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अग्निकांड नहीं, यह प्रशासनिक हत्या है

आचार्य ललित मुनि

ज्ञान के मंदिर कहे जाने वाले अनेक कोचिंग संस्थान आज विद्यार्थियों के लिए मृत्यु के कुंड बनते जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न शहरों में कोचिंग सेंटरों में लगी आग की घटनाओं ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोली है, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया है कि हमारे यहाँ सुरक्षा नियमों का पालन केवल कागजों तक सीमित है। कल लखनऊ में एक कोचिंग एवं प्रशिक्षण संस्थान में लगी भीषण आग में अनेक विद्यार्थियों की दर्दनाक मृत्यु हो गई। यह दृश्य कंपा देने वाला रहा। कोचिंग सेंटर में फँसे छात्रों की चीख-पुकार हृदय विदारक थी। कोई अपनी माँ को पुकार रहा था तो कोई पापा को। कुछ बच्चे एक-दूसरे को पुकारकर लिपट गए थे और बचाने की गुहार लगा रहे थे।

इससे उनकी पीड़ा का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है। उनकी बेबसी कुछ ऐसी थी कि कोई आग की लपटों में झुलसते हुए अपना जीवन बचाने के लिए छलांग लगा रहा था। वहीं कई छात्र घबराकर पहली और दूसरी मंजिलों से नीचे कूद रहे थे। यह दृश्य देखने वाले स्तब्ध थे। सभी भाव-विह्वल थे। रास्ते से गुजर रही महिलाओं की चीखें बता रही थीं कि माँ, माँ होती है, चाहे बच्चा किसी का भी हो। आग की लपटें इतनी प्रचंड और तीव्रता से उठ रही थीं कि बाहर खड़े लोग बचाव के लिए कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। जब तक अग्नि सुरक्षा दल घटनास्थल पर पहुँचता, तब तक करीब पंद्रह परिवारों के चिराग बुझ चुके थे।

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इस घटना ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया। लेकिन यह कोई पहली घटना नहीं थी। इससे पहले दिल्ली के मुखर्जी नगर और ओल्ड राजेंद्र नगर में भी कोचिंग संस्थानों में आग लगने की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। वर्ष 2019 में गुजरात के सूरत स्थित तक्षशिला आर्केड में संचालित कोचिंग सेंटर में लगी आग भारत की सबसे भयावह शैक्षणिक अग्नि-दुर्घटनाओं में से एक थी, जिसमें 22 विद्यार्थियों की जान चली गई थी। आग इतनी तेजी से फैली कि कई छात्र जान बचाने के लिए चौथी मंजिल से नीचे कूदने को विवश हो गए। उन मासूम बच्चों की चीखें आज भी देश की स्मृति में अंकित हैं।

इन घटनाओं के बाद सरकारों ने जांच समितियाँ गठित कीं, मुआवजे घोषित किए गए, अधिकारियों को निलंबित किया गया और सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा के आदेश दिए गए। लेकिन कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर सामान्य हो गया। प्रश्न यह है कि यदि सूरत जैसी त्रासदी के बाद भी देश नहीं जागा, तो फिर कितनी मौतों की आवश्यकता है?

दरअसल समस्या आग लगने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जो आग लगने की परिस्थितियाँ पैदा करती है। देश के अधिकांश शहरों में सैकड़ों कोचिंग संस्थान बहुमंजिला व्यावसायिक भवनों में संचालित हो रहे हैं। इनमें से अनेक भवनों में अग्निशमन सुरक्षा के मूलभूत मानकों का भी पालन नहीं किया जाता। कहीं आपातकालीन निकास द्वार नहीं हैं, कहीं सीढ़ियाँ अत्यंत संकरी हैं, कहीं अग्निशमन यंत्र वर्षों से निष्क्रिय पड़े हैं और कहीं विद्युत तारों का जाल किसी बड़े हादसे को निमंत्रण देता दिखाई देता है।

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सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब प्रशासन की जानकारी के बिना नहीं होता। किसी भी भवन को संचालित करने के लिए नगर निगम, विकास प्राधिकरण और अग्निशमन विभाग से विभिन्न प्रकार की अनुमति और प्रमाणपत्र प्राप्त करने होते हैं। यदि कोई संस्थान सुरक्षा मानकों का पालन नहीं कर रहा है तो वह वर्षों तक कैसे संचालित होता रहता है? यदि भवन में अवैध निर्माण है तो स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं होती? यदि अग्निशमन प्रमाणपत्र नहीं है तो संस्थान को चलाने की अनुमति किसने दी?

इन प्रश्नों के उत्तर सीधे प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की ओर संकेत करते हैं। वास्तव में हमारे यहाँ दुर्घटना रोकने की संस्कृति विकसित ही नहीं हो पाई है। प्रशासन तब सक्रिय होता है जब त्रासदी घट चुकी होती है। निरीक्षण तब किए जाते हैं जब लोग मर चुके होते हैं। नोटिस तब जारी होते हैं जब मीडिया और जनता का दबाव बढ़ जाता है। अधिकारी तब निलंबित किए जाते हैं जब सरकार की छवि पर प्रश्नचिह्न लगने लगता है। अर्थात् पूरी व्यवस्था प्रतिक्रियात्मक है, सक्रिय नहीं।

सूरत अग्निकांड के बाद देश भर में कोचिंग संस्थानों और स्कूलों की सुरक्षा जांच के निर्देश दिए गए थे। कुछ स्थानों पर औपचारिक कार्रवाई भी हुई। लेकिन कुछ महीनों बाद सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर लौट आया। यही कारण है कि आज भी अधिकांश शहरों में ऐसे कोचिंग संस्थान मिल जाएंगे जहाँ सैकड़ों विद्यार्थी एक ही तल पर बैठकर पढ़ाई करते हैं, लेकिन आपात स्थिति में बाहर निकलने का केवल एक मार्ग उपलब्ध होता है। यह स्थिति किसी भी बड़े हादसे को जन्म दे सकती है।

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दुखद पहलू यह है कि इन घटनाओं में मरने वाले अधिकांश विद्यार्थी छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। उनके माता-पिता खेती, मजदूरी या छोटे व्यवसाय करके अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए शहर भेजते हैं। वे अपने सपनों को साकार होते देखने की आशा रखते हैं। लेकिन जब वही बच्चा किसी प्रशासनिक लापरवाही का शिकार होकर दुनिया से विदा हो जाता है, तब केवल एक परिवार ही नहीं टूटता, बल्कि पूरे समाज का विश्वास भी टूटता है।

यह समस्या केवल कोचिंग संस्थानों तक सीमित नहीं है। देश में अस्पतालों, छात्रावासों, व्यावसायिक परिसरों, शॉपिंग मॉल और सरकारी कार्यालयों में भी अग्नि सुरक्षा की स्थिति चिंताजनक है। अनेक बार देखा गया है कि अग्निशमन विभाग द्वारा जारी किए गए निर्देशों का पालन नहीं किया जाता। सुरक्षा ऑडिट केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। कई बार नियमों के उल्लंघन के बावजूद भवनों को संरक्षण मिलता रहता है। यह स्थिति अत्यंत खतरनाक है। यदि सरकारें वास्तव में ऐसी घटनाओं को रोकना चाहती हैं तो उन्हें कठोर कदम उठाने होंगे और दोषियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए।

आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।