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प्रकृति का ॠण और हमारा दायित्व – विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस विशेष

आचार्य ललित मुनि

विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस हर साल 28 जुलाई को मनाया जाता है, इसका मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, पृथ्वी के संतुलन को बनाए रखने और पर्यावरण को जलवायु परिवर्तन से बचाने के लिए वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है। भारत की भूमि अपनी जैव विविधता की दृष्टि से असाधारण रूप से समृद्ध है। पश्चिमी घाट, पूर्वी हिमालय, उत्तर पूर्व के वर्षावन और अंडमान निकोबार द्वीप समूह, ये चार ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ प्रकृति ने अपनी विविधता को सबसे उदारता से बिखेरा है। हजारों प्रकार के पुष्पीय पौधे, सैकड़ों प्रजातियों के पक्षी, दुर्लभ स्तनधारी और असंख्य कीट प्रजातियाँ इस भूमि की अनमोल धरोहर हैं।

लेकिन यह विरासत संकट में है। भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट 2021 बताती है कि देश में वन क्षेत्र कुल भूमि का मात्र 21.71 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय वन नीति 1988 में 33 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया था। यह 11 प्रतिशत का अंतर केवल एक आँकड़ा नहीं है, यह उन लाखों वृक्षों की अनुपस्थिति है जो कभी इस भूमि की साँस थे, जो मिट्टी को थामते थे, जो बादलों को बुलाते थे।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार देश की 70 प्रतिशत से अधिक नदियाँ किसी न किसी रूप में प्रदूषित हैं। गंगा जिसे हम माँ कहते हैं उसके 2,525 किलोमीटर के प्रवाह में कानपुर, वाराणसी, पटना और कोलकाता जैसे शहरों से निकलने वाले औद्योगिक कचरे और अनुपचारित सीवेज की मात्रा चिंताजनक स्तर पर है। यमुना दिल्ली के निकट इतनी प्रदूषित हो जाती है कि उसे नदी नहीं, एक मृत जलधारा कहना अधिक उचित होगा। साबरमती, दामोदर, कावेरी, गोदावरी, प्रत्येक नदी के किनारे औद्योगीकरण की वही कहानी दोहराई जा रही है।

स्वतंत्रता के बाद से भारत ने जो विकास यात्रा तय की वह अभूतपूर्व है। बाँध बने, कारखाने खड़े हुए, सड़कें फैलीं, शहर उगे। इस यात्रा के बिना न भूख मिटती, न गरीबी घटती। लेकिन इस यात्रा में एक मूल्य चुकाया गया जिसे हमने कभी ठीक से गिना नहीं।

पहली पंचवर्षीय योजना से लेकर आज तक बड़ी बाँध परियोजनाओं ने लाखों हेक्टेयर वन भूमि जलमग्न की। भाखड़ा नांगल, हीराकुड, नर्मदा पर बने सरदार सरोवर जैसी परियोजनाओं ने जहाँ एक ओर सिंचाई और बिजली दी, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समुदायों के विस्थापन और वनों के विनाश की दास्तान भी लिखी।

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खनन उद्योग का विस्तार भी इसी कहानी का एक अध्याय है। झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के खनिज समृद्ध क्षेत्रों में खनन ने रोजगार दिया, लेकिन साथ ही वनों की कटाई, जल स्रोतों का दूषण और मिट्टी की बर्बादी भी की। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार देश में अवैध खनन के कारण हर वर्ष हजारों हेक्टेयर भूमि का क्षरण होता है।

1730 में राजस्थान के खेजड़ली गाँव में जोधपुर के महाराजा के आदेश पर जब सैनिक खेजड़ी के पेड़ काटने आए, तो अमृता देवी बिश्नोई ने अपनी तीन बेटियों के साथ पेड़ों से लिपटकर जान दे दी। उनके बाद गाँव के 363 लोग एक एक करके पेड़ों से चिपकते गए और बलिदान देते गए। यह भारत के पर्यावरण इतिहास का सबसे मार्मिक अध्याय है जिसने “चिपको” की परंपरा को जन्म दिया। बिश्नोई समुदाय आज भी वन्यजीव संरक्षण का जीवंत उदाहरण है। राजस्थान के जोधपुर, बाड़मेर और नागौर जिलों में काले हिरण और कुरजाँ पक्षी इसी समुदाय की देखरेख में निर्भय विचरण करते हैं।

1973 में उत्तराखंड के रेणी गाँव में इसी परंपरा की पुनरावृत्ति हुई। गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने जब पेड़ों से लिपटकर ठेकेदारों को रोका तो वह केवल लकड़ी बचाने का प्रयास नहीं था। वह उस पूरी जीवन पद्धति की रक्षा थी जो इन वनों पर निर्भर थी। पहाड़ की महिला जानती है कि जंगल कटेगा तो पानी जाएगा, पानी जाएगा तो खेत जाएगा और खेत जाएगा तो घर जाएगा। इस आंदोलन ने 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बनवाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

केरल का साइलेंट वैली आंदोलन 1970 के दशक का एक और प्रेरक अध्याय है। पश्चिमी घाट के उस अद्वितीय वर्षावन को जब जलविद्युत परियोजना के लिए जलमग्न करने की योजना बनी, तो केरल शास्त्र साहित्य परिषद के नेतृत्व में इतना व्यापक जनांदोलन हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को परियोजना रद्द करनी पड़ी। आज साइलेंट वैली राष्ट्रीय उद्यान बनकर उन दुर्लभ प्रजातियों का आश्रय है जो अन्यत्र विलुप्त हो चुकी हैं।

विडंबना यह है कि जिस देश की संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण हजारों वर्षों से अंतर्निहित था, उसे आज उसी की याद दिलानी पड़ रही है। ऋग्वेद में वृक्षों की देवता के रूप में स्तुति है। तुलसी, पीपल और बरगद को पूजनीय मानने की परंपरा दरअसल पारिस्थितिकी विज्ञान का लोक रूप है। पीपल रात में भी ऑक्सीजन देता है, बरगद की जड़ें भूजल को संरक्षित करती हैं और तुलसी औषधीय गुणों से भरपूर है। हमारे पुरखे इसे जानते थे, इसीलिए उन्होंने इन्हें पूजनीय बनाया।

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राजस्थान में कुंड और बावड़ियों की परंपरा, महाराष्ट्र में पाणपोई, तमिलनाडु में एरी और हिमाचल में कुहल जैसी जल संरचनाएँ पारंपरिक जल प्रबंधन के वे श्रेष्ठ उदाहरण हैं जिन्हें आधुनिक जल विज्ञान भी सराहता है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के आदिवासी समुदायों में “सरना” परंपरा है जिसमें पवित्र वन क्षेत्र बनाए जाते हैं जहाँ किसी भी वृक्ष को काटना वर्जित है। मेघालय के खासी समुदाय के “लॉ खिंग्लेंग” यानी पवित्र वनों में जैव विविधता उन क्षेत्रों से कई गुना अधिक पाई जाती है जहाँ आधुनिक संरक्षण परियोजनाएँ चल रही हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि परंपरागत संरक्षण पद्धतियाँ कितनी प्रभावशाली हो सकती हैं।

दिल्ली की वायु गुणवत्ता प्रतिवर्ष सर्दियों में ऐसे स्तर पर पहुँच जाती है जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार देश के अनेक छोटे बड़े शहरों में वायु प्रदूषण निर्धारित मानकों से कई गुना अधिक है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है। हिमालय के ग्लेशियर जो उत्तर भारत की नदियों के स्रोत हैं, जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से सिकुड़ रहे हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्ययन के अनुसार 2000 से 2020 के बीच हिमालयी ग्लेशियरों ने अपना बड़ा हिस्सा खो दिया है। गंगोत्री, जो गंगा का उद्गम है, प्रतिवर्ष पीछे खिसकती जा रही है।

लेकिन भारत केवल संकट की कहानी नहीं है। प्रोजेक्ट टाइगर इस देश की सबसे बड़ी पर्यावरण सफलताओं में से एक है। 1973 में जब यह परियोजना शुरू हुई तब देश में बाघों की संख्या मात्र 1827 थी। 2022 की गणना के अनुसार यह संख्या बढ़कर 3167 हो गई। भारत के 53 बाघ अभयारण्य और 106 राष्ट्रीय उद्यान वन्यजीव संरक्षण की दिशा में देश की प्रतिबद्धता के प्रमाण हैं। गुजरात के गिर वन में एशियाई शेर का पुनरुत्थान, ओडिशा के भितरकनिका में खारे पानी के मगरमच्छ का संरक्षण, असम के काजीरंगा में एक सींग वाले गैंडे की बढ़ती संख्या, ये सब बताते हैं कि जब इरादा हो तो संरक्षण संभव है।

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भारत ने 2070 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का संकल्प एक महत्वाकांक्षी लेकिन आवश्यक लक्ष्य है। राजस्थान और गुजरात में सौर ऊर्जा परियोजनाएँ, तमिलनाडु और गुजरात में पवन ऊर्जा संयंत्र, उत्तराखंड और हिमाचल में लघु जलविद्युत परियोजनाएँ इस दिशा में उत्साहजनक प्रगति के संकेत हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 31 प्रतिशत आबादी शहरों में थी और 2050 तक यह 50 प्रतिशत से अधिक हो जाएगी। इस शहरीकरण की गति के साथ यदि हरित नियोजन नहीं हुआ तो हमारे महानगर रहने योग्य नहीं रहेंगे।

चेन्नई में 2015 की बाढ़ और 2019 का जल संकट, मुंबई में बार बार आने वाली विनाशकारी बाढ़, बेंगलुरु की झीलों का सिकुड़ना, ये सब अनियोजित शहरीकरण के दुष्परिणाम हैं। बेंगलुरु में एक समय 262 झीलें थीं जो आज घटकर 81 रह गई हैं। इन झीलों की जमीन पर कालोनियाँ और मॉल खड़े हो गए और जब मानसून आया तो पानी के जाने का रास्ता नहीं था। हैदराबाद की हुसैन सागर झील और अहमदाबाद की कांकरिया झील जैसे जल निकाय भी अतिक्रमण और प्रदूषण से जूझ रहे हैं।

इसके सामने पुडुचेरी का आरोविल एक उम्मीद की किरण है जहाँ बंजर भूमि पर 3000 एकड़ से अधिक का वन विकसित किया गया और भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार दर्ज हुआ। उत्तराखंड के टिहरी जिले के कुछ गाँवों में महिला मंगल दलों ने वन पंचायतों के माध्यम से जो वन पुनरुद्धार किया है वह भी एक प्रेरक उदाहरण है।

विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस हमें केवल याद दिलाने के लिए नहीं आता, वह हमें संकल्प के लिए आमंत्रित करता है। और भारत के लिए यह संकल्प केवल नीतिगत नहीं, सांस्कृतिक भी होना चाहिए। क्योंकि जिस देश के ऋषियों ने अरण्य को विश्वविद्यालय बनाया हो, जिसके किसानों ने पीढ़ियों से धरती को माँ मानकर जोता हो और जिसके आदिवासी समुदायों ने सदियों तक प्रकृति के साथ सहचर्य निभाया हो, उसे किसी और के पर्यावरण दर्शन की नहीं, अपनी ही जड़ों की ओर लौटने की जरूरत है।