समान नागरिक संहिता क्यों है आज के भारत की आवश्यकता?

भारत एक ऐसा देश है जहां अनेक सम्प्रदाय, भाषाएं, परंपराएं और सामाजिक रीतिरिवाज सदियों से साथ साथ चलती रही हैं। इन विविधताओं के साथ सांस्कृतिक एकता भारत की पहचान है, परंतु एक ऐसा विषय भी है जो पिछले सात दशकों से देश की राजनीति, न्यायपालिका और समाज में बहस का केंद्र बना हुआ है। यह विषय है समान नागरिक संहिता, जिसे अंग्रेजी में Uniform Civil Code कहा जाता है।
संविधान निर्माताओं ने इस विचार को अनुच्छेद 44 के अंतर्गत राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल किया था, जिसमें कहा गया है कि राज्य पूरे भारत के क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। आज जब भारत विकास की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है और जनसंख्या बढ़ रही है, तब यह प्रश्न फिर से प्रासंगिक हो गया है कि क्या समान नागरिक संहिता वास्तव में देश की एकता, समानता और न्याय के लिए आवश्यक है।
समान नागरिक संहिता का अर्थ है विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और भरणपोषण जैसे व्यक्तिगत मामलों के लिए सभी नागरिकों पर एक समान कानून लागू करना, चाहे उनका धर्म और सम्प्रदाय कोई भी हो। वर्तमान में भारत में हिंदू विवाह अधिनियम, मुस्लिम व्यक्तिगत कानून, ईसाई विवाह अधिनियम और पारसी विवाह तथा तलाक अधिनियम जैसे अलग अलग कानून प्रचलित हैं। यह व्यवस्था औपनिवेशिक काल से चली आ रही है, जब अंग्रेजी शासन ने विभिन्न समुदायों के धार्मिक रीतिरिवाजों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई थी। स्वतंत्रता के बाद भी यह व्यवस्था काफी हद तक जस की तस बनी रही।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि समान नागरिक संहिता का विचार कोई नई राजनीतिक उपज नहीं है। संविधान सभा में डॉ भीमराव आंबेडकर ने स्वयं इस विषय पर विस्तृत चर्चा की थी। उनका मानना था कि एक आधुनिक राष्ट्र के नागरिकों के बीच व्यक्तिगत कानूनों में भेद रहना दीर्घकाल में राष्ट्रीय एकता के लिए उचित नहीं है। हालांकि उस समय सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए इसे तत्काल अनिवार्य न बनाकर निदेशक तत्वों में रखा गया, ताकि समय के साथ समाज में इसकी स्वीकार्यता बने और राज्य उचित समय पर इसे लागू कर सके।
समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता का प्रश्न। वर्तमान व्यक्तिगत कानूनों की व्यवस्था में विभिन्न समुदायों की महिलाओं को विवाह, तलाक, संपत्ति में उत्तराधिकार और भरणपोषण के मामलों में अलग अलग और कई बार असमान अधिकार प्राप्त हैं। शाहबानो मामला इस बहस का एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। 1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक वृद्ध मुस्लिम महिला के भरणपोषण के अधिकार को मान्यता दी थी, परंतु बाद में संसद द्वारा पारित कानून से इस निर्णय का प्रभाव सीमित कर दिया गया।
इसी प्रकार22 अगस्त 2017 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में ‘तत्काल तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) की प्रथा को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया था, जो यह दर्शाता है कि न्यायपालिका बार-बार लैंगिक न्याय की दिशा में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करती रही है। समान नागरिक संहिता के समर्थकों का तर्क है कि जब तक अलग अलग व्यक्तिगत कानून बने रहेंगे, तब तक महिलाओं को समान अधिकार दिलाना कठिन बना रहेगा, चाहे वे किसी भी धर्म से संबंधित हों।
समान नागरिक संहिता के पक्षधरों का मानना है कि जब सभी नागरिकों पर एक ही कानून लागू होगा, तो इससे धार्मिक पहचान के आधार पर बनी दूरियां कम होंगी और नागरिकों के बीच बंधुत्व की भावना मजबूत होगी। वर्तमान व्यवस्था में विवाह और तलाक जैसे मामलों में अलग अलग कानून होने के कारण कई बार यह भावना पैदा होती है कि कानून के समक्ष सभी नागरिक समान नहीं हैं, जबकि संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। इस दृष्टि से समान नागरिक संहिता को संविधान की मूल भावना के अनुरूप एक कदम के रूप में देखा जाता है।
एक और महत्वपूर्ण पक्ष है न्यायिक प्रक्रिया का सरलीकरण। वर्तमान में विभिन्न समुदायों के लिए अलग अलग व्यक्तिगत कानून होने के कारण न्यायालयों में मामलों की सुनवाई जटिल हो जाती है, विशेषकर अंतरधार्मिक विवाह, गोद लेने और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में। जब पति और पत्नी अलग अलग धर्मों से संबंधित होते हैं, तो यह तय करना कठिन हो जाता है कि किस कानून के तहत मामले का निपटारा किया जाए। समान नागरिक संहिता लागू होने से यह जटिलता समाप्त हो सकती है और न्यायपालिका पर पड़ने वाला अनावश्यक बोझ भी कम हो सकता है, जिससे मामलों का निपटारा अधिक तीव्र गति से हो सकेगा।
भारत में गोवा राज्य एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करता है जहां पुर्तगाली शासन काल से चली आ रही समान नागरिक संहिता आज भी लागू है। गोवा में सभी धर्मों के नागरिकों पर विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से संबंधित एक समान कानून लागू होता है। यह उदाहरण इस बात का प्रमाण माना जाता है कि भारत में समान नागरिक संहिता को लागू करना असंभव नहीं है, बल्कि यह एक व्यावहारिक और स्थायी व्यवस्था बन सकती है। गोवा मॉडल का अध्ययन अक्सर उन नीति निर्माताओं द्वारा किया जाता है जो पूरे देश में इसे लागू करने की दिशा में सोच रहे हैं।
विश्व के अनेक देशों में पहले से ही समान नागरिक कानून लागू हैं। फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका, तुर्की, इंडोनेशिया और अनेक यूरोपीय देशों में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के मामलों में धर्म के आधार पर भेद नहीं किया जाता। तुर्की का उदाहरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहां बीसवीं सदी के आरंभ में ही धार्मिक आधार पर बने पारिवारिक कानूनों को समाप्त करके एक समान नागरिक संहिता अपनाई गई थी। यह दर्शाता है कि बहुधार्मिक और विविधतापूर्ण समाजों में भी समान कानून व्यवस्था संभव है, और इससे राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया को बल मिलता है इसलिए भारत में अब समान नागरिक संहिता भी लागु करनी चाहिए।

