माँ, मुझे माफ़ करना — रामप्रसाद बिस्मिल का अंतिम पत्र

उन्नीस दिसम्बर सन् उन्नीस सौ सत्ताईस। गोरखपुर की जेल में भोर की ठंडी हवा बह रही थी। आसमान अभी काला था। कोठरी की सँकरी खिड़की से जो थोड़ी सी रोशनी आती थी, उसमें एक युवक झुका बैठा था। उम्र महज़ तीस साल। हाथ में कलम, सामने एक कोरा काग़ज़, और भीतर एक ऐसा तूफ़ान जिसे शब्दों में ढालना शायद दुनिया का सबसे कठिन काम था। रामप्रसाद बिस्मिल अपनी माँ को अंतिम पत्र लिख रहे थे।
यह पत्र केवल एक पुत्र का विदा संदेश नहीं था। यह एक ऐसे इंसान की आत्मा का दस्तावेज़ था जो फाँसी के फंदे से महज़ कुछ घंटे दूर था, फिर भी जिसके भीतर भय नहीं, एक अजीब सी शांति थी। बिस्मिल ने उस पत्र में माँ को ‘माता जी’ कहकर संबोधित किया था। वही माँ जिसने उन्हें बचपन में रामायण की चौपाइयाँ सुनाई थीं, जिसने उनके भीतर देशप्रेम का वह बीज बोया था जो आगे चलकर एक दहकती हुई ज्वाला बन गया।
बिस्मिल ने पत्र में लिखा था कि वे जा रहे हैं, लेकिन दुखी नहीं हैं। उन्होंने माँ को ढाढस बँधाया था, उनसे विनती की थी कि वे रोएँ नहीं, क्योंकि उनका बेटा कोई अपराधी नहीं, बल्कि वह मर रहा है तो इसलिए कि उसने अपने देश से प्रेम किया। यह पंक्तियाँ पढ़कर आज भी कलेजा काँप उठता है, क्योंकि इनके पीछे जो दर्द था, वह शब्दों से कहीं बड़ा था।
रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म ग्यारह जून सन् उन्नीस सौ सात को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में हुआ था। पिता मुरलीधर और माँ मूलमती ने उन्हें सनातन संस्कारों में पाला था। माँ मूलमती एक साधारण गृहिणी थीं, लेकिन उनकी धार्मिकता और देशभक्ति की भावना ने बिस्मिल के बालमन को गहराई तक प्रभावित किया था। बिस्मिल ने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनकी माँ उनकी पहली गुरु थीं।
काकोरी काण्ड के बाद जब बिस्मिल को गिरफ़्तार किया गया और मृत्युदंड सुनाया गया, तब माँ मूलमती का हाल किसी से छिपा नहीं था। वे बार बार बेटे से मिलने जेल जाती थीं। कहते हैं कि एक मुलाकात में माँ ने आँसू बहाए तो बिस्मिल ने कहा था, ‘माँ, तुमने ही तो मुझे सिखाया था कि मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देना सबसे बड़ा धर्म है। फिर रोती क्यों हो?’ वह माँ की ममता थी जो रो रही थी, और वह बेटे का संकल्प था जो मुस्कुरा रहा था।
अंतिम पत्र में बिस्मिल ने माँ को याद दिलाया था कि उनके जाने के बाद परिवार को कठिनाई होगी, लेकिन उन्होंने ईश्वर पर भरोसा रखने को कहा था। उन्होंने लिखा था कि यदि किसी जन्म में फिर माँ बेटे का नाता मिले, तो वे फिर उन्हीं की कोख से जन्म लेना चाहेंगे। यह एक वाक्य पढ़कर माँ की आँखें किस तरह भीगी होंगी, इसकी कल्पना ही हृदय को विचलित कर देती है।
पत्र में कहीं क्षोभ नहीं था, कहीं शिकायत नहीं थी। अंग्रेजी हुकूमत के प्रति घृणा नहीं, बल्कि एक गहरी निर्विकार स्वीकृति थी। बिस्मिल जानते थे कि उनकी मौत व्यर्थ नहीं जाएगी। उन्होंने माँ को लिखा था कि उनका खून उस बीज की तरह है जो धरती में गिरेगा और एक दिन स्वतंत्रता का विशाल वृक्ष बनेगा। और इतिहास गवाह है कि वे सच निकले।
उस रात जेल में बिस्मिल ने पत्र लिखने के बाद अपनी प्रिय पंक्तियाँ भी लिखीं। उन्होंने लिखा, ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए क़ातिल में है।’ यह नारा नहीं था, यह एक जीवन दर्शन था। एक ऐसे युवक का, जो जानता था कि मृत्यु सत्य है, लेकिन विचार उससे भी बड़ा सत्य है।
उन्नीस दिसम्बर की सुबह जब बिस्मिल को फाँसी दी गई, तब उन्होंने अपनी माँ का नाम लिया था। जेल अधिकारियों ने बाद में बताया कि बिस्मिल के चेहरे पर फाँसी के वक्त भय नहीं, एक शांत मुस्कान थी। वे मर नहीं रहे थे, वे एक संदेश बन रहे थे। और वह संदेश उनकी माँ के नाम था, इस देश की उन करोड़ों माँओं के नाम था जिनके बेटे उस दौर में घर छोड़कर निकले थे और लौटे नहीं थे।
माँ मूलमती ने जब वह अंतिम पत्र पढ़ा होगा, तो उनके हाथ काँपे होंगे। शब्द धुँधले हो गए होंगे आँसुओं से। लेकिन एक माँ की ममता और एक क्रांतिकारी बेटे का गौरव, दोनों एक साथ उस काग़ज़ के टुकड़े में समाए हुए थे। मूलमती जी ने कभी सार्वजनिक रूप से रोना नहीं चुना। वे समझती थीं कि उनका बेटा जो काम करके गया है, उस पर आँसू नहीं, गर्व बहाना चाहिए।
आज जब हम रामप्रसाद बिस्मिल के उस अंतिम पत्र के बारे में सोचते हैं, तो हमें केवल एक क्रांतिकारी नहीं दिखता। हमें एक बेटा दिखता है जो माँ की आँखों में आँसू नहीं देखना चाहता था, जो चाहता था कि उसकी माँ सिर उठाकर जिए, जो जानता था कि प्रेम और बलिदान में कोई विरोध नहीं होता। वह पत्र हिंदी साहित्य और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा दस्तावेज़ है, जिसे पढ़कर आँखें नम हो जाती हैं और रीढ़ सीधी।
बिस्मिल का वह अंतिम पत्र यह भी याद दिलाता है कि हर बड़े आंदोलन के पीछे एक माँ होती है। वह माँ जो बेटे को जन्म देती है, जो उसे संस्कार देती है, जो उसके जाने पर रोती है लेकिन उसे जाने से रोकती नहीं। मूलमती जी ऐसी ही माँ थीं। और बिस्मिल ऐसे ही बेटे थे, जिन्होंने माँ के प्रेम को देश के प्रेम से जोड़ दिया था और दोनों को एक ही श्वास में जी लिया था।
उस काग़ज़ पर लिखे अक्षर मिट सकते हैं, स्याही फीकी पड़ सकती है, लेकिन वह भावना कभी नहीं मिटेगी जो एक तीस साल के युवक ने फाँसी की पूर्व रात्रि अपनी माँ के नाम लिखी थी। रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि माँ से बड़ा कोई संबोधन नहीं, और मातृभूमि से बड़ा कोई कर्तव्य नहीं। दोनों एक ही हैं, बस रूप अलग अलग हैं।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

