87.58 फीसद हिन्दू जनसंख्या वाले तमिलनाडु में गाय काटी जाती रहेंगी! अभिषेक मनु सिंघवी के तर्क और न्यायालय

अब हिन्दू समाज अपनी कितनी भी आस्था गोमाता पर क्यों न रख ले, आखिर हे तो वह चौपाया ही, फिर वह भी अन्यों की तरह दुधारू जो भी हैं, कटने के लिए ही बनी है! क्योंकि आप एक हिन्दू राष्ट्र में नहीं रहते, आप वहां रहते हैं, जोकि धर्म निरपेक्ष कहलाता है, इससे क्या फर्क पड़ता है कि आपका धर्म गाय को सभी देवताओं का निवासी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रकृति का वह अनुपम उपहार मानता है; उनके लिए तो वह एक पशु है और फिर पशु तो कटने के लिए ही पैदा होते हैं।
यह भी तो एक सत्य पक्ष है कि उनके लिए गाय यानी मांस, मज्जा, खून, अस्थियों के साथ चमड़े का वह लाभ है, जिसमें रुपया ही रुपया है, फिर हिन्दू उसे पूजते हैं, ऐसे में उसको मारने से गर्वोन्नति भी तो होती है! आज वैसे तो यह देश के कई राज्यों की स्थिति है, लेकिन तमिलनाडु के इससे जुड़े आंकड़े वास्तव में गंभीर चिंतन करने के लिए विवश करते हैं।
कारण स्पष्ट हैं, 2011 की जनगणना के आंकड़ों से तमिलनाडु में हिन्दू धर्म सबसे बड़ा धर्म है, जिसकी कुल आबादी 87.58% (लगभग 6.31 करोड़ लोग) है। इसके बाद राज्य में दूसरी सबसे बड़ी आबादी ईसाई मत की है जो कुल जनसंख्या का 6.12% (लगभग 44.18 लाख लोग) है और इसके ठीक बाद 5.86% (लगभग 42.29 लाख लोग) आबादी के साथ इस्लाम तीसरा रिलीजन है। इसके अलावा, राज्य में जैन मत के अनुयायी 0.12% हैं, जबकि 0.32% लोग अन्य मतों से संबंधित हैं या जिन्होंने अपने धर्म की घोषणा नहीं की है।
इसके साथ एक ओर आंकड़ा भी देखिए; तमिलनाडु राज्य के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के नियंत्रण में 38,615 मंदिर हैं। हालाँकि, यदि ग्रामीण इलाकों के छोटे-बड़े, निजी, और स्थानीय देवताओं के मंदिरों को भी मिला लिया जाए, तो राज्य में कुल मंदिरों की संख्या 79,000 से अधिक हो जाती है। इनमें से लगभग 33,000 मंदिर 800 से लेकर 2,000 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, जिनमें से लगभग 68% मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं और बाकी भगवान विष्णु (पेरुमाल्ल), मुरुगन, और विभिन्न देवियों के हैं।
यह राज्य भारत के सबसे बड़े मंदिर परिसर श्री रंगनाथस्वामी मंदिर (श्रीरंगम) और चोल राजवंश द्वारा निर्मित यूनेस्को विश्व धरोहर बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर) जैसी भव्य और ऐतिहासिक संरचनाओं का घर है, यानी सनातन हिन्दू धर्म के जितने नियम एवं देव-पूजा विधान हैं, उन सभी का यहां पर्याप्त पालन होता है, किंतु फिर भी गाय काटी जा रही हैं, जिसे हिन्दू धर्म सबसे पवित्र मानता है!
सनातन धर्म में गाय (गौमाता) को लेकर यहां तक कहा गया है वह साक्षात देवत्व, ब्रह्मांडीय ऊर्जा और करुणा का प्रतीक है। ऋग्वेद में गाय को ‘अघन्या’ (जिसका वध कभी नहीं किया जाना चाहिए) और साक्षात विश्व की माता घोषित किया गया है।
“माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानां अमृतस्य नाभिः।
नम प्र वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट॥” (ऋग्वेद – 8.101.15)
अर्थात् गाय रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहन और अमृत का मुख्य केंद्र है। प्रत्येक विवेकशील मनुष्य को मैं यही उपदेश देता हूँ कि इस निष्पाप और निर्दोष गाय का वध कभी न करे। (ऋग्वेद संहिता, मण्डल 8, सूक्त 101, मंत्र 15, प्रकाशन एवं लेखक: गीताप्रेस गोरखपुर, ‘ऋग्वेद संहिता’, अनुवादक: श्रीराम शर्मा आचार्य / पं. जयदेव शर्मा।)
यजुर्वेद में भी गाय को ब्रह्मांड की सबसे अमूल्य और अतुलनीय संपत्ति के रूप में स्थापित किया गया है।मूल “गोस्तु मात्रा न विद्यते।” (यजुर्वेद – 23.48), कहो गया- संसार में गाय की उपयोगिता, पवित्रता और महत्ता की कोई तुलना या माप नहीं है; वह सर्वथा अनुपमेय (यजुर्वेद संहिता,अध्याय 23, मंत्र 48, गीताप्रेस गोरखपुर, ‘शुक्ल यजुर्वेद संहिता’, व्याख्याकार: महर्षि दयानन्द सरस्वती)
अथर्ववेद में गाय की ब्रह्मांडीय व्यापकताअथर्ववेद में गाय को सभी प्रकार के ऐश्वर्य और समृद्धि का आधार माना गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि गाय के दूध, घी और ऊर्जा से ही संपूर्ण संसार का भरण-पोषण होता है।मूल “धेनुः सदनं रयीणाम्।” (अथर्ववेद – 11.1.34), अर्थात, गाय समस्त भौतिक और आध्यात्मिक संपत्तियों तथा ऐश्वर्य का मूल निवास स्थान है।(अथर्ववेद संहिता, काण्ड 11, सूक्त 1, मंत्र 34, प्रकाशन: गीताप्रेस गोरखपुर, ‘अथर्ववेद संहिता’, अनुवादक: सातवलेकर जी / गीताप्रेस संपादन मंडल)
महाभारत में गौ-महिमा और देव-निवासमहाभारत के अनुशासनिपर्व में पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को गायों की उत्पत्ति, उनके धार्मिक महत्व और उनके शरीर में लक्ष्मी जी के वास की विस्तृत कथा सुनाई है-
“गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च।
गावो मे हृदये चापि गवां मध्ये वसाम्यहम्॥” (महाभारत – अनुशासन पर्व, 79.7)
अर्थ: गायें सदैव मेरे आगे रहें, गायें मेरे पीछे रहें, गायें मेरे हृदय में निवास करें और मैं सदैव गायों के मध्य में निवास करूँ (यह स्वयं भगवान का कथन है)।(महाभारत, सटीक- खंड 5, अनुशासन पर्व, अध्याय 79, श्लोक 7, पृष्ठ क्रमांक 5530-5531, प्रकाशन एवं लेखक: गीताप्रेस गोरखपुर, महर्षि वेदव्यास (मूल लेखक), अनुवादक: पं. रामनारायणदत्त शास्त्री पाण्डेय)
श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों (शक्तियों) का वर्णन करते हुए गायों में ‘कामधेनु’ को अपनी साक्षात विभूति बताया है।
“आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥” (गीता – 10.28)
अर्थ यह है कि मैं शस्त्रों में वज्र हूँ, गायों में कामनाओं को दुहने वाली ‘कामधेनु’ हूँ, (श्रीमद्भगवद्गीता, तत्त्वविवेचनी, अध्याय 10 विभूति योग, श्लोक 28, पृष्ठ क्रमांक 435, प्रकाशन एवं लेखक: गीताप्रेस गोरखपुर, टीकाकार: जयदयाल गोयन्का) इसी प्रकार से भी प्रमुख 18 पुराण एवं अन्य स्मृति ग्रंथों में गाय की अन्यान्य प्रकार से महिमा कही गई है। छान्दोग्य उपनिषद में ‘सत्यकाम जाबाल’ और गौ-सेवा से जुड़ी एक अत्यंत सुंदर कथा है, जहाँ आचार्य हारिद्रुमत गौतम अपने शिष्य सत्यकाम जाबाल को आत्मज्ञान की प्राप्ति से पूर्व 400 दुर्बल गायों की सेवा करने के लिए वन में भेजते हैं। सत्यकाम संकल्प लेता है कि जब तक ये गायें बढ़कर एक हजार नहीं हो जातीं, वह नहीं लौटेगा। गायों की सेवा करते-करते गायों और प्रकृति के माध्यम से ही उसे साक्षात ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है।(छान्दोग्य उपनिषद्, शाङ्करभाष्य सहित, चतुर्थ प्रपाठक,अध्याय 4, खण्ड 4 से 9, पृष्ठ क्रमांक 210-215)
इस तरह से देखें तो प्राचीन गायों की जय-जयकार करनेवाली अनेकों कहानियां हैं। अब आधुनिक समय है, विज्ञान आधारित व्यवस्था हालांकि पहले भी भारतीय समाज में रही, फिर भी कथित लोगों की कमी नहीं जो इस बात को स्वीकार्य नहीं करते हैं, इसलिए आधुनिक प्रमाण भी देख लेते हैं। वस्तुत: आधुनिक वैज्ञानिक, चिकित्सा और कृषि शोध (Modern Scientific Research) ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि गाय (विशेष रूप से भारतीय नस्ल की गाएं एक पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) और औषधीय औषधालय है। इसके दूध, मूत्र, गोबर और यहाँ तक कि इसकी शारीरिक ऊर्जा पर वैश्विक स्तर पर कई शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं।
ए-2 दूध (A2 Milk) बनाम ए-1 दूध: हृदय रोग और मधुमेह पर शोधआधुनिक डेयरी विज्ञान में गाय के दूध के प्रोटीन पर बहुत गहरा शोध हुआ है। भारतीय मूल की गायों के दूध में A2 बीटा-कैसीन (Beta-Casein) प्रोटीन पाया जाता है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अमृत के समान राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) और वैश्विक शोध अब तक हुए सभी शोध इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। किसी को कोई संदेह है तो वह A2 दूध के लाभ से संबंधित शोध पत्र- “Review of the Health Effects of A1 and A2 Beta-Casein Protein”, प्रोफेसर कीथ वूडफोर्ड की पुस्तक “Devil in the Milk” तथा European Journal of Clinical Nutrition (नॉटिंघम यूनिवर्सिटी प्रेस (UK), वर्ष 2007, संशोधित संस्करण 2009) देख सकते हैं।
थोड़ी देर के लिए दूध को छोडि़ए, हम गोमूत्र की बात करते हैं, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने गोमूत्र के एंटी-माइक्रोबियल, एंटी-कैंसर और ‘बायो-इन्हेंसर’ (औषधि की क्षमता बढ़ाने वाले) गुणों को लैब टेस्ट में प्रमाणित किया है।भारत के राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान और केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान ने संयुक्त शोध में पाया कि गोमूत्र डिस्टिलेट (गौ अर्क) कैंसर रोधी दवाओं और एंटीबायोटिक्स के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। इसके कारण दवाओं की कम खुराक से ही मरीज ठीक हो जाता है और कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट कम होते हैं। इस अनूठे गुण के लिए गोमूत्र को पेटेंट भी दिया जा चुका है।(पेटेंट संख्या: US Patent No. 6,410,059 और US Patent No. 6,896,907।संस्थान / आविष्कारक: वैज्ञानिक अनुसंधान और औद्योगिक परिषद (CSIR), शोधकर्ता: डॉ. रघुनथ अनंत माशेलकर और टीम, संयुक्त राज्य अमेरिका पेटेंट और ट्रेडमार्क कार्यालय (USPTO), वाशिंगटन डी.सी.)
इस तरह के अनेक आधुनिक शोध हैं जो अलग-अलग निष्कर्षों के माध्यम से मूल एक तथ्य को उजागर करते हैं, वह यही है कि गाय का गोबर, मूत्र, दूध, दही, घी सभी कुछ औषधीय है, वह मनुष्य जीवन के लिए अमृततुल्य है। कई शोध तो यह भी बताते हैं कि शरीर का काई भी रोग क्यों न हो, उन्हें अन्य औषधीय सेवन के साथ नियमित गाय का दूध, दही, घी, मूत्र एवं गोबर उपयोग करके जैसी चिकित्सकीय आवश्यकता हो, ठीक किया जा सकता है। यानी कि गाय यदि दूध देना भी बंद कर दे, तब भी उसका महत्व कम नहीं होता है, उसका गोबर एवं मूत्र ही बहुत लाभकारी है।
पर क्या करें, भारत हिन्दू राष्ट्र तो है नहीं कि गाय माता को मरने से बचा सकता। तर्क दिया जाता है कि गाय दूध नहीं दे रही, वध करने योग्य है और उसकी हत्या करने का क्रम बना रहता है। दरअसल, तमिलनाडु राज्य का सामने आया हाल का मामला आज बहुत दर्द दे रहा है। क्योंकि एक तो वहां 87 प्रतिशत से अधिक हिन्दू हैं। दूसरा यह कि भारत के सबसे भव्य एवं दिव्य मंदिर अधिकांशत: इसी राज्य में हैं।
पूरा मामला यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है जिसमें राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था कि बकरीद या किसी अन्य दिन राज्य में किसी भी गाय या बछड़े की हत्या न हो। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने तमिलनाडु सरकार की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया था। इस तरह से हाईकोर्ट ने मई 2026 में सरकार को राज्य में बकरीद या किसी भी दिन गाय और बछड़ों की हत्या या कुर्बानी पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करने का आदेश दिया था। साथ ही उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि बकरीद पर गोहत्या इस्लाम में कोई अनिवार्य मजहबी (धार्मिक) प्रथा नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी कर संबंधित पक्षों से जवाब भी मांगा था।
इसके बाद राज्य सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर गई, अब उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया मद्रास हाईकोर्ट के फैसले का अंतिम हिस्सा, जिसमें पूरे राज्य में गाय और बछड़े के वध पर पूर्ण रोक लगाई गई थी, उसमें सुधार की आवश्यकता दिखाई देती है। इसी आधार पर कोर्ट ने फिलहाल उस हिस्से के अमल पर रोक लगा दी। सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा था। उन्होने दलील दी कि मद्रास हाईकोर्ट का आदेश राज्य के तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 के विपरीत है। इस कानून के तहत 10 साल से ज्यादा उम्र की ऐसी गायों, जो काम करने या प्रजनन के योग्य नहीं हैं, उनका सक्षम अधिकारी के प्रमाण-पत्र के आधार पर वध किया जा सकता है।
अभिषेक मनु सिंघवी ने यह भी कहा कि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, स्लॉटर हाउस नियम, 2001, तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय अधिनियम, 1998 और संबंधित नियम पशुओं के वध को नियंत्रित करते हैं, लेकिन इनमें कहीं भी पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान नहीं है, ऐसे में हाईकोर्ट ने वैधानिक प्रावधानों के विपरीत जाकर आदेश दिया है।
अब सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद मामले की आगे सुनवाई होगी। अंतिम फैसला आने तक मद्रास हाईकोर्ट द्वारा लगाया गया राज्यव्यापी पूर्ण प्रतिबंध प्रभावी नहीं रहेगा। यानी की जो राज्य हिन्दू बहुल है, जहां सबसे अधिक मंदिर हैं, गो पूजक हैं, वह भी गाय को अपनी आंखों के सामने कटने से नहीं रोक सकेंगे!
गाय मरती रहेंगीं, बहुसंख्यक हिन्दुओं के देश में, पहले इस्लामिक आक्रान्ता और चर्च को गाय का मांस-चमड़ा चाहिए था, अब स्वतंत्र भारत में धर्मनिरपेक्षता को गाय की हत्या प्यारी है! और बहुसंख्यक हिन्दू, पहले की तरह मौन, अपने काम में व्यस्त! उसकी बला से एक गाय कटे या हजार, क्या फर्क पड़ता है? वह तो जब पंडित जी बताएंगे गो-दान तब किसी गाय की पूंछ पकड़ ली जाएगी, कुछ दान दे दिया जाएगा, फिर हमें अपने बच्चे, मित्र, सुख-सुविधाएं भी तो देखनी हैं, मरती हैं तो मरती रहें गाएं…!!!

