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चर्चों और मिशनरी संस्थाओं की भूमि का राष्ट्रीय स्तर पर प्रशासनिक परीक्षण क्यों आवश्यक है?

आचार्य ललित मुनि

महाराष्ट्र के नासिक में हाल ही में उठा चर्च भूमि विवाद देश भर में धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों के प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह प्रकरण केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह संपूर्ण भारत में चर्चों और मिशनरी संस्थाओं द्वारा धारित भूमि के उचित उपयोग, कानूनी वैधता और पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

नासिक में चर्च से संबंधित भूमि विवाद उस समय राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया, जब लगभग 6 एकड़ मूल्यवान भूमि, जिसकी अनुमानित बाजार कीमत करीब 300 करोड़ रुपये बताई जा रही है, के स्वामित्व और हस्तांतरण को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए। जांच एजेंसियों के अनुसार यह भूमि मूल रूप से नासिक डायोसीसन ट्रस्ट एसोसिएशन (Nashik Diocesan Trust Association – NDTA) की थी, लेकिन आरोप है कि बाद के वर्षों में कथित रूप से जाली दस्तावेजों और अभिलेखों में हेरफेर के माध्यम से इसके कुछ हिस्सों का हस्तांतरण और विक्रय किया गया।

स्थानीय प्रशासन को सूचना मिली कि कई धार्मिक संस्थाओं ने धर्मार्थ या शैक्षणिक उद्देश्यों के नाम पर प्राप्त की गई भूमि का व्यावसायिक उपयोग किया है। इनमें से कुछ संपत्तियां वर्षों से बिना किसी सार्वजनिक लाभकारी गतिविधि के निष्क्रिय पड़ी थीं, जबकि कुछ का उपयोग मूल उद्देश्य से भिन्न कार्यों के लिए किया जा रहा था।

नासिक नगर निगम और राजस्व विभाग की जांच में पाया गया कि कई चर्च परिसरों में अवैध निर्माण हुए थे। कुछ मामलों में भूमि रिकॉर्ड में हेराफेरी की शिकायतें भी मिलीं। विशेष रूप से चिंताजनक यह था कि औपनिवेशिक काल में प्राप्त कुछ संपत्तियों के स्वामित्व दस्तावेज अस्पष्ट या विवादित थे।

इस प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसी भूमि के एक हिस्से पर वर्षों तक नासिक पुलिस आयुक्तालय लीज़ के आधार पर संचालित होता रहा। जांच एजेंसियों का आरोप है कि सरकार ने ऐसे पक्षों को भी किराया दिया जिनके वैध स्वामित्व पर बाद में विवाद उत्पन्न हुआ। इस मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने 37 व्यक्तियों के विरुद्ध धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक षड्यंत्र सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया है।

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स्थानीय निवासियों और सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया कि प्रमुख भूखंडों पर कब्जा करके उन्हें या तो निष्क्रिय रखा गया है या उनका दुरुपयोग हो रहा है, जबकि शहर को विकास के लिए भूमि की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इन शिकायतों के बाद प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की।

नासिक के प्रकरण के बाद महाराष्ट्र सरकार ने राज्य भर में चर्चों और मिशनरी संस्थाओं की भूमि का व्यापक सर्वेक्षण करने का निर्णय लिया। राजस्व विभाग को निर्देश दिए गए कि वे सभी जिलों में ऐसी संपत्तियों की पहचान करें और उनके उपयोग का सत्यापन करें। सरकार ने घोषणा की है कि तीन माह के भीतर पूरे राज्य में चर्चों और मिशनरी संस्थाओं की भूमि के स्वामित्व, उपयोग और हस्तांतरण की जांच पूरी की जाएगी। राज्य सरकार के आदेश में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु शामिल थे:

सभी धार्मिक संस्थाओं, विशेष रूप से चर्चों और मिशनरी संगठनों की भूमि का संपूर्ण रिकॉर्ड तैयार किया जाए। प्रत्येक संपत्ति के मूल आवंटन या खरीद के उद्देश्य का सत्यापन किया जाए। वर्तमान में भूमि का वास्तविक उपयोग क्या हो रहा है, इसकी जांच की जाए। किसी भी प्रकार के अवैध हस्तांतरण, अतिक्रमण या दुरुपयोग की पहचान की जाए।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई किसी धर्म विशेष के विरुद्ध नहीं है, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति के सही उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए है। राज्य के कई शहरों में जिला प्रशासन ने सर्वेक्षण शुरू कर दिया है। मुंबई, पुणे, नागपुर, औरंगाबाद, नंदगांव सहित राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी संपत्तियों की पहचान की जा रही है। प्रारंभिक रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि कई स्थानों पर भूमि के दुरुपयोग के मामले सामने आ सकते हैं।

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नासिक का प्रकरण अकेला नहीं है। देश के विभिन्न राज्यों से चर्च और मिशनरी संपत्तियों से जुड़े विवाद समय समय पर सामने आते रहे हैं। यह समस्या राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक है और इसकी जड़ें ऐतिहासिक हैं। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश सरकार ने मिशनरी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया और उन्हें बड़े पैमाने पर भूमि आवंटित की। स्वतंत्रता के बाद भी इन संस्थाओं ने अपनी संपत्तियां बरकरार रखीं। कई मामलों में यह भूमि शहरों के केंद्रीय और मूल्यवान क्षेत्रों में स्थित है।

गोवा में चर्च संपत्तियों को लेकर कई विवाद हुए हैं। राज्य के कुछ हिस्सों में विशाल भूखंड पर चर्चों का नियंत्रण है, जिनका उपयोग मूल उद्देश्यों से भिन्न तरीके से होने के आरोप लगते रहे हैं। केरल में मिशनरी संस्थाओं के पास हजारों एकड़ भूमि है। कुछ मामलों में इस भूमि पर व्यावसायिक गतिविधियां चलाने के आरोप लगे हैं, जबकि इसे धर्मार्थ या शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए प्राप्त किया गया था।

तमिलनाडु में भी चर्च संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर प्रश्न उठे हैं। कुछ संपत्तियों के स्वामित्व को लेकर स्थानीय समुदायों और चर्च प्रशासन के बीच विवाद हुए हैं। उत्तर पूर्व के राज्यों में मिशनरी संस्थाओं का भूमि पर व्यापक नियंत्रण है। कुछ आलोचकों का कहना है कि यह स्थानीय संस्कृति और परंपराओं पर प्रभाव डालता है। चर्च और मिशनरी संपत्तियों से जुड़े घोटालों के कई आयाम हैं:

कई स्थानों पर धर्मार्थ या शैक्षणिक उद्देश्यों के नाम पर रियायती दरों या अनुदान में प्राप्त भूमि का व्यावसायिक उपयोग होने के मामले सामने आए हैं। होटल, रेस्टोरेंट, पार्किंग और अन्य लाभकारी गतिविधियां चलाने के आरोप लगते रहे हैं।

कुछ मामलों में संपत्तियों का अवैध हस्तांतरण या बिक्री की खबरें आई हैं। भूमि रिकॉर्ड में हेराफेरी करके स्वामित्व बदलने के आरोप भी लगे हैं। इससे सार्वजनिक संपत्ति निजी हाथों में चली जाती है।

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कई संस्थाएं संपत्ति कर से छूट का दावा करती हैं, जबकि उनका उपयोग व्यावसायिक रूप से होता है। यह राज्य के राजस्व को नुकसान पहुंचाता है। विशाल भूखंड बिना किसी सार्थक उपयोग के निष्क्रिय पड़े हैं। विकासशील शहरों में यह गंभीर समस्या है जहां भूमि की कमी है।

महाराष्ट्र सरकार के कदम सराहनीय हैं, लेकिन यह समस्या राज्य की सीमाओं से परे है। राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रशासनिक परीक्षण की आवश्यकता के कई कारण हैं: सभी धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों का देशव्यापी डेटाबेस बनाना आवश्यक है। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और दुरुपयोग रोका जा सकेगा। आधुनिक तकनीक का उपयोग करके डिजिटल रिकॉर्ड बनाए जा सकते हैं।

यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जिस उद्देश्य के लिए भूमि दी गई या खरीदी गई थी, उसी के लिए उपयोग हो रहा है। यदि उद्देश्य बदला गया है तो उचित अनुमति ली गई है या नहीं, इसकी जांच होनी चाहिए। सार्वजनिक संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि रियायती या अनुदानित भूमि का दुरुपयोग हो रहा है तो कार्रवाई होनी चाहिए।

जांच से राज्यों को अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है। अवैध या अनुचित उपयोग पर कर लगाया जा सकता है। कानून के समक्ष सभी धार्मिक संस्थाएं बराबर हैं। यदि हिंदू मंदिरों की संपत्तियां सरकारी नियंत्रण में हैं, तो अन्य धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों की भी जांच उचित है।

नासिक चर्च विवाद एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाता है जो राष्ट्रीय ध्यान की मांग करता है। महाराष्ट्र सरकार का निर्णय अन्य राज्यों के लिए एक मॉडल हो सकता है। धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों की जांच धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के सही उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए है। सभी धर्मों को सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन किसी भी संस्था को कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए। सार्वजनिक संपत्ति का दुरुपयोग, चाहे किसी भी नाम पर हो, अस्वीकार्य है।