तंबूरा मौन हुआ, पर कथा अमर रहेगी

छत्तीसगढ़ की माटी ने अनेक कलाकारों को जन्म दिया, जिन्होंने अपनी साधना से लोकजीवन की स्मृतियों को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा। इन्हीं में एक नाम ऐसा है, जो धीरे धीरे पंडवानी का पर्याय बन गया। वह नाम था तीजन बाई। तीजन बाई का नाम मैंने पहली बार 1985 के पेरिस में हुए ‘फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ में टीवी प्रसारण में देखा और सुना था। उन्होंने इस महोत्सव में अपनी अद्भुत प्रस्तुति दी थी। यहीं से उनकी कला और पंडवानी को पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच और वैश्विक पहचान मिली।
सुबह उठते ही उनके निधन का समाचार मिला तो उनका पंडवानी गायन मेरी आंखों के सामने चलचित्र सा तैर गया। उनका निधन केवल एक लोक कलाकार गोलोकधाम जाना नहीं है, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति के उस विराट अध्याय का अवसान है, जिसमें संघर्ष भी था, स्वाभिमान भी, परंपरा भी और अपनी कला को दुनिया के सामने स्थापित करने का अदम्य साहस भी।
तीजन बाई की जीवन यात्रा साधारण परिस्थितियों से निकलकर असाधारण ऊंचाइयों तक पहुंचने की कथा है। उन्होंने तेरह वर्ष की आयु में मंचीय प्रस्तुति आरंभ की और उस समय प्रचलित सीमाओं को चुनौती देते हुए पंडवानी की कापालिक शैली को अपनाया। वे खड़े होकर, पूरे शरीर की अभिनय क्षमता और बुलंद स्वर के साथ महाभारत की कथा प्रस्तुत करती थीं। यह उस दौर में एक महिला कलाकार के लिए असाधारण कदम था।
तीजन बाई को सुनना केवल गायन सुनना नहीं था। वह एक ऐसा अनुभव था जिसमें श्रोता धीरे धीरे महाभारत के कथा संसार में प्रवेश करता चला जाता था। उनके हाथ में तंबूरा रहता था, लेकिन प्रस्तुति के दौरान वही तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी दुशासन के अहंकार को चुनौती देता प्रतीक और कभी किसी असहाय पात्र की वेदना का सहारा बन जाता।
यही तीजन बाई की कला की सबसे बड़ी विशेषता थी। मंच पर उनके साथ बहुत अधिक साधन नहीं होते थे। भव्य दृश्य संयोजन नहीं था, महंगे उपकरण नहीं थे, पात्रों की बड़ी टोली भी नहीं थी। एक कलाकार, एक तंबूरा, कुछ संगतकार और महाभारत की विराट कथा। इतने भर से वे पूरा संसार रच देती थीं।
उनकी आंखों की चमक, चेहरे के बदलते भाव, हाथों की गति, स्वर का आरोह अवरोह और संवाद की नाटकीयता मिलकर ऐसा प्रभाव उत्पन्न करते थे कि श्रोता भूल जाता था कि उसके सामने केवल एक कलाकार कथा सुना रही है। कभी लगता था कि भीम स्वयं युद्धभूमि में खड़े हैं, कभी द्रौपदी का अपमान आंखों के सामने घटित होता दिखाई देता था और कभी कुरुक्षेत्र का पूरा तनाव मंच पर उतर आता था।
पंडवानी छत्तीसगढ़ के लोकमानस में पीढ़ियों से प्रवाहित होती रही है। महाभारत की कथा जब लोक में उतरती है तो वह केवल राजवंशों के संघर्ष की कथा नहीं रहती। उसमें गांव का जीवन प्रवेश कर जाता है। उसमें किसान की पीड़ा, स्त्री की वेदना, अन्याय के विरुद्ध आक्रोश और सामान्य मनुष्य की आशाएं शामिल हो जाती हैं। तीजन बाई ने इसी लोक महाभारत को अपना स्वर दिया।
उनकी प्रस्तुति में भीम केवल महाभारत का पात्र नहीं था। वह अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाली शक्ति का प्रतीक था। द्रौपदी केवल एक पौराणिक पात्र नहीं थी, बल्कि अपमान और अन्याय का सामना करती स्त्री की आवाज थी। कृष्ण केवल देवता नहीं थे, बल्कि संकट में रास्ता खोजने वाली लोकबुद्धि के प्रतिनिधि बन जाते थे।
यही कारण था कि तीजन बाई की पंडवानी भाषा की सीमाओं को पार कर गई। जिन देशों के दर्शक छत्तीसगढ़ी या हिंदी नहीं जानते थे, वे भी उनके चेहरे, स्वर, अभिनय और भाव भंगिमाओं के माध्यम से कथा के भीतर प्रवेश कर जाते थे। उनकी कला ने पंडवानी और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।
तीजन बाई का जीवन भारतीय लोक कलाकारों के संघर्ष की कहानी भी कहता है। लोक कलाकारों की दुनिया में प्रसिद्धि का रास्ता आसान नहीं होता। वहां संसाधन कम होते हैं और संघर्ष अधिक। कलाकार को अपनी कला के साथ जीवन की कठिन परिस्थितियों से भी लड़ना पड़ता है। तीजन बाई ने इन संघर्षों के बीच अपनी कला साधना को कभी कमजोर नहीं होने दिया।
उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे उच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों ने उनकी कला साधना को मान्यता दी। लेकिन इन सम्मानों का वास्तविक महत्व इस बात में है कि इनके माध्यम से भारतीय लोककला और छत्तीसगढ़ की पंडवानी परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर वह प्रतिष्ठा मिली जिसकी वह अधिकारी थी।
तीजन बाई का व्यक्तित्व यह भी बताता है कि किसी कलाकार की महानता उसकी प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने की क्षमता से तय होती है। दुनिया के बड़े मंचों पर सम्मान पाने के बाद भी उनके भीतर छत्तीसगढ़ की माटी की सहजता बनी रही। उनके स्वर में गांव की चौपाल थी, खेतों की सुगंध थी, लोकभाषा की मिठास थी और संघर्ष से उपजा आत्मविश्वास था।
छत्तीसगढ़ की माटी की उस बेटी ने दुनिया को बताया कि लोक की आवाज कमजोर नहीं होती। उसे केवल एक सच्चे साधक की आवश्यकता होती है। तीजन बाई ने उस आवाज को अपना कंठ दिया और पंडवानी को ऐसी ऊंचाई पर पहुंचाया जहां से उनका नाम कभी विस्मृत नहीं होगा। तीजन बाई चली गईं, लेकिन उनकी हुंकार अभी बाकी है। वह तंबूरे की टंकार में, महाभारत की कथा में, छत्तीसगढ़ की मिट्टी में और लोककला की स्मृतियों में सदैव सुनाई देती रहेगी।
विनम्र श्रद्धांजलि।

