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लुटेरों का नया अवतार अदृश्य साइबर ठग

आचार्य ललित मुनि

सुबह की शुरुआत चाय और अखबार से होती है। ग्वालियर में साइबर ठगी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें 70 वर्षीय उद्योगपति अशोक विजयवर्गीय से डिजिटल निवेश और भारी मुनाफे का झांसा देकर 21 करोड़ 6 लाख रुपये ठग लिए गए। साइबर अपराधियों ने सोशल मीडिया के माध्यम से संपर्क कर उन्हें फर्जी निवेश योजना में फंसाया और धीरे धीरे पूरी राशि अपने खातों में स्थानांतरित करा ली।

लगभग हर दिन किसी न किसी समाचार में पढ़ने को मिलता है कि किसी से लाखों रुपये की ऑनलाइन ठगी हो गई। कहीं किसी से डिजिटल हाउस अरेस्ट के नाम पर करोड़ों रुपये ऐंठ लिए गए, कहीं बैंक अधिकारी बनकर खाते खाली कर दिए गए, तो कहीं निवेश के नाम पर जीवन भर की कमाई लूट ली गई। आश्चर्य की बात यह है कि इन घटनाओं की निरंतर चर्चा होने के बाद भी ठगी की संख्या कम नहीं हो रही है। प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है।

इसका उत्तर केवल तकनीक में नहीं, बल्कि मनुष्य के मनोविज्ञान में छिपा है। साइबर अपराधी कंप्यूटर से पहले मानव मस्तिष्क को हैक करते हैं। वे जानते हैं कि किस प्रकार भय, लालच, भरोसा और जल्दबाजी का लाभ उठाकर किसी भी व्यक्ति से उसकी मेहनत की कमाई निकलवाई जा सकती है।

भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यूपीआई भुगतान, इंटरनेट बैंकिंग, ऑनलाइन खरीदारी और डिजिटल सेवाओं ने जीवन को सरल बनाया है। लेकिन सुविधा के साथ खतरे भी बढ़े हैं। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर प्रतिदिन हजारों शिकायतें दर्ज होती हैं। करोड़ों रुपये की ठगी हर महीने सामने आती है। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक घटनाओं की संख्या इससे कहीं अधिक है, क्योंकि बहुत से लोग सामाजिक संकोच या निराशा के कारण शिकायत तक नहीं करते।

पिछले कुछ वर्षों में साइबर अपराधियों ने ठगी के ऐसे नए तरीके विकसित किए हैं, जिनकी कल्पना भी कुछ वर्ष पहले कठिन थी। इनमें सबसे चर्चित तरीका है डिजिटल हाउस अरेस्ट। इस ठगी में अपराधी स्वयं को सीबीआई, पुलिस, प्रवर्तन निदेशालय, नारकोटिक्स ब्यूरो या दूरसंचार विभाग का अधिकारी बताकर फोन करते हैं। वे कहते हैं कि आपके आधार कार्ड से अपराध हुआ है, आपके बैंक खाते का उपयोग धन शोधन में हुआ है या आपके नाम से अवैध सिम कार्ड जारी हुआ है। इसके बाद व्यक्ति को वीडियो कॉल पर जोड़ा जाता है। कई बार नकली पुलिस वर्दी, सरकारी कार्यालय जैसे कमरे और फर्जी पहचान पत्र भी दिखाए जाते हैं ताकि सामने वाले को विश्वास हो जाए।

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इसके बाद पीड़ित को कहा जाता है कि वह किसी से बात न करे। उसे घर से बाहर न निकलने और लगातार वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए कहा जाता है। यही स्थिति डिजिटल हाउस अरेस्ट कहलाती है। फिर जांच के नाम पर बैंक खातों का विवरण लिया जाता है और धन को तथाकथित सुरक्षित खाते में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया जाता है। जब तक व्यक्ति को सच्चाई समझ आती है, तब तक उसकी जीवन भर की जमा पूंजी अपराधियों के खातों में पहुंच चुकी होती है।

कुछ समय पहले देश के अनेक शहरों में ऐसे मामले सामने आए, जिनमें चिकित्सकों, प्रोफेसरों, सेवानिवृत्त अधिकारियों और व्यवसायियों से करोड़ों रुपये इसी तरीके से ठग लिए गए। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि साइबर अपराध केवल कम शिक्षित लोगों की समस्या नहीं है। उच्च शिक्षित और अनुभवी लोग भी भय तथा मानसिक दबाव में गलत निर्णय ले सकते हैं।

एक अन्य सामान्य तरीका बैंक अधिकारी बनकर फोन करना है। अपराधी कहते हैं कि आपका केवाईसी पूरा नहीं हुआ है, आपका एटीएम बंद हो जाएगा या आपका बैंक खाता निष्क्रिय होने वाला है। इसके बाद वे ओटीपी, कार्ड संख्या, सीवीवी अथवा यूपीआई पिन पूछते हैं। जैसे ही व्यक्ति जानकारी साझा करता है, खाते से धन निकल जाता है।

आजकल निवेश के नाम पर भी बड़े पैमाने पर ठगी हो रही है। सोशल मीडिया पर आकर्षक विज्ञापन दिखाई देते हैं जिनमें कुछ दिनों में दोगुना या तीन गुना लाभ देने का दावा किया जाता है। प्रारंभ में अपराधी थोड़ी राशि पर नकली लाभ दिखाकर विश्वास जीतते हैं। जब व्यक्ति बड़ी राशि निवेश करता है, तब पूरा मंच ही गायब हो जाता है।

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रोजगार के नाम पर भी बड़ी संख्या में लोग ठगे जा रहे हैं। घर बैठे काम करने, वीडियो लाइक करने, होटल की रेटिंग देने या सोशल मीडिया पर छोटे छोटे कार्य करने के बदले हजारों रुपये प्रतिदिन कमाने का लालच दिया जाता है। पहले कुछ रुपये देकर भरोसा बनाया जाता है और बाद में सुरक्षा राशि या निवेश के नाम पर लाखों रुपये ठग लिए जाते हैं।

क्यूआर कोड भी ठगी का एक बड़ा माध्यम बन गया है। बहुत से लोग यह नहीं जानते कि क्यूआर कोड स्कैन करने से पैसा प्राप्त नहीं होता बल्कि भुगतान भी हो सकता है। अपराधी कहते हैं कि पुरस्कार राशि लेने या सामान का भुगतान पाने के लिए क्यूआर कोड स्कैन करें। जैसे ही व्यक्ति ऐसा करता है, उसके खाते से धन निकल जाता है।

ओटीपी साझा करने की गलती आज भी सबसे अधिक होती है। बैंक और सरकारी संस्थाएं बार बार चेतावनी देती हैं कि ओटीपी किसी को न बताएं, फिर भी लोग विश्वास करके यह जानकारी दे देते हैं। याद रखना चाहिए कि कोई भी बैंक, रिजर्व बैंक, पुलिस या सरकारी विभाग कभी फोन करके ओटीपी या यूपीआई पिन नहीं मांगता।

अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग भी तेजी से बढ़ रहा है। अपराधी किसी व्यक्ति की आवाज की रिकॉर्डिंग लेकर उसी जैसी आवाज तैयार कर लेते हैं। इसके बाद परिवार के सदस्य को फोन करके कहते हैं कि मैं संकट में हूं, तुरंत पैसे भेजो। कई मामलों में लोग अपने परिचित की आवाज पहचानकर तुरंत धन भेज देते हैं और बाद में पता चलता है कि वह आवाज कृत्रिम रूप से बनाई गई थी।

इन घटनाओं के बावजूद लोग ठगी का शिकार क्यों हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि अपराधी व्यक्ति को सोचने का समय ही नहीं देते। वे भय पैदा करते हैं, जल्दबाजी कराते हैं और बार बार कहते हैं कि यदि अभी निर्णय नहीं लिया तो गिरफ्तारी हो जाएगी, बैंक खाता बंद हो जाएगा या कानूनी कार्रवाई होगी। भय की स्थिति में मनुष्य का विवेक कमजोर पड़ जाता है।

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दूसरा कारण लालच है। जब बिना मेहनत के अधिक लाभ का वादा किया जाता है तो अनेक लोग जोखिम उठा लेते हैं। यह भूल जाते हैं कि यदि कोई योजना सचमुच इतनी लाभकारी होती तो उसे व्यक्तिगत संदेश भेजकर नहीं बेचा जाता।

तीसरा कारण डिजिटल साक्षरता का अभाव है। स्मार्टफोन का उपयोग करना और साइबर सुरक्षा समझना दोनों अलग बातें हैं। करोड़ों लोग डिजिटल भुगतान तो कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सुरक्षा के मूल नियमों की जानकारी नहीं है।

इस चुनौती से निपटने के लिए केवल सरकार और पुलिस पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। प्रत्येक नागरिक को स्वयं साइबर सुरक्षा का प्रहरी बनना होगा। किसी भी अनजान फोन पर विश्वास करने से पहले संबंधित संस्था के आधिकारिक नंबर पर संपर्क करें। किसी भी लिंक पर क्लिक करने से पहले उसकी सत्यता जांचें। ओटीपी, यूपीआई पिन, सीवीवी और पासवर्ड कभी साझा न करें। स्क्रीन शेयर करने वाले किसी भी अनुप्रयोग को अनजान व्यक्ति के कहने पर डाउनलोड न करें। परिवार के बुजुर्गों और बच्चों को भी इन खतरों के बारे में नियमित रूप से जानकारी दें।

यदि दुर्भाग्यवश ठगी हो जाए तो शर्म या संकोच के कारण चुप न रहें। तुरंत अपने बैंक को सूचना दें, राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराएं। प्रारंभिक समय में सूचना मिलने पर कई मामलों में धन को रोका भी जा सकता है। आज का सबसे बड़ा साइबर सुरक्षा मंत्र यही है कि किसी भी अनजान संदेश, फोन या लालच पर तुरंत विश्वास न करें, पहले सत्यापन करें और फिर निर्णय लें। यही जागरूकता ऑनलाइन ठगी के बढ़ते जाल से समाज की सबसे प्रभावी रक्षा कर सकती है।