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ऊँचे सपनों के साथ आखिर कब तक झुलसते रहेंगे हमारे मासूम युवा?

स्वराज्य करुण
वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्लॉगर

बड़े सपने देखने वाले छोटी उम्र के हमारे उन मासूम युवाओं को भला क्या मालूम था कि वह उनकी ज़िन्दगी का आख़िरी दिन होगा! उत्तरप्रदेश के लखनऊ में कल 22 जून को एक बहुमंजिली इमारत में संचालित कोचिंग सेंटर में अचानक आग लगी और देखते-ही-देखते अपने ऊँचे सपनों के साथ वे बच्चे भी झुलसकर दुनिया से चले गए, जो अपनी ज़िन्दगी में कुछ बनने और कुछ ऊँचा कर दिखाने का ख़्वाब लेकर पढ़ाई के लिए वहाँ गए थे। उनकी चीखें आग और धुएँ में घुटकर रह गईं। उनके तमाम ऊँचे सपने जलकर राख हो गए। यह दुर्घटना बहुत दुःखद और हृदय विदारक है। यह हमारी संवेदनाओं को झकझोर देने वाली घटना है।

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस हादसे पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए तत्काल घटनास्थल का दौरा किया। उन्होंने अस्पताल जाकर पीड़ितों और उनके परिवारजनों से मुलाकात की और अपनी संवेदना प्रकट की। इसके साथ ही उन्होंने लखनऊ के अलीगंज में हुए इस हादसे पर नाराज़गी व्यक्त करते हुए इसकी उच्चस्तरीय जाँच के भी निर्देश दिए और कहा कि जाँच में दोषी पाए जाने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित देश और प्रदेश के कई वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों ने भी इस हादसे पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। प्रधानमंत्री ने मृतकों के परिवारों के लिए दो-दो लाख रुपए और प्रत्येक घायल के लिए 50 हजार रुपए की आर्थिक सहायता की घोषणा की है।

गहन दुःख की इस घड़ी में पीड़ितों और शोक-संतप्त परिवारों के प्रति उन सबकी भावनाएँ और संवेदनाएँ अपनी जगह बिल्कुल ठीक हैं। ऐसे हादसों में शोकाकुल परिवारों के साथ सबको खड़े होना भी चाहिए। लखनऊ हादसे के पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा भी मिल जाएगा और दोषियों पर कार्रवाई भी हो जाएगी, लेकिन सवाल यह है कि जिन घरों के चिराग हमेशा के लिए बुझ गए, उन घरों में रोशनी अब कैसे होगी?

लखनऊ के इस भयानक हादसे की ख़बर जंगल में आग की तरह फैली और टीवी चैनलों में शाम तक 15 मौतों की जानकारी दी जाती रही। घायलों को बचाने की हर संभव कोशिश की जा रही है। सवाल यह भी है कि इस अग्नि दुर्घटना में क्या कोचिंग छात्रों के अलावा कोई और व्यक्ति पीड़ित नहीं हुए होंगे? यह आशंका इसलिए भी व्यक्त की जा रही है कि जिस बहुमंजिली इमारत में आग लगी, वहाँ कई और लोग भी तो रहे होंगे। बहरहाल, ईश्वर उनकी भी रक्षा करे। लेकिन यह दर्दनाक हादसा अपने पीछे यह सवाल छोड़ गया है कि जोखिम भरे कोचिंग सेंटरों में अपने ऊँचे सपनों के साथ हमारे मासूम युवा आखिर कब तक झुलसते रहेंगे? देश में ऐसे हादसे पहले भी हो चुके हैं।

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पाठकों को शायद याद होगा कि देश के बड़े शहरों में चल रहे कुछ कोचिंग सेंटरों में ऐसे कई हादसे पहले भी हुए हैं, जिनमें कई बच्चों की जानें गई हैं। जिनकी खबरें इंटरनेट पर आज भी तैर रही हैं। इन्हीं खबरों के अनुसार लगभग दो साल पहले जुलाई 2024 में दिल्ली के पुराने राजेन्द्र नगर स्थित एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में बरसात का पानी घुस गया था, जिसमें तीन अभ्यर्थियों की मौत हो गई थी। उपराज्यपाल वी. के. सक्सेना ने तीनों के परिवारों को दस-दस लाख रुपए का मुआवज़ा भी घोषित किया था। घटना की जाँच के बाद नवम्बर 2025 में दो अफसर निलंबित भी हुए थे।

जुलाई 2024 के इस हादसे के तत्काल बाद प्रशासन द्वारा अभियान चलाकर दिल्ली के कई कोचिंग सेंटरों की जाँच की गई और उनमें से कई को सील भी किया गया। आगे क्या हुआ, इसकी जानकारी इन पंक्तियों के लेखक को नहीं है। आज से लगभग सात साल पहले, मई 2019 में गुजरात के सूरत शहर की एक बहुमंजिली इमारत में चल रहे कोचिंग सेंटर में आग लगने पर झुलस जाने से 22 मौतें हुई थीं।

मेरा ख़्याल है कि स्कूल-कॉलेजों की नियमित पढ़ाई के अलावा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए युवाओं में कोचिंग के प्रति रुझान पिछले दस-बीस वर्षों में पागलपन की हद तक बढ़ गया है। रिटायर हो चुके एक वरिष्ठ इंजीनियर बताते हैं कि आज से 52 साल पहले, 1974 में इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए उनका चयन मेट्रिक की अंकसूची के आधार पर किया गया था। वैसे यह भी सच है कि किसी भी पद के लिए उम्मीदवारों का चयन उनकी प्रतिभा के आधार पर किया जाना चाहिए। लेकिन क्या आवेदकों की पिछली परीक्षाओं की अंकसूची से उनकी प्रतिभा का पता नहीं चल सकता?

ऐसा लगता है कि आज सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं का दौर है। हर कोई युवा बड़े से बड़ा सरकारी अफ़सर बनना चाहता है। कुछ बच्चे मल्टीनेशनल कम्पनियों के ऊँचे पदों पर जाना चाहते हैं। माता-पिता भी चाहते हैं कि उनके बच्चे पावरफुल अधिकारी बनें। ज़रा सोचिए, उन्हें यह पावर क्यों चाहिए? वर्तमान समाज की इस पूँजी-प्रधान व्यवस्था में क्या इस चाहत के पीछे सचमुच देशसेवा या जनसेवा की भावना होती है? क्या छोटे पदों में रहकर कोई अपने देश की या जनता की सेवा नहीं कर सकता? क्यों कोई सम्पन्न माँ-बाप अपने बच्चे को किसी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने के लिए वहाँ के प्रबंधन को लाखों-करोड़ों रुपए देने को तैयार रहते हैं? कई बच्चों का ख़्वाब होता है कि वे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) में जाएँ। उनके इन ख़्वाबों को पूरा करने के लिए माता-पिता लाखों रुपयों की फीस देकर उन्हें कोचिंग सेंटरों में भेजते हैं।

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वैसे देखा जाए तो कोई भी पद छोटा या बड़ा नहीं होता। लेकिन आज तो सामान्य पदों के लिए भी प्रतियोगी परीक्षाएँ होने लगी हैं। कल एक दुःखद ख़बर पढ़ने को मिली कि एक पति अपनी पत्नी को आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भर्ती परीक्षा दिलाने के लिए परीक्षा केन्द्र में छोड़कर बाइक से लौट रहा था। रास्ते में एक बड़े ट्रक से कुचलकर उसकी मौत हो गई।

ज़िन्दगी में ऊँची से ऊँची सफलता हासिल करने की इच्छा हर किसी में होती है, होनी भी चाहिए; लेकिन निचले पदों को लेकर हीन भावना से बचना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक पद का अपना महत्व होता है। फिर भी ऐसा क्यों है कि आज हर कोई आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस. अधिकारी, डॉक्टर और इंजीनियर ही बनना चाहता है? दूसरी तरह के पद उनकी प्राथमिकता सूची में दूसरे नंबर पर होते हैं या उन्हें दोयम दर्जे का समझा जाता है।

आज दसवीं-बारहवीं बोर्ड की वार्षिक परीक्षाओं में अस्सी, नब्बे, पंचानवे और निन्यानवे प्रतिशत अंकों से हजारों-लाखों बच्चे उत्तीर्ण हो रहे हैं। इसके बाद भी उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अलग से कोचिंग करनी पड़ती है। बताया जाता है कि उन परीक्षाओं का पाठ्यक्रम दसवीं-बारहवीं के पाठ्यक्रमों से अलग होता है। लेकिन ऐसा क्यों? मैंने सुना है कि इन कोचिंग सेंटरों में दाखिले के लिए बच्चे अपने स्कूल-कॉलेज की नियमित कक्षाएँ भी छोड़ देते हैं, वहाँ से अपना ट्रांसफर सर्टिफिकेट भी ले जाते हैं। कोचिंग केंद्रों के प्रबंधक उनका एडमिशन इसके आधार पर किसी प्राइवेट स्कूल या कॉलेज में करवा देते हैं, जहाँ संबंधित छात्र-छात्रा को क्लास अटेंड करने के लिए जाना नहीं पड़ता, लेकिन उनकी हाज़िरी लगती रहती है। वे सिर्फ वार्षिक परीक्षाओं में शामिल होते हैं। उनकी इस प्रकार की कक्षाओं को ‘डमी क्लास’ कहा जाता है। क्या इन ‘डमी कक्षाओं’ का प्रचलन गलत नहीं है?

विगत कुछ वर्षों में कुछ कोचिंग केंद्रों में हुए हादसों को लेकर सवाल यह भी उठता है कि ऐसे हादसे होते ही क्यों हैं? क्या इसलिए कि अधिकांश कोचिंग सेंटरों में मानव जीवन की सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतज़ाम नहीं रहता? कहीं आग से बचाव के लिए फायर सेफ्टी की कोई व्यवस्था नहीं रहती, तो कहीं कई-कई मंजिलों वाली गगनचुम्बी इमारतों में आग लगने पर बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं रहता। अधिकांश कोचिंग सेंटर अत्यधिक भीड़-भाड़ वाले इलाकों में संचालित होते हैं। जिन्हें इनका निरीक्षण करते रहना चाहिए, वे अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाते।

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इस डिजिटल युग में कारों, बसों, होटलों और निजी मकानों सहित बहुमंजिले भवनों में दरवाजों पर ऑटोमैटिक लॉकिंग सिस्टम फेल हो जाने पर भी आग लगने से कई गंभीर जानलेवा हादसे हुए हैं। लखनऊ के अलीगंज की जिस बिल्डिंग के कोचिंग सेंटर में कल 22 जून 2026 को अग्नि दुर्घटना हुई, उसके कारणों की जानकारी तो जाँच में सामने आएगी, लेकिन सोशल मीडिया आदि में बताया जा रहा है कि इस हादसे की एक मुख्य वजह ऑटोमैटिक लॉकिंग सिस्टम का फेल हो जाना भी है।

आज देश भर में सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग केंद्रों की भरमार है। लेकिन क्या इन केंद्रों के सरकारी पंजीयन का भी कोई प्रावधान है? अगर नहीं है, तो क्या उनका सरकारी रजिस्ट्रेशन नहीं होना चाहिए, ताकि अगर वहाँ कोई हादसा हो जाए तो प्रारंभिक ज़िम्मेदारी तत्काल तय की जा सके? क्या लाखों रुपयों की फीस वाले कोचिंग सेंटरों के संचालन की अनुमति सरकार की ओर से या स्थानीय प्रशासन की ओर से दी जाती है? अगर नहीं, तो अनुमति अनिवार्य होनी चाहिए। ये कोचिंग सेंटर जिन भवनों में संचालित होते हैं, उनमें आग से बचाव के लिए पुख्ता इंतज़ाम होने चाहिए। स्थानीय प्रशासन को ऐसी बिल्डिंगों में फायर सेफ्टी की जाँच भी नियमित रूप से और आकस्मिक रूप से करनी चाहिए, बशर्ते यह कार्य पूरी ईमानदारी और गंभीरता से हो।

देश की कई ऊँची-ऊँची इमारतों में हुए ऐसे हादसों से कोई सबक भी तो नहीं लेता। कोई सबक लेना भी नहीं चाहता। एक हादसा होता है, चीख़-पुकार मचती है, रोना-धोना मचता है, डाँट-फटकार भी होती है, उसके बाद सब कुछ यथावत चलने लगता है। बात आई-गई हो जाती है। दिल्ली के मालवीय नगर की एक बहुमंजिली इमारत में संचालित रेस्टोरेंट में आग लगने से 21 मौतों की घटना सिर्फ 20 दिन पहले की है। यानी 3 जून 2026 के इस हादसे को एक महीना भी नहीं हुआ और ऐसा लगता है कि महज़ तीन हफ्ते में ही सब उसे भूल गए। सड़क हादसों, रेल हादसों और विमान हादसों को भी लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं।

 लखनऊ में कल 22 जून को कोचिंग सेंटर में हुई भयानक अग्नि दुर्घटना देश में भविष्य में और कहीं न हों, यह देखना सरकार और समाज दोनों की ज़िम्मेदारी है।