्य, सौंदर्यात्मक मूल्य, नैतिक मूल्य दृष्टिगत होते हैं । बाल्यकाल से ही धार्मिक परिवेश प्राप्त डॉ . बलदेव की कविता धर्म – कर्म के नियमों रीति – रिवाजों से परिपूर्ण है। समाज के निम्न वर्गों के लिए उनके हृदय में अत्यंत प्रेम भाव विद्यमान थी, जो उनकी कविता ‘ श्रम समर्पित जीवन में झलकती है। कठिनाइयों में भी इंसान को श्रम से पीछे न हटने का संदेश देती यह कविता श्रमिक वर्ग के लिए अत्यंत प्रेरणादायक सिद्ध होती है। डॉ . बलदेव प्रकृति के सुंदर रूप में इतना तल्लीन है कि प्रकृति में मानवीयकरण करते हुए प्रकृति के विविध रूपों में मानवीय चेष्टाओं की झलक दिखाई देने लगती है। रायगढ़ की नदी है ‘केलो’ जिसे प्रेमिका की भांति इठलाते हुए एवं आकाश को उसके प्रेमी के रूप में चित्रित करती उनकी कविता की निम्न पंक्तियां अत्यंत मनमोहक लग रही है –
“अरि ओ केलो
मुझे अपनी बाहों में ले लो ,
जब भी देखा
तुझको बावरा मन
सोनपरी से टकराकर दरक गया दर्पण ,
हंसी छूटती चट्टानों से कहा
पवन ने संग हमें भी ले लो ,
कबसे सूखा मैं प्यासा का प्यासा
तुम बनी रही या की मान बैठी हो
नश्वरता से कहां प्यार
टूट कर कहा नखत ने
निष्ठुर चट्टानों से ही खेलो
‘अरे ओ केलो ”

विवाह मानव जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण पल है जिसमें प्रत्येक इंसान के (माता , पिता , भाई, बहन) अपने – अपने होते हैं। सभी के अपने अरमान होते हैं जिससे उनके मन में अनेकों संवेदनाएं उभरती हैं। बेटी की विदाई पर मां की भावनाओं का अनुमान तो प्रायः सभी लगा लेते हैं किंतु एक पिता के अंतर्मन की संवेदना को जानना उसे समझना कठिन होता है। डॉ . बलदेव ने शायद अपने मन की भावनाओं को ही पिता की भावना का रूप देते हुए कविता लिख डाली है। विदा गीत कविता उनकी इसी भावना की प्रतिनिधि कविता है जिसके शब्द मन को भेद देते हैं तथा वह दृश्य सहज ही साक्षात हो जाता है, इस कविता से उद्धृत प्रस्तुत पंक्ति इसके उदाहरण हैं :-

तुम्हें मालूम ना होगा हम कहां उड़ जाएंगे
बनखंडी पखेरू लौट नहीं आएंगे
छूओगी जब कभी उदास पौधों को
हम फूल पौधों से टपक टूट जाएंगे

2 वृद्ध विमर्श- समाज जितना संकुचित होता जा रहा है, उतनी ही उसकी भावनाएं मरती जा रही है। दिखावे भरी जिंदगी को निभाते निभाते इंसान अपने संस्कारों, मूल्यों, परंपराओं को तोड़ता जा रहा है। परिवार में एक दूसरे के लिए प्रेम, सम्मान, इज्जत की भावना कम होती जा रही है। इंसान जीने के लिए कमाता है किंतु अधिक से अधिक कमाई के चक्कर में वह अपना अमूल्य समय गंवा बैठता है। युवावस्था में वह अपने परिवार बच्चों को समय नहीं दे पाता तो वृद्धावस्था में परिवार उसके लिए समय नहीं निकाल पाता । आज के समाज की इसी दशा दिशा को डॉ. बलदेव ने अपने लेखन से स्पष्ट किया है एवं समाज के वृद्ध जनों के प्रति लोगों को सोचने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया है ।

वृद्धों की सामाजिक, व्यक्तिगत, पारिवारिक, मानसिक, आर्थिक समस्याओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने बहुत ही सुंदर कहानियां लिखी है। जिन्हें पढ़कर हमें वह घटनाएं वास्तविक प्रतीत होती हैं या कहें कि डॉ. बलदेव के समक्ष यह घटनाएं घटी हो, यह अवश्य ही संभव है जिसे देखकर लेखक बलदेव ने अपनी गणना की है। ‘भगत की साख ‘ ‘ गांव ‘ ‘ ‘जमीन ‘ ‘ मंगलू चोर ‘ आदि अनेक कहानियां ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। यह कहानियां आज के स्वार्थी सामाजिक परिवेश में अत्यंत सटीक बैठती है। भगत की सीख कहानी ऐसे वृद्ध की कहानी है जिसकी समाज में बहुत प्रतिष्ठा है लेकिन अपने ही परिवार में उसकी कोई पूछ नहीं होती। भगत अपने समाज में बैठकों का मुखिया बनता है परिवारों के झगड़ों का सही निपटारा करता है तथा उसकी कही बात को सभी मंजूर करते हैं किंतु उसके परिवार में बेटे – बहू उसकी ही नहीं सुनना चाहते हैं अपने मन की करते हैं। बहूएं अलग – अलग रहना चाहती है लेकिन भगत ऐसा ना चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाता है । यह कहानी पढ़कर ऐसा महसूस होता है जैसे कि यह प्रत्येक परिवार की कहानी है लगभग सभी परिवार में यह कभी न कभी किसी न किसी रूप में घटित होते देखा जा सकता है । पहले की भांति आज के बच्चे अपने बड़ों की बातें नहीं सुनते, अपनी ही करने की कोशिश करते हैं।

आज के परिवेश में वृद्धों को सामंजस्य बैठाने में बहुत कुछ सहन करना पड़ता है । मानसिक तौर पर प्रताड़ित होने के साथ ही उन्हें आर्थिक रूप से तो कभी भावनात्मक रूप में कई अपेक्षाओं का सामना करना पड़ता है । समाज में इस विषय पर पर्याप्त चर्चा की आवश्यकता है । आदमी अपने ही परिवार के लिए कमाता है उन्हीं के लिए जीता है लेकिन अपनी आवश्यकताओं के समय उन्हें कोई सहारा देने नहीं आता, यह अत्यंत संवेदनशील है जिस पर विचार करना उसका समाधान करना आवश्यक है । साहित्य का धर्म है कि वह समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का साधन बने एक साहित्यकार ही यह कार्य पूर्ण कर सकता है । डॉ . बलदेव ने यह कार्य करने का इस समस्या को उजागर करने उसके समाधान हेतु अथक प्रयास किए हैं । इन मुद्दों पर लेखन के अलावा उन्होंने कई समारोहों में भी इस पर पर्याप्त चर्चा की जोकि अत्यंत सराहनीय प्रयास है ।

3 डॉ . बलदेव साव की समीक्षा दृष्टि –
डॉ. बलदेव ने इस बात को समझा कि हमारे साहित्य के विकास के लिए समाज में छिपे हुए हीरों को खोजना अनिवार्य है, उनको प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। “उन्होंने स्वयं के लेखन तक ही स्वयं को बांधकर नहीं रखा बल्कि उन कवियों लेखकों को भी प्रकाश में आने का मौका दिया जो कि पिछड़े क्षेत्रों के होने के कारण उपेक्षा का शिकार थे। अपने संपादन कार्य एवं समीक्षा के माध्यम से उन्होंने उन कवियों को आगे लाया तथा अपने प्रदेश के साहित्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।“

‘छायावाद और मुकुटधर पांडे ‘ शीर्षक समीक्षा उनकी अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है जो छायावाद और मुकुटधर पांडे को समझने के लिए आवश्यक है। यदि छायावाद के प्रवर्तन और मुकुटधर पांडे के योगदान को जानना और समझना है तो यह पुस्तक उसके लिए अत्यंत आवश्यक है। इसीलिए डॉ . कांति कुमार जैन ने कहा है “ छायावादी काव्य के ज्येष्ठ पुरुष पंडित मुकुटधर पांडे के व्यक्तित्व और काव्य को समझने के लिए डॉ . बलदेव को जानना अनिवार्य है ।”
डॉ . बलदेव की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी कविता के 100 साल’ और ‘ छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण कवि’ छत्तीसगढ़ी साहित्य के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है । “छत्तीसगढ़ी कविता के आरंभ से अब तक काव्य इतना सुंदर संकलन और कहीं दूसरा शायद ही प्राप्त हो सके। यह संग्रह छत्तीसगढ़ के सभी अंचल सरगुजा से लेकर बस्तर तक के कवियों की रचनाओं का संकलन है।

“यह छत्तीसगढ़ के इतिहास से लेकर अब तक के कविताओं का ज्ञान कराती है। साहित्य के इतिहास को समझने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों की कवियों की रचनाएं अपने क्षेत्र की विशेषता लिए हुई है जो इस संकलन में स्पष्ट देखा जा सकता है । छत्तीसगढ़ के साहित्य को इस प्रकार की रचना की आवश्यकता थी जिससे साहित्य का संरक्षण हो सके एवं आने वाले शोधार्थी, लेखकों, साहित्यकारों को इनका ज्ञान प्राप्त हो सके।

छत्तीसगढ़ प्रदेश प्रतिभाशाली साहित्यकारों से परिपूर्ण है आवश्यकता उन्हें अग्रेषित करने उनका प्रचार – प्रसार करने की है। प्रदेश के साहित्य के विकास के लिए क्षेत्रीय रचनाकारों को मौका देने उनके प्रतिभा को निखारने की आवश्यकता है। कहा गया है ‘ साहित्य समाज का दर्पण है ‘ समाज के विकास हेतु साहित्य का विकास अनिवार्य है। डॉ . बलदेव साव द्वारा साहित्य के विकास हेतु किया गया यह प्रयास अमूल्य है । फ़ैले हुए साहित्य को समेटने का अपूर्व कार्य डॉ . बलदेव का साहित्य को दिया गया एक अमूल्य तोहफा है । छत्तीसगढ़ का साहित्य जगत उनकी समीक्षा हेतु सदैव आभारी रहेगा।

लेखिका : बिमला नायिका
पांडातराई , जिला- कबीरधाम ( छ.ग. )

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